श्रीविद्या की षोडश नित्याएँ

श्रीविद्या परम्परा में 'नित्या' शब्द अत्यंत गहन अर्थ रखता है। नित्या का अर्थ है 'जो नित्य है', जो काल से परे है, फिर भी काल के भीतर प्रत्येक क्षण, प्रत्येक तिथि और प्रत्येक चन्द्र-कला के रूप में प्रकट होती है। श्रीललिता त्रिपुरसुन्दरी की उपासना में ये नित्याएँ देवी की काल-शक्ति, चन्द्र-शक्ति, मन्त्र-शक्ति और चैतन्य-शक्ति के रूप में समझी जाती हैं।

सामान्य रूप से पन्द्रह नित्याएँ चन्द्रमा की पन्द्रह प्रकट कलाओं से जुड़ी मानी जाती हैं, और सोलहवीं महा-नित्या स्वयं श्रीललिता त्रिपुरसुन्दरी हैं, जो सभी कलाओं का आधार, बिन्दु और परम चैतन्य हैं। इस दृष्टि से नित्याएँ केवल अलग-अलग देवियाँ नहीं हैं; वे एक ही पराशक्ति की पन्द्रह-सोलह ज्योतियाँ हैं। साधक के भीतर वे इच्छा, ज्ञान, क्रिया, सौन्दर्य, करुणा, तेज, रक्षण, विजय, मंगल और आत्मबोध की अवस्थाओं को जाग्रत करती हैं।

नित्याओं के ध्यान-वर्णनों में पाठभेद मिलते हैं। यहाँ चित्र-विन्यास और ध्यान-श्लोक दोनों को सम्मानपूर्वक रखा गया है; दोनों हर स्थान पर शब्दशः एक-दूसरे का वर्णन नहीं करते।

1. श्री कामेश्वरी नित्या

कामेश्वरी नित्या प्रथम तिथि-नित्या मानी जाती हैं। 'कामेश्वरी' नाम का अर्थ केवल लौकिक इच्छा की अधिष्ठात्री नहीं है; यहाँ 'काम' का अर्थ परम इच्छा-शक्ति है। वह दिव्य संकल्प जिसके द्वारा ब्रह्म स्वयं को जगत् के रूप में व्यक्त करता है। वे श्रीललिता की इच्छा-शक्ति का अत्यंत निकट रूप हैं।

चन्द्र-कला
शुक्ल प्रतिपदा चन्द्र-कला अमावस्या चन्द्र-कला
शुक्ल प्रतिपदा अमावस्या
श्री कामेश्वरी नित्या - Sri Kameshwari Nityaa

उनका वर्ण अरुण या रक्त-दीप्त माना जाता है। वे सौन्दर्य, आकर्षण, करुणा और इच्छा-सिद्धि की देवी हैं। उनके हाथों में प्रायः पाश, अंकुश, इक्षु-धनुष और पुष्प-बाण वर्णित होते हैं। ये चार आयुध मन, इन्द्रिय, प्रेम और नियंत्रण के सूक्ष्म प्रतीक हैं। पाश जीव को देवी-कृपा से बाँधता है, अंकुश अहंकार को संयमित करता है, इक्षु-धनुष मन की मधुर शक्ति है, और पुष्प-बाण सूक्ष्म अनुभूतियों तथा चित्त को आकृष्ट करने वाली दिव्य शक्ति हैं।

कामेश्वरी साधक को यह स्मरण कराती हैं कि इच्छा अपने शुद्ध रूप में बन्धन नहीं, बल्कि ईश्वर की ओर मुड़ जाने पर साधना का प्रारम्भ बन सकती है।

अण्डाकार-कोमल मुख, बड़े कमल-जैसे नेत्र, अर्धचन्द्राकार भौहें, कोमल नासिका, हल्की दिव्य मुस्कान, युवा लालिमा, अरुण आभा।

श्री कामेश्वरी नित्या इच्छा-शक्ति की प्रथम ज्योति हैं। उनका स्वरूप लाल अरुण प्रभा से युक्त, मंगलमय और करुणामयी है। वे दिव्य आकर्षण, संकल्प, सौन्दर्य और अनुग्रह की अधिष्ठात्री हैं।

