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बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

167.पापनाशिनी - पापनाशिन्यै नमः

पापनाशिनी

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

निश्चिन्ता निरहङ्कारा निर्मोहा मोहनाशिनी ।
निर्ममा ममताहन्त्री निष्पापा पापनाशिनी ॥४७॥

पापनाशिनी उस नाम-क्रम का समापन करती हैं जिसमें श्रीललिताम्बिका पहले स्वयं चिन्ता, अहंकार, मोह, ममता और पाप से रहित कही गयी हैं और फिर जीव में उनके निरसन की अधिष्ठात्री रूप में वर्णित होती हैं। ठीक पहले का नाम निष्पापा देवी की अपनी पापरहित शुद्धता बताता है; पापनाशिनी उसी सत्य को भक्त की ओर उन्मुख करता है: वे पाप का नाश करने वाली हैं।

Pāpanāśinī concludes a sequence in which Śrī Lalitāmbikā is first described as herself free from anxiety, ego, delusion, possessiveness and sin, and then as the power that removes these from the individual. The immediately preceding name, Niṣpāpā, declares the Goddess to be intrinsically untouched by sin; Pāpanāśinī turns that truth towards the devotee: She is the destroyer of sin.

पदच्छेद एवं प्रत्यक्ष अर्थ

पाप + नाशिनी = पापनाशिनी। पाप का अर्थ अधर्म, दुष्कर्म अथवा उसके द्वारा उत्पन्न दोष है। नाशिनी का अर्थ है नाश करने वाली। अतः नाम का सीधा अर्थ है: जो पाप का नाश करती हैं, वे पापनाशिनी हैं। अर्चना-रूप पापनाशिन्यै नमः में चतुर्थी एकवचन द्वारा ऐसी देवी को नमस्कार किया जाता है।

Pāpa + nāśinī = Pāpanāśinī. Pāpa denotes sin, unrighteous action, or the fault arising from such action, while nāśinī means “she who destroys.” The direct meaning is therefore: She who destroys sin is Pāpanāśinī. In the archana form Pāpanāśinyai namaḥ, the dative singular offers salutation to the Goddess in this aspect.

भास्कररायीय अर्थ

भास्करराय मखिन् की सौभाग्यभास्कर व्याख्या इस नाम को केवल सामान्य नैतिक प्रशंसा के रूप में नहीं लेती। वे पापनाशिनी में देवी के ऐसे सामर्थ्य का प्रतिपादन करते हैं जिससे उपासक के पापों का क्षय होता है। उनकी व्याख्या में पाप-नाश का सम्बन्ध देवी के स्मरण, ध्यान, जप, अर्चन और उपासना की शुद्धिकारक सामर्थ्य से जोड़ा गया है। वे इस अर्थ के समर्थन में श्रुति तथा अन्य शास्त्रीय प्रमाणों का आश्रय लेते हैं और अग्नि द्वारा अपने में डाले गये पदार्थ को भस्म कर देने के सदृश पापक्षय का भाव प्रस्तुत करते हैं।

In the Saubhāgyabhāskara, Bhāskararāya Makhin does not treat this name merely as general moral praise. He presents Pāpanāśinī as expressing the Goddess's power by which the devotee's sins are destroyed. His explanation connects this removal of sin with the purifying efficacy of remembrance, meditation, japa, worship and devotion directed towards the Goddess. He supports this understanding with scriptural authorities and invokes the sense of sin being consumed as an offering is consumed by fire.

इस व्याख्या का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि पाप को केवल बाह्य दण्ड की धारणा तक सीमित नहीं किया गया है। कर्म अपना संस्कार और फल छोड़ता है; अतः पाप-नाश का अर्थ उस अशुद्धिकारक कर्म-सम्बन्ध का क्षय भी है जो जीव को उसके पूर्वकृत कर्मों के परिणामों से बाँधता है। देवी की कृपा यहाँ शुद्धि की शक्ति है, किन्तु इस कथन को जानबूझकर पाप करते रहने की अनुमति नहीं समझना चाहिए। भास्करराय की व्यापक व्याख्या स्वयं धर्मानुष्ठान और प्रायश्चित्त की व्यवस्था को निरर्थक ठहराने से सावधान करती है।

An important aspect of this interpretation is that pāpa is not restricted to the idea of an external punishment. Action leaves its consequence and conditioning; the destruction of sin therefore also concerns the removal of the defiling karmic connection that binds the individual to the consequences of previous actions. The Goddess's grace is a power of purification here, but this should not be understood as permission to continue knowingly in wrongdoing. Bhāskararāya's wider exposition itself guards against treating prescribed duty and expiation as meaningless.

