श्री विद्या साधना में, भगवती ललिता त्रिपुर सुन्दरी का मन्त्रात्मक शरीर पञ्चदशाक्षरी मंत्र (15 अक्षरों वाला मंत्र) से निर्मित माना जाता है। इस मंत्र को तीन मुख्य भागों में विभाजित किया गया है, जिन्हें 'कूट' कहा जाता है। ये तीन कूट वाग्भव, मध्य (कामराज), और शक्ति देवी के सूक्ष्म शरीर (मन्त्र-कलेवर) के विभिन्न अंगों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
1. वाग्भव कूट
यह पञ्चदशाक्षरी मंत्र का प्रथम खंड है, जिसमें पाँच अक्षर (क-ए-ई-ल-ह्रीं) होते हैं। श्री ललिता सहस्रनाम के अनुसार, भगवती का मुख कमल साक्षात् वाग्भव कूट का स्वरूप है (85. श्रीवाग्भव-कूटैक-स्वरूप-मुख-पङ्कजा)। इसे 'वह्नि कुंडलिनी' (अग्नि स्वरूप) कहा जाता है। 'वाग्भव' का अर्थ है 'वाणी का उद्गम'। यह कूट साधक को ज्ञान, बुद्धि और वाणी की सिद्धि प्रदान करने वाला माना जाता है। यह ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती से संबंधित है।2. मध्य कूट या कामराज कूट
यह मंत्र का द्वितीय और केंद्रीय खंड है, जिसमें छह अक्षर (ह-स-क-ह-ल-ह्रीं) होते हैं। यह देवी के विग्रह में कंठ से लेकर कटि (कमर) तक के भाग का प्रतिनिधित्व करता है (86. कण्ठाधः कटिपर्यन्त मध्यकूटैक स्वरूपिणी)। इसे 'सूर्य कुंडलिनी' कहा जाता है। इसे 'कामराज कूट' भी कहते हैं क्योंकि यह इच्छा शक्ति और सृजन का प्रतीक है। यह साधक को ऐश्वर्य, आकर्षण और संतुलन प्रदान करता है।3. शक्ति कूट
यह मंत्र का तृतीय और अंतिम खंड है, जिसमें चार अक्षर (स-क-ल-ह्रीं) समाहित हैं। यह भगवती के विग्रह में कटि (कमर) से नीचे के भाग (चरणों तक) का स्वरूप है (87. शक्तिकूटैकतापन्न कट्यधोभाग धारिणी)। इसे 'सोम कुंडलिनी' (चंद्र स्वरूप) माना जाता है। यह कूट 'क्रिया शक्ति' और 'मोक्ष' का प्रतीक है। जिस प्रकार चंद्रमा शीतलता प्रदान करता है, उसी प्रकार यह कूट साधक को शांति, निर्वाण और अंतिम मुक्ति (कैवल्य) की ओर ले जाता है।कूटों का सामूहिक महत्व
ये तीनों कूट मिलकर देवी ललिता के उस सूक्ष्म शरीर का निर्माण करते हैं जिसे 88. 'मूलमन्त्रात्मिका' कहा गया है। इन तीन कूटों (तीन पुरों या अवस्थाओं) में स्थित होने के कारण ही देवी को 626. 'त्रिपुरा' कहा जाता है, जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति जैसी अवस्थाओं से परे तुरीय चेतना की स्वामिनी हैं। जब साधक इन तीन कूटों का ध्यान करते हुए मंत्र जप करता है, तो वह अनजाने में ही देवी के संपूर्ण स्वरूप की मानसिक पूजा (मानस पूजा) कर रहा होता है, जिससे आत्म-साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त होता है।