मुख: 1 | नेत्र: 3 | भुजाएँ: 4 | दाहिने हाथ: अंकुश, पुष्प-बाण | बाएँ हाथ: पाश, इक्षु-धनुष।

ध्यान श्लोक:
देवीं ध्यायेज्जगद्धात्रीं जपाकुसुमसन्निभां
    बालभानुप्रतीकाशां शातकुम्भसमप्रभाम्।
रक्तवस्त्रपरीधानां सम्पद्विद्यावशङ्करीं
    नमामि वरदां देवीं कामेशीमभयप्रदाम्॥१॥


2. श्री भगमालिनी नित्या

भगमालिनी नित्या का नाम 'भग' और 'मालिनी' से बना है। 'भग' का अर्थ ऐश्वर्य, सौभाग्य, शक्ति, तेज, आनन्द और सृजन-क्षमता से लिया जाता है। 'मालिनी' अर्थात् माला धारण करने वाली। इस प्रकार वे दिव्य सौभाग्यों की माला धारण करने वाली देवी हैं। श्री ललिता-सहस्रनाम में 'भगमालिनी' नाम 277वें नाम के रूप में प्राप्त होता है; इससे भगमालिनी नित्या का श्रीललिता के सौभाग्य, ऐश्वर्य और आनन्द-स्वरूप से सीधा सम्बन्ध स्पष्ट होता है।

चन्द्र-कला
शुक्ल द्वितीया चन्द्र-कला कृष्ण चतुर्दशी चन्द्र-कला
शुक्ल द्वितीया कृष्ण चतुर्दशी
श्री भगमालिनी नित्या - Sri Bhagamaalini Nityaa

वे रक्त या गाढ़े अरुण वर्ण की, सौम्य किंतु अत्यंत शक्तिशाली देवी मानी जाती हैं। उनके स्वरूप में कमल, पाश, अंकुश, इक्षु-धनुष और पुष्प-बाणों का वर्णन मिलता है। वे आकर्षण, सौभाग्य, समृद्धि, सृजन, दाम्पत्य-मंगल और जीवन में रस की स्थापना से जुड़ी हुई हैं।

भगमालिनी का गूढ़ अर्थ यह है कि देवी जगत् के बिखरे हुए अनुभवों को एक माला में पिरोती हैं। जो जीवन अलग-अलग इच्छाओं, सुख-दुःखों और कर्मों में बिखरा हुआ दिखता है, वही देवी की दृष्टि से एक सुगठित दिव्य माला है।

मुख पर मुस्कान, अधिक मधुर और सौभाग्यपूर्ण है। नेत्रों में करुणा, आकर्षण और पूर्णता का भाव रहता है।

मुख: 1 | नेत्र: 3 | भुजाएँ: 4 | दाहिने हाथ: अंकुश, पुष्प-बाण | बाएँ हाथ: पाश, इक्षु-धनुष।

ध्यान श्लोक:
भगरूपां भगमयां दुकूलवसनां शिवां
    सर्वालङ्कारसम्युक्तां सर्वलोकवशङ्करीम्।
भगोदरीं महादेवीं रक्तोत्पलसमप्रभां
    कामेश्वराङ्कनिलयां वन्दे श्रीभगमालिनीम्॥२॥


3. श्री नित्यक्लिन्ना नित्या

नित्यक्लिन्ना नाम अत्यंत भावपूर्ण है। 'क्लिन्ना' का अर्थ है 'भीगी हुई', 'द्रवित', 'करुणा और प्रेम से पिघली हुई'। नित्यक्लिन्ना वह देवी हैं जिनका हृदय सदा करुणा, प्रेम और अनुग्रह से द्रवित रहता है। वे कठोरता को पिघलाती हैं और चित्त में भक्ति-रस उत्पन्न करती हैं। ललिता-सहस्रनाम में देवी 'नित्यक्लिन्ना' नाम से 388वें नाम में स्तुता हैं। यह नाम देवी के उस करुणामय, प्रेम-द्रवित और अनुग्रहपूर्ण स्वरूप की ओर संकेत करता है।