पाप-नाश का अभिप्राय

भारतीय धर्मपरम्परा में पाप का अर्थ केवल अपराधबोध नहीं है। वह ऐसे कर्म से सम्बन्धित है जो धर्म के प्रतिकूल हो और जिसका फल जीव को भोगना पड़े। इसलिए पापनाशिनी को केवल मन में दोषबोध मिटा देने वाली कहना नाम के शास्त्रीय अर्थ को संकुचित कर देगा। नाम का अधिक सीधा अभिप्राय है कि भगवती की उपासना और अनुग्रह में पाप का क्षय तथा साधक की शुद्धि सम्भव होती है।

In the Indian religious tradition, pāpa does not mean merely a feeling of guilt. It is connected with action contrary to dharma whose consequences must be borne by the individual. To interpret Pāpanāśinī merely as one who removes a psychological sense of guilt would therefore narrow its scriptural meaning. The more direct sense is that through worship of the Goddess and Her grace, sin may be destroyed and the devotee purified.

इसी कारण निष्पापा और पापनाशिनी को साथ पढ़ना विशेष अर्थपूर्ण है। प्रथम नाम देवी की नित्य निर्मलता का कथन है; दूसरा उनके अनुग्रह की क्रियाशीलता का। जो स्वयं पाप से सर्वथा असंस्पृष्ट हैं, वही जीव को पापबन्ध से मुक्त करने वाली शक्ति के रूप में स्मरण की जाती हैं। दोनों नामों का यह निकट सम्बन्ध बिना किसी अतिरिक्त प्रतीकवाद के ही देवी के स्वरूप और अनुग्रह, दोनों पक्षों को स्पष्ट कर देता है।

It is therefore especially meaningful to read Niṣpāpā and Pāpanāśinī together. The first declares the eternal purity of the Goddess; the second expresses the active operation of Her grace. She who is Herself entirely untouched by sin is remembered as the power capable of freeing the individual from the bondage of sin. The proximity of these two names thus reveals both Her intrinsic nature and Her grace without requiring additional symbolism.

नाम-स्मरण और पापक्षय

सौभाग्यभास्कर की इस दिशा को ललितासहस्रनाम की फलश्रुति और भी स्पष्ट करती है। वहाँ भास्करराय नामकीर्तन को पापक्षय से जोड़ते हुए एक आवश्यक मर्यादा भी बताते हैं: सहस्रनाम का महत्त्व धर्म और प्रायश्चित्त को त्याग देने का आधार नहीं है। विशेषतः वे उस धारणा का निराकरण करते हैं कि किसी एक नाम को उसके शास्त्रीय प्रयोग से अलग करके पढ़ लेना ही सभी कर्तव्यों का विकल्प बन जाता है। इस सावधानी से पापनाशिनी का अर्थ अधिक संतुलित होता है: देवी का नाम पवित्र करने वाला है, पर सच्ची शरणागति धर्म-विमुखता नहीं सिखाती।

This direction in the Saubhāgyabhāskara is further clarified in its discussion of the Lalitāsahasranāma's phalaśruti. There Bhāskararāya connects the chanting of the divine names with the destruction of sin while preserving an important qualification: the greatness of the Sahasranāma is not a reason to abandon dharma or prescribed expiation. In particular, he rejects the idea that reciting an isolated name apart from its scripturally grounded practice automatically replaces every obligation. This caution gives Pāpanāśinī a balanced meaning: the Goddess's name is purifying, but genuine surrender does not teach disregard for dharma.

श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत

उपासना-दृष्टि से इस नाम में एक और संकेत ग्रहण किया जा सकता है। इसी नाम-समूह में देवी निर्मोहा, मोहनाशिनी, निर्ममा और ममताहन्त्री कही गयी हैं। मोह और अहं-मम भाव कर्म को प्रेरित करते हैं, और कर्म पुनः बन्धन का कारण बनता है। देवी की ओर उन्मुख होना इसलिए केवल पूर्वकृत पाप से मुक्ति की याचना नहीं, बल्कि उस चित्तवृत्ति के शोधन की दिशा भी है जिससे अधर्ममय कर्म पुनः उत्पन्न होते हैं। यह तात्त्विक संकेत प्रत्यक्ष नामार्थ का स्थान नहीं लेता, बल्कि उसके साधनात्मक आयाम को स्पष्ट करता है।

From the standpoint of contemplation, another indication may be drawn from this name. In the same sequence the Goddess is called Nirmohā, Mohanāśinī, Nirmamā and Mamatāhantrī. Delusion and the sense of egoic possession motivate action, while action in turn produces bondage. Turning towards the Goddess is therefore not only a prayer for release from past sin but also an orientation towards purifying the dispositions from which unrighteous action arises again. This contemplative indication does not replace the direct meaning of the name; it clarifies its relevance to spiritual practice.

