देवी ललिता के अवतार का संक्षिप्त परिचय



देवी सती के देह त्याग के बाद, भगवान शिव समाधि में लीन हो गए थे। उसी समय, तारकासुर नामक दैत्य का अत्याचार बढ़ गया था, जिसे केवल शिव का पुत्र ही मार सकता था। देवताओं ने शिव की समाधि भंग करने के लिए कामदेव को भेजा। कामदेव ने शिव पर अपने पुष्प बाण छोड़े, जिससे शिव का मन विचलित तो हुआ, लेकिन क्रोधित होकर उन्होंने अपनी तीसरी आँख खोल दी और कामदेव को जलाकर भस्म कर दिया।

कामदेव के भस्म होने के बाद, गणों के अधिपति चित्रकर्मा ने उस स्थान का अवलोकन किया। उन्होंने कामदेव की उस भस्म को इकट्ठा किया और उससे एक अद्भुत पुरुष की आकृति बनाई। जैसे ही चित्रकर्मा ने यह आकृति बनाई, भगवान रुद्र की दृष्टि उस पर पड़ी। शिव की दिव्य दृष्टि पड़ते ही वह निर्जीव आकृति जीवित हो उठी। यह नया प्राणी दोपहर के सूर्य के समान तेजस्वी और अत्यधिक शक्तिशाली था।

चित्रकर्मा के निर्देश पर, उस बालक ने शतरुद्रिय मंत्र का जाप करते हुए महादेव की स्तुति की। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे वरदान माँगने को कहा। बालक ने दो विशिष्ट वरदान माँगे:

  • जब भी वह किसी शत्रु से लड़े, तो उसके शत्रु की आधी शक्ति उसे प्राप्त हो जाए।
  • उसके शत्रुओं के अस्त्र और शस्त्र उस पर निष्फल हो जाएँ।

शिव ने उसे ये वरदान दिए और उसे साठ हजार वर्षों तक शासन करने की अनुमति दी। उस बालक के आचरण को देखकर शिव के मुख से अचानक "भंड, भंड" (भाग्यशाली होने का आशीर्वाद) निकला, जिसके कारण वह तीनों लोकों में 'भंडा' (भंडासुर) के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

चूँकि उसका जन्म रुद्र के क्रोध की अग्नि से हुआ था, इसलिए भंडासुर स्वभाव से एक भयानक दानव बन गया। उसने प्राचीन दैत्य नगरी शोणितपुर को फिर से बसाया और दानव शिल्पी मय ने उसके लिए इंद्रपुरी के समान भव्य नगर का निर्माण किया।

भंडासुर ने अपनी भुजाओं से विशुक्र और विसंग जैसे शक्तिशाली भाई और दुमिनी नामक बहन उत्पन्न की। अपने वरदानों के बल पर उसने देवताओं को पराजित किया और उन्हें स्वर्ग छोड़ने पर मजबूर कर दिया। उसका आतंक इतना बढ़ गया था कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी उसकी शक्ति को देखकर चिंतित हो गए।

भंडासुर ने अपने वरदानों के बल पर तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। उसकी शक्ति के सामने ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी विवश थे और देवताओं को स्वर्ग छोड़कर कंदराओं और समुद्र के भीतर छिपना पड़ा। भंडासुर देवताओं को घास के तिनके के समान समझता था और उसके डर से इंद्र सहित सभी देवता शक्तिहीन हो गए थे।

जब देवता अत्यंत संकट में थे, तब देवर्षि नारद ने इंद्र को परामर्श दिया कि केवल पराशक्ति की आराधना ही उन्हें इस विपत्ति से बचा सकती है। नारद जी की सलाह पर इंद्र और अन्य देवता हिमालय की ढलानों पर गंगा के तट पर स्थित इंद्रप्रस्थ नामक स्थान पर गए। वहाँ उन्होंने दस हजार वर्षों और दस दिनों तक माता की घोर तपस्या की।

जब भंडासुर को देवताओं की तपस्या का पता चला, तो उसने उसमें विघ्न डालने के लिए अपने सेनापतियों और मायावी अस्त्रों को भेजा। परंतु जगतजननी माता ने अपनी शक्ति से देवताओं के चारों ओर एक तेजस्वी प्राचीर बना दी, जिसे भंडासुर की सेना पार नहीं कर सकी।

अंततः इंद्र ने निर्णय लिया कि अब उन्हें माता को प्रसन्न करने के लिए अंतिम उपाय करना होगा। उन्होंने महायज्ञ की विधि के अनुसार एक योजन चौड़ा यज्ञ कुंड तैयार करवाया। देवताओं ने इस यज्ञ की अग्नि में 'महामांस' (अपने स्वयं के अंगों का मांस) काटकर आहुति देना प्रारंभ कर दिया। जब देवता अपने संपूर्ण शरीर की आहुति देने के लिए तैयार हुए, तब यज्ञ की अग्नि से एक अत्यंत दिव्य और विशाल प्रकाश पुंज प्रकट हुआ।