चन्द्र-कला
शुक्ल तृतीया चन्द्र-कला कृष्ण त्रयोदशी चन्द्र-कला
शुक्ल तृतीया कृष्ण त्रयोदशी
श्री नित्यक्लिन्ना नित्या - Sri Nityaklinnaa Nityaa

उनका वर्ण लाल माना जाता है, और वे लाल चन्दन, लाल वस्त्र तथा लाल आभूषणों से युक्त वर्णित होती हैं। उनके हाथों में पाश, अंकुश, अमृत-पात्र या कलश, और अभय-मुद्रा का उल्लेख मिलता है। उनका स्वरूप प्रेम को आध्यात्मिक शक्ति में बदलने वाला है।

नित्यक्लिन्ना साधक के भीतर सूखे हुए भाव-क्षेत्र को पुनः सरस बनाती हैं। वे बताती हैं कि ज्ञान यदि करुणा से रहित हो तो कठोर हो सकता है; पर देवी-ज्ञान प्रेम से भीगा हुआ होता है।

नेत्रों में करुणा और भक्ति-रस की कोमल द्रवता है। मुस्कान बहुत सूक्ष्म, आर्द्र और हृदय-पिघलाने वाली होती है।

मुख: 1 | नेत्र: 3 | भुजाएँ: 4 | दाहिने हाथ: अंकुश, अभय मुद्रा | बाएँ हाथ: पाश, कलश।

ध्यान श्लोक:
पद्मरागमणिप्रख्यां हेमताटङ्कभूषितां
    रक्तवस्त्रधरां देवीं रक्तमाल्यानुलेपनाम् ।
अञ्जनाञ्चितनेत्रान्तां पद्मपत्रनिभेक्षणां
    नित्यक्लिन्नां नमस्यामि चतुर्भुजविराजिताम् ॥ ३ ॥


4. श्री भेरुण्डा नित्या

भेरुण्डा नित्या का स्वरूप उग्र और रक्षक है। उनका नाम ऐसी शक्ति का संकेत देता है जो विष, भय, बाधा और घोर नकारात्मकता का नाश करती है। वे सौम्य देवी-परम्परा के भीतर स्थित रौद्र-रक्षण-शक्ति हैं।

चन्द्र-कला
शुक्ल चतुर्थी चन्द्र-कला कृष्ण द्वादशी चन्द्र-कला
शुक्ल चतुर्थी कृष्ण द्वादशी
श्री भेरुण्डा नित्या - Sri Bherundaa Nityaa

उनका वर्ण स्वर्ण के समान या तेजोमय माना जाता है। वे अनेक भुजाओं में पाश, अंकुश, ढाल, तलवार, गदा, वज्र, धनुष आदि धारण करती हैं। यह आयुध-विन्यास बताता है कि वे केवल आकर्षण या सौन्दर्य की देवी नहीं, बल्कि साधक के मार्ग में आने वाले विषाक्त संस्कारों, भय और आक्रमणकारी शक्तियों को हटाने वाली देवी हैं।

भेरुण्डा नित्या का आन्तरिक अर्थ है - चित्त में छिपे विष का शमन। यह विष ईर्ष्या, क्रोध, भ्रम, भय, अनियंत्रित वासना या आत्महीनता के रूप में हो सकता है। वे साधक को भीतर से सशक्त बनाती हैं।

दृष्टि तीव्र, सतर्क और रक्षक होती है। मुस्कान बहुत हल्की रहती है; नेत्रों में उग्र-रक्षा और विष-नाश की शक्ति स्पष्ट रहती है।

मुख: 1 | नेत्र: 3 | भुजाएँ: 8 | दाहिने हाथ: अंकुश, खड्ग, वज्र, बाण | बाएँ हाथ: पाश, ढाल, गदा, धनुष।

ध्यान श्लोक:
शुद्धस्फटिकसङ्काशां पद्मपत्रसमप्रभां
    मध्याह्नादित्यसङ्काशां शुभ्रवस्त्रसमन्विताम्।
श्वेतचन्दनलिप्ताङ्गीं शुभ्रमाल्यविभूषितां
    बिभ्रतीं चिन्मयीं मुद्रामक्षमालां च पुस्तकम्।
सहस्रपत्रकमले समासीनां शुचिस्मितां
    सर्वविद्याप्रदां देवीं भेरुण्डां प्रणमाम्यहम्॥४॥