साधक के लिए संदेश

पापनाशिन्यै नमः कहते समय साधक देवी से अपने कर्मों की उत्तरदायित्वहीन विस्मृति नहीं माँगता। वह अपनी त्रुटि को पहचानने, उससे निवृत्त होने, जहाँ सम्भव हो वहाँ उसका परिमार्जन करने और पुनः धर्ममार्ग पर स्थिर होने की शक्ति माँग सकता है। ऐसी प्रार्थना में देवी का अनुग्रह और साधक का पुरुषार्थ परस्पर विरोधी नहीं रहते। पश्चात्ताप निष्क्रिय आत्मग्लानि न बनकर शुद्धि और आचरण-संशोधन की ओर बढ़ता है।

While saying Pāpanāśinyai namaḥ, the devotee need not ask the Goddess for an irresponsible forgetting of one's actions. One may pray instead for the strength to recognise a fault, turn away from it, make amends where possible, and become established again in the path of dharma. In such prayer, divine grace and the devotee's own responsible effort are not opposed. Repentance then becomes not passive self-condemnation but a movement towards purification and correction of conduct.

भाव-सार

पापनाशिनी वह श्रीललिताम्बिका हैं जो स्वयं निष्पापा हैं और जीव के पाप का नाश करने वाली हैं। नाम में देवी की नित्य शुद्धता से प्रवाहित होने वाली शुद्धिकारक कृपा का बोध है। इसका साधनात्मक भाव है: त्रुटि को छिपाना नहीं, उसे देवी के सम्मुख स्वीकार कर धर्म, शुद्धि और परिवर्तित आचरण की ओर लौटना।

Pāpanāśinī is Śrī Lalitāmbikā who is Herself sinless and who destroys the sin of the individual. The name expresses the purifying grace that proceeds from Her eternal purity. Its devotional implication is not to conceal one's faults, but to acknowledge them before the Goddess and return towards dharma, purification and corrected conduct.

शनिवार, 11 जुलाई 2026

58.पञ्च-ब्रह्मासन-स्थिता - पञ्चब्रह्मासनस्थितायै नमः

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

सुमेरुमध्यशृङ्गस्था श्रीमन्नगरनायिका ।
चिन्तामणिगृहान्तस्था पञ्चब्रह्मासनस्थिता ॥२२॥

श्रीललितासहस्रनाम के पूर्ववर्ती नामों में भगवती के दिव्य अधिष्ठानरूपी श्रीमन्नगर तथा उसके मध्य स्थित चिन्तामणिगृह का वर्णन हुआ है। अब वाग्देवियाँ उस परम आसन का परिचय देती हैं जिस पर श्रीललिताम्बिका विराजमान हैं। उनका अट्ठावनवाँ नाम है पञ्चब्रह्मासनस्थिता।

यह नाम सर्वप्रथम देवी की प्रत्यक्ष आसन-स्थिति का वर्णन करता है। साथ ही यह इस गम्भीर शाक्त सिद्धान्त को प्रकट करता है कि ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिवरूपी पञ्चब्रह्म भी भगवती की चैतन्यशक्ति से ही अपने-अपने कार्य में समर्थ होते हैं।

पदच्छेद और प्रत्यक्ष अर्थ

पदच्छेद: पञ्चब्रह्म-आसन-स्थिता।

पञ्चब्रह्म अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव। आसन का अर्थ बैठने का आधार है तथा स्थिता का अर्थ उस पर स्थित अथवा विराजमान है।

इस प्रकार नाम का सीधा अर्थ है, “जो पञ्चब्रह्मों से निर्मित आसन पर विराजमान हैं।”

भास्कररायीय अर्थ

भास्करराय मखिन् की व्याख्या के अनुसार इस दिव्य आसन के चार आधार ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और ईश्वर हैं तथा सदाशिव उसका फलक अथवा ऊपरी आसनभाग हैं। इन पाँचों से संयुक्त होने के कारण वह पञ्चब्रह्मासन कहलाता है। उस पर विराजमान भगवती पञ्चब्रह्मासनस्थिता हैं।

यहाँ “आसन” शब्द को केवल किसी साधारण सिंहासन के अर्थ में नहीं समझना चाहिए। यह देवी की परमाधिष्ठात्री स्थिति का द्योतक है। जिन पञ्चब्रह्मों के द्वारा जगत् की सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोधान और अनुग्रह से संबद्ध कार्य सम्पन्न होते हैं, वे स्वयं श्रीललिताम्बिका की शक्ति से अधिष्ठित हैं।

अतः इस नाम का आशय पाँचों देवताओं का अवमूल्यन करना नहीं है। इसका अभिप्राय यह है कि उनके भीतर कार्यरत सामर्थ्य भगवती की पराशक्तिरूपी चेतना से अभिन्न है। शक्ति के बिना कोई भी दैवी कार्य प्रवृत्त नहीं हो सकता।

सौन्दर्यलहरी का साक्ष्य

सौन्दर्यलहरी के बानवेवें श्लोक में भी इसी दिव्य मञ्च का अत्यन्त सुन्दर काव्यात्मक वर्णन प्राप्त होता है:

गतास्ते मञ्चत्वं द्रुहिणहरिरुद्रेश्वरभृतः
शिवः स्वच्छच्छायाघटितकपटप्रच्छदपटः ।

अर्थ: हे देवी! ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और ईश्वर आपके मञ्च के आधाररूप हो गए हैं। स्वच्छ स्फटिक के समान कान्तिमान सदाशिव उस मञ्च के आच्छादनरूप में स्थित हैं।