उस प्रकाश पुंज के मध्य से एक भव्य चक्राकार प्रभा मंडल निकला, जिसके बीच में साक्षात् महादेवी ललिता प्रकट हुईं। उनका स्वरूप उदय होते सूर्य के समान तेजस्वी था और वे सौंदर्य की पराकाष्ठा थीं। उनके चार हाथों में पाश, अंकुश, इक्षु-धनुष (गन्ने का धनुष) और पाँच पुष्प-बाण सुशोभित थे।

माता ललिता की करुणामयी दृष्टि पड़ते ही देवताओं के समस्त रोग और कमियाँ दूर हो गईं। उनके शरीर वज्र के समान शक्तिशाली हो गए और उन्होंने भक्तिपूर्वक माता की स्तुति की। माता ने प्रसन्न होकर देवताओं को वचन दिया कि वे स्वयं भंडासुर का वध करेंगी और उन्हें उनका खोया हुआ राज्य वापस दिलाएंगी।

महायज्ञ से प्रकट होने के बाद, ब्रह्मा और विष्णु ने विचार किया कि राज्य संचालन के लिए देवी का विवाह उचित है। भगवान शिव ने दस करोड़ कामदेवों से भी अधिक सुंदर कामेश्वर का रूप धारण किया और भगवान विष्णु ने देवी के भाई के रूप में उनका कन्यादान किया। इसके बाद, विश्वकर्मा द्वारा निर्मित भव्य नगर श्रीपुर में माता ललिता का कामेश्वर के साथ राज्याभिषेक हुआ।

भंडासुर का वध करने के लिए माता ललिता ने श्रीचक्र-राज रथ पर सवार होकर अपनी विशाल सेना के साथ प्रस्थान किया। इस युद्ध में देवी की मुख्य सहायक मंत्रिणी (श्यामला) और दंडनाथा (वाराही) थीं।

  • भंडासुर ने सबसे पहले अपने सेनापति दुर्मद और कुरण्ड को भेजा, जिन्हें देवी की शक्तियों ने पराजित कर मार गिराया।
  • जब भंडासुर के तीस पुत्र युद्ध के लिए आए, तब माता ललिता की नौ वर्षीय पुत्री बाला ने युद्ध की आज्ञा माँगी और अपनी वीरता से उन सभी तीस पुत्रों का वध कर दिया।

युद्ध के दौरान भंडासुर के भाई विशुक्र ने देवताओं की सेना को जड़वत करने के लिए 'जयविघ्न यंत्र' नामक एक तांत्रिक यंत्र का उपयोग किया, जिससे शक्तियां आलसी और निरुत्साहित हो गईं। तब माता ललिता ने मंद मुस्कान के साथ कामेश्वर की ओर देखा, और उनकी उस हँसी से हाथी के मुख वाले भगवान गणेश प्रकट हुए। गणेश जी ने उस यंत्र के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और विशुक्र की सेना को नष्ट कर दिया। इसके बाद देवी की सेना ने भंडासुर के भाइयों, विशुक्र और विसंग, का वध कर दिया।

अंततः भंडासुर स्वयं युद्ध भूमि में उतरा। उसने और देवी ललिता ने एक-दूसरे पर अत्यंत विनाशकारी अस्त्रों का प्रहार किया:

  • जब भंडासुर ने 'पाखण्डास्त्र' का प्रयोग किया, तो देवी ने 'गायत्री अस्त्र' से उसे नष्ट किया।
  • भंडासुर ने 'महासुरास्त्र' चलाकर मधु, कैटभ और महिषासुर जैसे पुराने असुरों को पुनर्जीवित किया, तब देवी ने महादुर्गा को प्रकट कर उन सबका विनाश किया।
  • जब भंडासुर ने रावण, हिरण्याक्ष और शिशुपाल जैसे शत्रुओं को अस्त्रों के माध्यम से उत्पन्न किया, तब माता ललिता ने अपने हाथों के दस नखों से भगवान विष्णु के दसों अवतारों (मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह आदि) को प्रकट किया, जिन्होंने उन सभी असुरों का संहार किया।

युद्ध के अंत में, माता ललिता ने 'महाकामेश्वर अस्त्र' का संधान किया, जिसकी चमक हज़ारों सूर्यों के समान थी। इस अस्त्र ने न केवल भंडासुर का संहार किया, बल्कि उसकी पाप नगरी शून्यक को भी पूरी तरह भस्म कर दिया। भंडासुर के वध से तीनों लोक प्रसन्न हो उठे और देवताओं ने माता ललिता की स्तुति की।

युद्ध के पश्चात, माता ने देवताओं की प्रार्थना पर कामदेव (मदन) को पुनर्जीवित किया, जिसे शिव ने भस्म कर दिया था।

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...