5. श्री वह्निवासिनी नित्या

वह्निवासिनी का अर्थ है अग्नि में निवास करने वाली। वे अग्नि-तत्त्व की दिव्य देवी हैं। अग्नि केवल जलाने वाली नहीं; वह शुद्ध करने वाली, रूपांतरित करने वाली, तेज देने वाली और यज्ञ की वाहिका भी है। वह्निवासिनी उसी परिवर्तनकारी अग्नि की अधिष्ठात्री हैं। श्री ललिता-सहस्रनाम में 'वह्निमण्डलवासिनी' नाम 352वें नाम के रूप में आता है, जो वह्निवासिनी नित्या के अग्नि-मण्डल में स्थित तेजस्विनी शक्ति-स्वरूप से सुन्दर साम्य रखता है।

चन्द्र-कला
शुक्ल पंचमी चन्द्र-कला कृष्ण एकादशी चन्द्र-कला
शुक्ल पंचमी कृष्ण एकादशी
श्री वह्निवासिनी नित्या - Sri Vahnivaasini Nityaa

उनका वर्ण स्वर्णिम या अग्नि के समान दीप्त माना जाता है। वे कमल, शंख, इक्षु-धनुष, पुष्प-बाण, पूर्णचन्द्र, फल आदि प्रतीकों से युक्त वर्णित होती हैं। उनके स्वरूप में अग्नि और चन्द्र, तेज और शीतलता, तप और अमृत — दोनों का संतुलन है।

वह्निवासिनी साधक को बताती हैं कि साधना का तप यदि देवी-कृपा से संयुक्त हो, तो वह जलाता नहीं, बल्कि शुद्ध करता है। वे कर्म, वासना और अज्ञान को अग्नि में परिवर्तित कर उसे तेजस्विता बनाती हैं।

मुख पर त्वचा की आभा स्वर्ण-अग्निमयी होती है। नेत्रों में शान्त अग्नि, तप, शुद्धि और करुणा का तेज रहता है। श्री वह्निवासिनी नित्या अग्नि में निवास करने वाली देवी हैं। वे रोग, मृत्यु-भय, अशुद्धि, जड़ता और अज्ञान को जलाकर साधक में तेज, आयुष्य और शुद्धि जगाती हैं।

मुख: 1 | नेत्र: 3 | भुजाएँ: 8 | दाहिने हाथ: श्वेत कुमुदिनी, स्वर्ण-शृङ्ग, पुष्प-बाण, मातुलुङ्ग फल | बाएँ हाथ: रक्त कमल, शंख, रक्त इक्षु-धनुष, पूर्णचन्द्र मण्डल।

ध्यान श्लोक:
वह्निकोटिप्रतीकाशां सूर्यकोटिसमप्रभां
    अग्निज्वालासमाकीर्णां सर्वरोगोपहारिणीम् ।
कालमृत्युप्रशमनीमपमृत्युनिवारिणीं
    परमायुष्यदां वन्दे नित्यां श्रीवह्निवासिनीम् ॥ ५ ॥


6. श्री महावज्रेश्वरी नित्या

महावज्रेश्वरी नित्या वज्र की शक्ति से जुड़ी हैं। वज्र का अर्थ है अटूट, अदम्य, कठोर किंतु दिव्य प्रकाश से भरा हुआ। वे साधक को आन्तरिक दृढ़ता, अविचलता और आध्यात्मिक संकल्प देती हैं। ललिता-सहस्रनाम में 'वज्रेश्वरी' नाम 468वें नाम के रूप में मिलता है। यह नाम महावज्रेश्वरी नित्या की वज्र-समान अटूट शक्ति, दृढ़ता और रक्षण-भाव को स्मरण कराता है।

चन्द्र-कला
शुक्ल षष्ठी चन्द्र-कला कृष्ण दशमी चन्द्र-कला
शुक्ल षष्ठी कृष्ण दशमी
श्री महावज्रेश्वरी नित्या - Sri Mahavajreshwari Nityaa