इस काव्यात्मक चित्रण में वही व्यवस्था व्यक्त होती है जो पञ्चब्रह्मासनस्थिता नाम में संक्षेपतः निहित है। देवी पञ्चब्रह्ममय मञ्च पर परमेश्वरी के रूप में विराजमान हैं और उनकी अरुण प्रभा सम्पूर्ण आसन को अपने सौन्दर्य से आलोकित करती है।

पञ्चब्रह्म और पञ्चकृत्य

श्रीविद्या-परम्परा में पञ्चब्रह्मों का संबंध पाँच दैवी कृत्यों से देखा जाता है। ब्रह्मा सृष्टि, विष्णु स्थिति, रुद्र संहार, ईश्वर तिरोधान तथा सदाशिव अनुग्रह से संबद्ध हैं। इन कृत्यों का विस्तार सहस्रनाम में आगे सृष्टिकर्त्री, ब्रह्मरूपा, गोप्त्री, गोविन्दरूपिणी, संहारिणी, रुद्ररूपा, तिरोधानकरी, ईश्वरी, सदाशिवा और अनुग्रहदा जैसे नामों द्वारा भी प्रकट किया गया है।

इससे यह तात्त्विक भाव स्पष्ट होता है कि भगवती इन पाँच कार्यों से पृथक् कोई निष्क्रिय सत्ता नहीं हैं। वे स्वयं चित्शक्तिरूपिणी होकर समस्त दैवी क्रियाशक्ति की मूल अधिष्ठात्री हैं।

श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत

उपासना-दृष्टि से पञ्चब्रह्मासन भगवती के सर्वाधिष्ठानत्व का संकेत देता है। ब्रह्मा से सदाशिव तक जो कुछ सृजन करता, धारण करता, संहृत करता, आवृत करता अथवा अनुग्रह प्रदान करता है, उस सम्पूर्ण सामर्थ्य का मूल पराचैतन्य श्रीललिताम्बिका ही हैं।

शक्ति से रहित चेतन अधिष्ठाता किसी क्रिया को सम्पन्न नहीं करता और चेतना से पृथक् शक्ति का भी स्वतंत्र अस्तित्व नहीं माना जाता। अतः इस नाम में शिव और शक्ति का विरोध नहीं, अपितु उनका अविभाज्य ऐक्य अन्तर्निहित है। भगवती का पञ्चब्रह्मासन पर विराजना उनके इसी सर्वोपरि चित्शक्ति-स्वरूप को व्यक्त करता है।

इस रहस्य को केवल स्थूल प्रतिमा-विन्यास तक सीमित नहीं करना चाहिए। आसन की मूर्त कल्पना उपासना के लिए ग्राह्य है, किन्तु उसका अन्तरंग तात्पर्य यह है कि समस्त देवता, समस्त क्रियाएँ और उनके समस्त फल अन्ततः एक ही पराशक्ति में अधिष्ठित हैं।

साधक के लिए संदेश

इस नाम का जप करते हुए साधक भगवती का ध्यान उस परमेश्वरी के रूप में करता है जिनकी शक्ति से सृष्टि का प्रत्येक विधान संचालित होता है। इससे अन्तःकरण में यह भाव दृढ़ होता है कि साधक का ज्ञान, सामर्थ्य, कर्म और साधना भी स्वयं उसकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, अपितु भगवती के अनुग्रह से प्राप्त साधन हैं।

इस भाव से अहंकार शिथिल होता है और शरणागति पुष्ट होती है। साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि वे उसके अन्तःकरण को ऐसा पवित्र आसन बनाएँ जिसमें श्रद्धा, विवेक, संयम और भक्ति प्रतिष्ठित हों तथा जहाँ उनके चैतन्य का स्मरण निरन्तर बना रहे।

नाम-सार

पञ्चब्रह्मासनस्थिता वह श्रीललिताम्बिका हैं जो ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव से निर्मित दिव्य आसन पर विराजमान हैं। यह नाम उनके परमाधिष्ठात्री स्वरूप, पञ्चकृत्यों की मूल चित्शक्ति तथा समस्त दैवी सामर्थ्य के आधाररूप महत्त्व को प्रकट करता है। उनके चरणों में प्रणत साधक यही प्रार्थना करता है कि उसका अन्तःकरण अहंकार से रहित होकर भगवती के स्मरण और अनुग्रह का योग्य आसन बने।

ॐ पञ्चब्रह्मासनस्थितायै नमः।

रविवार, 28 जून 2026

45.पदद्वय-प्रभाजाल-पराकृत-सरोरुहा - पदद्वयप्रभाजालपराकृतसरोरुहायै नमः

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
    तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं बिभ्रतीं
    सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

नखदीधितिसञ्छन्ननमज्जनतमोगुणा ।
पदद्वयप्रभाजालपराकृतसरोरुहा ॥ १९॥

श्रीललितासहस्रनाम में भगवती के दिव्य विग्रह का वर्णन क्रमशः शिखा से चरणों तक आता है। चवालीसवें नाम में उनके नखों की दीप्ति से प्रणत जनों के तमोगुण के आच्छादन का वर्णन हुआ। उसके पश्चात् पैंतालीसवाँ नाम “पदद्वय-प्रभाजाल-पराकृत-सरोरुहा” आता है। इस नाम में भगवती के दोनों चरणों की ऐसी दिव्य प्रभा कही गई है, जिसके सामने कमल की शोभा भी पराजित हो जाती है।

इस नाम का पदच्छेद इस प्रकार है। पदद्वय, प्रभाजाल, पराकृत और सरोरुहा। “पदद्वय” का अर्थ है दोनों चरण। “प्रभाजाल” का अर्थ है प्रकाश-किरणों का समूह। “पराकृत” का अर्थ है पराजित या अतिक्रान्त किया हुआ। “सरोरुहा” का अर्थ है सरोवर में उत्पन्न कमल। अतः इस नाम का भाव है कि भगवती के दोनों चरणों से निकलने वाली प्रभा ने कमल की शोभा को भी अतिक्रान्त कर दिया है।

भास्कररायीय अर्थ

भास्करराय की व्याख्या का मुख्य भाव अत्यन्त सरल और गूढ़ है। देवी के चरणयुगल की प्रभा इतनी विलक्षण है कि वह सरोरुह, अर्थात् कमल, को भी पराजित करती है। सामान्यतः देवताओं के चरणों की तुलना कमल से की जाती है। पर यहाँ वाग्देवियाँ कहती हैं कि भगवती के चरण केवल कमल-समान नहीं हैं, वे कमल से भी श्रेष्ठ हैं। कमल उनकी चरण-प्रभा का उपमान बनने में समर्थ नहीं है।

यह श्रेष्ठता केवल रूप-सौन्दर्य की नहीं है। कमल बाह्य प्रकाश, जल, ऋतु और दिन-रात्रि पर आश्रित है। देवी के चरणों की प्रभा नित्य, आत्मप्रकाशमयी और करुणारूप है। कमल देखने वाले की आँख को आनन्द देता है, पर भगवती के चरण साधक के अन्तःकरण को प्रकाशित करते हैं।

सौन्दर्यलहरी का प्रत्यक्ष प्रमाण

आदि शङ्कराचार्य सौन्दर्यलहरी के सतासीवें श्लोक में इसी भाव को अत्यन्त सुन्दर रीति से व्यक्त करते हैं। वहाँ देवी के चरणों की कमल से तुलना करते हुए कहा गया है कि देवी के चरण कमल पर विजय प्राप्त करते हैं। कमल हिम से नष्ट हो जाता है, रात्रि में बन्द हो जाता है और केवल लक्ष्मी का पात्र बनता है। देवी के चरण हिमालय में निवास करने में समर्थ हैं, रात्रि के अन्तिम भाग में भी उज्ज्वल रहते हैं और समयाचार-मार्ग के साधकों को श्री प्रदान करते हैं।

सौन्दर्यलहरी ८७

हिमानीहन्तव्यं हिमगिरिनिवासैकचतुरौ
    निशायां निद्राणं निशि चरमभागे च विशदौ ।
वरं लक्ष्मीपात्रं श्रियमतिसृजन्तौ समयिनां
    सरोजं त्वत्पादौ जननि जयतश्चित्रमिह किम् ॥

इसका भाव है कि हे जननी, आपके चरणों का कमल को जीत लेना आश्चर्य की बात नहीं है। कमल हिम से नष्ट होता है, पर आपके चरण हिमगिरि में निवास करने में समर्थ हैं। कमल रात्रि में बन्द हो जाता है, पर आपके चरण रात्रि के अन्तिम भाग में भी विशद रहते हैं। कमल लक्ष्मी का पात्र मात्र है, पर आपके चरण समयाचारियों को श्री प्रदान करते हैं। इसलिए आपके चरणों की कमल से श्रेष्ठता स्वाभाविक है।

चरण-रज की महिमा

सौन्दर्यलहरी के दूसरे श्लोक में देवी के चरणपङ्केरुह से उत्पन्न रज की महिमा कही गई है। वहाँ कहा गया है कि ब्रह्मा उसी चरण-रज को ग्रहण कर लोकों की रचना करते हैं, विष्णु उसे सहस्र शिरों से धारण करते हैं और हर उसे भस्म की भाँति धारण करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि भगवती के चरण केवल सौन्दर्य का विषय नहीं, अपितु सृष्टि, स्थिति और लय की मूल शक्ति के आधार हैं।

सौन्दर्यलहरी २ का संकेत

तनीयांसं पांसुं तव चरणपङ्केरुहभवं
    विरिञ्चिः सञ्चिन्वन् विरचयति लोकानविकलम् ।
वहत्येनं शौरिः कथमपि सहस्रेण शिरसां
    हरः सङ्क्षुद्यैनं भजति भसितोद्धूलनविधिम् ॥