उनका वर्ण लाल माना जाता है। वे पाश, अंकुश, इक्षु-धनुष और फल या पुष्प-बाणों से युक्त वर्णित होती हैं। कुछ ध्यानों में वे दिव्य नाव, रक्त-सागर या गूढ़ तांत्रिक प्रतीकों से सम्बद्ध दिखती हैं। इन प्रतीकों का बाह्य रूप विचित्र लग सकता है, पर उनका सूक्ष्म अर्थ है जीवन-सागर में चैतन्य की नाव, जो साधक को अस्थिरता से स्थिरता की ओर ले जाती है।

महावज्रेश्वरी सिखाती हैं कि करुणा और सौन्दर्य के साथ-साथ आध्यात्मिक जीवन में वज्र-समान निश्चय भी चाहिए। बिना दृढ़ता के साधना केवल भावुकता बन सकती है।

मुख पर जबड़ा और दृष्टि थोड़ा दृढ़। मुस्कान करुणामयी रहती है, किंतु संकल्प वज्र-समान अचल होता है। श्री महावज्रेश्वरी नित्या वज्र जैसी अटूट शक्ति, आध्यात्मिक दृढ़ता और रक्षण की देवी हैं। वे साधक को संकल्प, स्थिरता और आन्तरिक शौर्य देती हैं।

मुख: 1 | नेत्र: 3 | भुजाएँ: 4 | दाहिने हाथ: अंकुश, पुष्प-बाण | बाएँ हाथ: पाश, इक्षु-धनुष।

ध्यान श्लोक:
तप्तकाञ्चनसङ्काशां कनकाभरणान्वितं
    हेमताटङ्कसम्युक्तां कस्तूरीतिलकान्विताम्।
हेमचिन्ताकसम्युक्तां पूर्णचन्द्रमुखाम्बुजां
    पीताम्बरसमोपेतां पुष्पमाल्यविभूषिताम्।
मुक्ताहारसमोपेतां मुकुटेन विराजितां
    महावज्रेश्वरीं वन्दे सर्वैश्वर्यफलप्रदाम्॥६॥


7. श्री शिवदूती नित्या

शिवदूती का अर्थ है शिव की दूतिका, शिव-संकल्प की वाहिका। वे वह शक्ति हैं जो शिव की परम चेतना को कर्म-क्षेत्र में लाती हैं। उनका स्वरूप दुर्गा-जैसा तेजस्वी और रक्षक माना जाता है। 'शिवदूती' नाम स्वयं श्री ललिता-सहस्रनाम में 405वें नाम के रूप में विद्यमान है। इससे शिव-संकल्प की वाहिका और दैवी आदेश की दूतिका के रूप में इस नित्या का महत्व प्रकट होता है।

चन्द्र-कला
शुक्ल सप्तमी चन्द्र-कला कृष्ण नवमी चन्द्र-कला
शुक्ल सप्तमी कृष्ण नवमी
श्री महावज्रेश्वरी नित्या - Sri Sivaduti Nityaa

वे प्रायः मध्याह्न-सूर्य के समान तेजस्वी वर्णित होती हैं। उनके हाथों में तलवार, अंकुश, परशु, कमल, ढाल, गदा, पात्र आदि आयुधों का उल्लेख मिलता है। उनके स्वरूप में आदेश, न्याय, धर्म-रक्षण और अधर्म-विनाश की भावना स्पष्ट दिखाई देती है।

शिवदूती साधक को बताती हैं कि दिव्य ज्ञान निष्क्रिय नहीं होता। जब भीतर शिव-चेतना जागती है, तो वह जीवन में धर्म, साहस और सत्य के रूप में कार्य करती है। वे अन्याय, आलस्य और आध्यात्मिक भ्रम के विरुद्ध चेतना की जाग्रत शक्ति हैं।

मुख, पर नेत्र अधिक चौड़े और आदेशपूर्ण होते हैं। भाव रौद्र हो, पर मुख दैवी और सुन्दर रहता है। श्री शिवदूती नित्या वह शक्ति हैं जिनके आदेश पर शिव भी दूत बनते हैं। वे धर्म-रक्षण, आदेश, युद्ध-संकल्प और अधर्म-विनाश की दैवी शक्ति हैं।