मूकपञ्चशती में चरण-शरणागति

मूककवि की मूकपञ्चशती में एक पूरा शतक कामाक्षी के पादारविन्द पर केन्द्रित है। इस पादारविन्दशतक में देवी के चरणों को शरण, कृपा, ज्ञान और अन्तःकरण-शुद्धि का आधार माना गया है। कामाक्षी और ललिता अभिन्न पराशक्ति के रूप में पूजित हैं। इसलिए कामाक्षी के चरणारविन्द की स्तुति इस नाम के भाव को और पुष्ट करती है।

पादारविन्दशतक की भावधारा यह बताती है कि देवी के चरण केवल नमन करने योग्य अंग नहीं हैं। वे साधक के लिए आश्रय हैं, चित्त की दिशा हैं और अज्ञान के तिमिर को दूर करने वाली करुणा की किरणें हैं। इसी दृष्टि से “प्रभाजाल” शब्द केवल भौतिक प्रकाश नहीं, अपितु भगवती की अनुग्रह-किरणों का भी बोध कराता है।

त्रिपुरारहस्य की तात्त्विक दृष्टि

त्रिपुरारहस्य में त्रिपुरा को जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति से परे स्थित शुद्ध चैतन्य के रूप में समझाया गया है। इस तात्त्विक दृष्टि से देवी के चरणों का ध्यान रूप-सौन्दर्य तक सीमित नहीं रहता। साधक जब देवी के चरणों में मन को रखता है, तब वह बदलते हुए अनुभवों से हटकर उस चैतन्य-महिमा की ओर मुड़ता है जो सभी अवस्थाओं को प्रकाशित करती है।

इसीलिए “प्रभाजाल” को साधना-दृष्टि से चित्-प्रकाश का संकेत भी माना जा सकता है। कमल बाह्य प्रकाश से खिलता है, पर साधक का हृदय देवी के चरण-प्रकाश से खिलता है। यह प्रकाश तमस, संशय, अहंकार और चित्त की संकुचित दृष्टि को शान्त करता है।

मणिद्वीप और कमल-भावभूमि

देवीभागवत में वर्णित मणिद्वीप दिव्य रत्नों, चिन्तामणि, अमृतमय सरोवरों और पुष्पित कमलों से युक्त देवी-धाम है। यह वर्णन भगवती की दिव्य प्रभा और सौन्दर्य की विराट भावभूमि देता है। इस भावभूमि में कमल अत्यन्त पवित्र और सुन्दर माना जाता है, फिर भी सहस्रनाम का यह नाम बताता है कि भगवती के चरणों की प्रभा उस कमल-शोभा को भी अतिक्रमित कर देती है।

भक्त के लिए यह संकेत अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। संसार में जो वस्तु सबसे सुन्दर प्रतीत होती है, वह भी देवी-चरणों की प्रभा के सामने सीमित है। कमल प्रकृति का सौन्दर्य है, पर देवी के चरण अनन्त चैतन्य, करुणा और मोक्षमार्ग के सौन्दर्य हैं।

साधक के लिए संदेश

श्रीविद्या-साधना में चरण-चिन्तन विनय, शरणागति और अनुग्रह-स्वीकार का साधन है। साधक जब देवी के चरणों का ध्यान करता है, तब वह अपने अहंकार को नीचे रखकर भगवती की करुणा को स्वीकार करता है। इसी विनय से ज्ञान का द्वार खुलता है और चित्त में शुद्धता आती है।

अर्चना में यह नाम “पदद्वय-प्रभाजाल-पराकृत-सरोरुहायै नमः” रूप से उच्चरित होता है। इसके जप में साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि उसके भीतर अहंकार, अज्ञान, संशय और तमस के रूप में स्थित मलिन वृत्तियाँ देवी के चरण-प्रभाजाल से दूर हों और उसका हृदय भक्ति, विनय और आत्मप्रकाश से खिल उठे।

इस प्रकार “पदद्वय-प्रभाजाल-पराकृत-सरोरुहा” नाम भगवती के चरणयुगल की अनुपम महिमा का गान है। यह नाम बताता है कि कमल की शोभा, कोमलता और पवित्रता भी देवी के चरणों की दिव्य प्रभा के सामने सीमित है। जो साधक श्रद्धा से उन चरणों का स्मरण करता है, उसका चित्त विनय से झुकता है, भक्ति से पिघलता है और अन्ततः उसी चरण-प्रकाश में आत्मकल्याण की दिशा पाता है।

शनिवार, 6 जून 2026

23.पद्मराग-शिलादर्श-परिभावि-कपोलभूः - पद्मरागशिलादर्शपरिभाविकपोलभुवे नमः

पद्मरागशिलादर्शपरिभाविकपोलभूः

प्रार्थना

शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
      तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
      सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥

पद्मराग-शिलादर्श-परिभावि-कपोलभूः।
नवविद्रुम-बिम्बश्री-न्यक्कारि-रदनच्छदा॥९॥

श्री ललिता सहस्रनाम के क्रम में, माँ के दिव्य कानों के आभूषणों का वर्णन करने के बाद, वाग्देवियाँ उनके मुख-सौंदर्य के एक अत्यंत आकर्षक अंग 'कपोल' (गालों) का वर्णन करती हैं। तेईसवाँ नाम है 'पद्मराग-शिलादर्श-परिभावि-कपोल-भू'। यह नाम माँ के सौंदर्य को केवल शारीरिक चमक तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे ब्रह्मांडीय चेतना के परावर्तन से जोड़ता है।

यह नाम छह गूढ़ शब्दों के मेल से बना है: पद्मराग (माणिक्य या श्रेष्ठ लाल मणि/Ruby) + शिला*+ आदर्श* (दर्पण) + परिभावि (तिरस्कृत करने वाली या मात देने वाली) + कपोल (गाल) + भू (स्थान या क्षेत्र)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिनके कपोलों (गालों) का स्थान इतना चमकदार और चिकना है कि वह श्रेष्ठ पद्मराग मणियों (माणिक्य) से बने दर्पणों की चमक और स्वच्छता को भी मात दे देता है"।

पद्मराग शिला
पद्मराग शिला

आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के श्लोक 59 में माँ के इन दर्पण जैसे गालों का अद्भुत वर्णन किया है:
स्फुरद्-गण्डाभोग-प्रतिफलित-ताटङ्क-युगलं चतुश्चक्रं मन्ये तव मुखमिदं मन्मथ-रथम्।

भावार्थ: "हे माता! आपके चमकते हुए कपोलों में आपके कानों के कुंडल (सूर्य और चंद्रमा) प्रतिबिम्बित हो रहे हैं। ऐसा लगता है मानो आपका यह मुख कामदेव का वह दिव्य रथ है जिसमें चार पहिये (दो वास्तविक कुंडल और दो उनके प्रतिबिंब) लगे हुए हैं"। यह दर्शाता है कि माँ के गाल इतने स्वच्छ और दीप्तिमान हैं कि वे संपूर्ण ब्रह्मांडीय प्रकाश को परावर्तित करने में सक्षम हैं।

'देवी भागवत पुराण' के अनुसार, मणिद्वीप की साम्राज्ञी के गालों की आभा पद्मराग मणियों के समान अरुण (लाल) है जो संपूर्ण दिशाओं को प्रकाशित करती है। पुराणों में उल्लेख है कि माँ का यह विग्रह स्वयं 'शुद्ध सत्व' का बना है, जिसमें किसी भी प्रकार की मलिनता नहीं है।

'मूक पंचशती' में मूक कवि वर्णन करते हैं कि माँ के कपोल साधक के हृदय के लिए एक निर्मल दर्पण की तरह हैं। जिस प्रकार दर्पण में अपना वास्तविक स्वरूप दिखता है, माँ के इन दीप्तिमान कपोलों का ध्यान करने से साधक को अपने भीतर की 'शुद्ध आत्मा' का दर्शन होता है।

श्री विद्या साधना और तन्त्र के अनुसार, यह नाम अत्यंत महत्वपूर्ण रहस्य प्रकट करता है: तंत्र शास्त्र में शिव 'प्रकाश' हैं और शक्ति 'विमर्श' (दर्पण) हैं। माँ के गाल दर्पण की तरह हैं, जिसका अर्थ है कि वे उस शुद्ध चेतना का प्रतिबिंब हैं जो इस सृष्टि के रूप में प्रकट होती है।

गालों पर पड़ने वाला कुंडल का प्रतिबिंब यह दर्शाता है कि 'बिंब' (ईश्वर) और 'प्रतिबिंब' (जीव) वास्तव में एक ही हैं। माँ का यह रूप साधक को द्वैत से अद्वैत की ओर ले जाता है।

पद्मराग का लाल रंग 'अनुराग' (दिव्य प्रेम) का प्रतीक है। माँ की पूरी सत्ता करुणा और प्रेम से ओतप्रोत है, जो उनके कपोलों की लालिमा के रूप में झलकती है।

'पद्मराग-शिलादर्श-परिभावि-कपोल-भू' नाम का ध्यान करने से साधक के मानसिक विकार दूर होते हैं और मन दर्पण की तरह स्वच्छ हो जाता है। यह नाम हमें सिखाता है कि जिस प्रकार माँ के गालों पर दिव्य प्रकाश परावर्तित होता है, हमें भी अपने जीवन को माँ की कृपा के प्रकाश से इतना स्वच्छ बनाना चाहिए कि हमारा हृदय भी उनके प्रेम को परावर्तित कर सके। यह माँ के 'स्थूल रूप' (भौतिक विग्रह) के ध्यान की पराकाष्ठा है, जो साधक को अंततः उनके 'सूक्ष्म' और 'पर' रूप की ओर ले जाती है।