मुख: 1 | नेत्र: 3 | भुजाएँ: 8 | दाहिने हाथ: अंकुश, छेदक खड्ग, परशु, कमल | बाएँ हाथ: स्वर्ण-शृङ्ग, ढाल, गदा, रत्न-पात्र।

ध्यान श्लोक:
बालसूर्यप्रतीकाशां बन्धूकप्रसवारुणां
    विधिविष्णुशिवस्तुत्यां देवगन्धर्वसेविताम्।
रक्तारविन्दसङ्काशां सर्वाभरणभूषितां
    शिवदूतीं नमस्यामि रत्नसिंहासनस्थिताम्॥७॥


8. श्री त्वरिता नित्या

त्वरिता का अर्थ है शीघ्र अनुग्रह करने वाली, शीघ्र गति देने वाली। वे साधक के जीवन में रुकावटों को हटाकर गति, साहस और परिणाम देती हैं। उनके नाम में ही दैवी शीघ्रता और करुणा का संकेत है।

चन्द्र-कला
शुक्ल अष्टमी चन्द्र-कला कृष्ण अष्टमी चन्द्र-कला
शुक्ल अष्टमी कृष्ण अष्टमी
श्री त्वरिता नित्या - Sri Tvaritaa Nityaa

उनका वर्ण श्याम या गहरा माना जाता है। वे पाश, अंकुश, वर-मुद्रा और अभय-मुद्रा से युक्त कही जाती हैं। कुछ वर्णनों में वे सिंहों और वन्य शक्तियों से घिरी हुई, मोर-पिच्छ मुकुट या वन्य सौन्दर्य से सम्पन्न दिखाई देती हैं। इससे उनका सम्बन्ध प्रकृति की त्वरित और स्वाभाविक शक्ति से जुड़ता है।

त्वरिता नित्या का आन्तरिक अर्थ है - जहाँ साधक का मन जड़ता, भय या विलम्ब में फँस गया हो, वहाँ देवी गति प्रदान करती हैं। वे आध्यात्मिक आलस्य को तोड़कर साधक को आगे बढ़ाती हैं।

मुख पर नेत्र अत्यन्त सतर्क, शीघ्र-प्रतिक्रिया वाले और रक्षक होते हैं। भाव तेज, सक्रिय और करुणामय होते हैं। श्री त्वरिता नित्या शीघ्र कृपा देने वाली देवी हैं। वे बाधाओं को शीघ्र हटाती हैं, भय दूर करती हैं और साधक को आध्यात्मिक गति प्रदान करती हैं।

मुख: 1 | नेत्र: 3 | भुजाएँ: 4 | दाहिने हाथ: अंकुश, अभय मुद्रा | बाएँ हाथ: पाश, वरद मुद्रा।

ध्यान श्लोक:
रक्तारविन्दसङ्काशामुद्यत्सूर्यसमप्रभां
    दधतीमङ्कुशं पाशं बाणं चापं मनोहरम्।
चतुर्भुजां महादेवीमप्सरोगणसङ्कुलां
    नमामि त्वरितां नित्यां भक्तानामभयप्रदम्॥८॥


9. श्री कुलसुन्दरी नित्या

कुलसुन्दरी नाम अत्यंत गूढ़ है। 'कुल' श्रीविद्या में केवल वंश या परिवार नहीं, बल्कि शक्ति-परम्परा, शरीर, चेतना, तत्त्वों और सूक्ष्म चक्रों का भी संकेत है। 'सुन्दरी' वह है जो इस कुल-तत्त्व को सौन्दर्य और सामंजस्य में प्रकट करती है।

चन्द्र-कला
शुक्ल नवमी चन्द्र-कला कृष्ण सप्तमी चन्द्र-कला
शुक्ल नवमी कृष्ण सप्तमी
श्री कुलसुन्दरी नित्या - Sri Kulasundari Nityaa