* - यह रूप सवर्णदीर्घ सन्धि के नियम से बनता है।

सवर्णस्वरयोः संयोगे दीर्घः स्वरः भवति इति सवर्णदीर्घसन्धिः।  
                                 पाणिनिसूत्रम् "अकः सवर्णे दीर्घः" (६।१।१०१)

जब दो समान वर्ग के स्वर (सवर्ण स्वर) आमने‑सामने आते हैं, तो वे मिलकर एक ही दीर्घ स्वर बन जाते हैं।

यहाँ पर आ + आ = आ (स्वर की गुणवत्ता में कोई परिवर्तन नहीं होता, केवल एक दीर्घ ‘आ’ बना रहता है)

इसी कारण व्याकरण की दृष्टि से शिला + आदर्श = शिलादर्श और समास में इसे शिलाऽदर्श नहीं लिखा जाता, क्योंकि अवग्रह (ऽ) केवल बाह्य सन्धि के लिखित संकेत के रूप में आता है, समस्तपद के भीतर नहीं।

सोमवार, 25 मई 2026

11.पञ्चतन्मात्र-सायका - पञ्चतन्मात्रसायकायै नमः

पञ्चतन्मात्रसायका

प्रार्थना

शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
      तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
      सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥

मनोरूपेक्षु-कोदण्डा पञ्चतन्मात्र-सायका।
निजारुण-प्रभापूर-मज्जद्ब्रह्माण्ड-मण्डला॥३॥

श्री ललिता सहस्रनाम के आयुधों (शस्त्रों) के वर्णन की शृंखला में, 'पाश', 'अंकुश' और 'गन्ने के धनुष' के बाद ग्यारहवां नाम आता है 'पञ्चतन्मात्रसायका'। यह नाम भगवती के उन पाँच पुष्प-बाणों का रहस्य उजागर करता है, जो हमारी पाँच इंद्रियों और उनके सूक्ष्म अनुभवों को नियंत्रित करते हैं।

'पञ्चतन्मात्रसायका' तीन शब्दों के मेल से बना है: पञ्च (पाँच) + तन्मात्र (सूक्ष्म तत्व, जो हमारी इंद्रियों का सार हैं) + सायका (बाण या तीर)। इसका पूर्ण अर्थ है "वह देवी जिन्होंने पाँच तन्मात्रों को बाण के रूप में धारण किया है"।

तन्त्र शास्त्र के अनुसार, ये पाँच बाण उन पाँच सूक्ष्म तत्वों (तन्मात्रों) का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनसे भौतिक जगत का अनुभव होता है:

शब्द: सुनने की शक्ति (आकाश तत्व)।
स्पर्श: महसूस करने की शक्ति (वायु तत्व)।
रूप: देखने की शक्ति (अग्नि तत्व)।
रस: चखने की शक्ति (जल तत्व)।
गंध: सूंघने की शक्ति (पृथ्वी तत्व)।

ये बाण माँ की सामने वाली दाईं भुजा में स्थित हैं।

पाँच पुष्प-बाणों का प्रतीकात्मक अर्थ माँ ललिता के ये बाण पाँच विशिष्ट फूलों के रूप में वर्णित हैं, जिनमें से प्रत्येक का एक विशेष आध्यात्मिक प्रभाव है:

कमल: यह शब्द तन्मात्र से जुड़ा है और 'उन्माद' (हर्षोल्लास) का प्रतीक है।
अशोक: यह स्पर्श तन्मात्र से जुड़ा है और अहंकार को भस्म करने वाली 'तापनी' शक्ति का प्रतीक है।
चूत: यह गंध तन्मात्र से जुड़ा है और अज्ञान का नाश करने वाला 'मरण' बाण है।
नवमल्लिका: यह रस तन्मात्र से जुड़ा है और अनियंत्रित इच्छाओं को सुखाने वाला 'शोषण' बाण है।
नीलोत्पल: यह रूप तन्मात्र से जुड़ा है और दिव्य आकर्षण की 'मोहन' शक्ति का प्रतीक है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, यही पाँच बाण कामदेव के पास भी हैं, जिनका उपयोग वे संसार में मोह और आसक्ति पैदा करने के लिए करते हैं। लेकिन जब यही बाण माँ ललिता के हाथों में होते हैं, तो वे 'क्रिया शक्ति' बन जाते हैं। माँ इन बाणों का उपयोग साधक को सांसारिक बंधनों में फँसाने के बजाय, उसे इंद्रियों के संयम और आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाने के लिए करती हैं।

'पञ्चतन्मात्रसायका' नाम हमें यह सिखाता है कि हमारी इंद्रियाँ आध्यात्मिक मार्ग में बाधा नहीं हैं, यदि हम उन्हें माँ के चरणों में समर्पित कर दें। माँ की कृपा से ये इंद्रियाँ बाहरी विषयों की खोज छोड़कर अंतर्मुखी हो जाती हैं, जिससे साधक को उस 'अमृत' या परमानंद की प्राप्ति होती है जो स्वयं के भीतर छिपा है।

168.निष्क्रोधा - निष्क्रोधायै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...