उनका वर्ण लाल या अरुण माना जाता है। वे अनेक मुखों और भुजाओं से युक्त वर्णित होती हैं। उनके हाथों में पुस्तक, लेखनी, जपमाला, कमण्डलु, कमल, शंख, रत्नमाला, फल आदि प्रतीक मिलते हैं। यह स्वरूप बताता है कि वे केवल युद्ध-शक्ति नहीं, बल्कि विद्या, वाक्, साधना, रस और आध्यात्मिक अनुशासन की देवी हैं।

कुलसुन्दरी साधक को सिखाती हैं कि शरीर, मन्त्र, चक्र, गुरु-परम्परा और आत्मज्ञान अलग-अलग वस्तुएँ नहीं हैं। जब ये सब देवी की दृष्टि में एक हो जाते हैं, तब साधना सुन्दर बनती है।

भाव विद्या, बाल-शक्ति, सौम्यता और गूढ़ श्रीविद्या ज्ञान का होती हैं। श्री कुलसुन्दरी नित्या कुल-विद्या, मन्त्र, वाक्, शास्त्र और आन्तरिक सौन्दर्य की देवी हैं। वे ज्ञान, भाषा, गुरु-परम्परा और साधना-सौन्दर्य को प्रकाशित करती हैं।

मुख: 6 | प्रत्येक मुख में नेत्र: 3 | भुजाएँ: 12 | दाहिने हाथ: प्रवाल-जपमाला, कमल, रत्नकलश, पान-पात्र, मातुलुङ्ग फल, व्याख्या मुद्रा | बाएँ हाथ: पुस्तक, रक्त कमल, स्वर्ण लेखनी, रत्नमाला, शंख, वरद मुद्रा।

ध्यान श्लोक:
अरुणकिरणजालैरञ्जिताशावकाशा
    विधृतजपवटीका पुस्तकाभीतिहस्ता।
इतरकरवराढ्या फुल्लकह्लारसंस्था
    निवसतु हृदि बाला नित्यकल्याणशीला॥९॥


10. श्री नित्या नित्या

दसवीं नित्या को 'नित्या' नाम से ही पुकारा जाता है। यह नाम अत्यंत दार्शनिक है - नित्या स्वयं नित्यत्व की देवी हैं। वे समय में प्रकट होकर भी समयातीत सत्ता की ओर संकेत करती हैं। श्री ललिता-सहस्रनाम में 'नित्या' नाम 136वें नाम के रूप में आता है। यह नाम देवी की कालातीत, अविनाशी और सदा-वर्तमान चैतन्य-शक्ति का बोध कराता है।

चन्द्र-कला
शुक्ल दशमी चन्द्र-कला कृष्ण षष्ठी चन्द्र-कला
शुक्ल दशमी कृष्ण षष्ठी
श्री नित्या नित्या - Sri Nityaa Nityaa

उनका वर्ण उदय होते सूर्य के समान माना जाता है। वे अनेक मुखों और भुजाओं वाली वर्णित होती हैं। उनके हाथों में पुस्तक, पुष्प-बाण, खड्ग, कपाल, पाश, अंकुश, इक्षु-धनुष, त्रिशूल, ढाल, अभय और वर-मुद्रा जैसे प्रतीक मिलते हैं। उनका स्वरूप ज्ञान, शक्ति, रक्षण, संहार और करुणा — सभी को समेटता है।

नित्या नित्या साधक को यह बोध देती हैं कि हर क्षण बदलता है, पर हर क्षण के भीतर एक अबदल चैतन्य है। वही देवी का नित्य रूप है। वे परिवर्तन में अपरिवर्तन को देखने की शक्ति देती हैं।

मुख पर भाव कालातीत, गम्भीर और ज्ञानाग्नि-युक्त होती हैं। मुस्कान बहुत सूक्ष्म, नेत्र स्थिर और तेजस्वी रहता हैं। श्री नित्या नित्या नित्यत्व की देवी हैं। वे बदलते क्षणों के भीतर स्थित अपरिवर्तनीय चेतना का बोध कराती हैं और अज्ञान को काटती हैं।

मुख: 1 | नेत्र: 3 | भुजाएँ: 12 | दाहिने हाथ: अंकुश, पुस्तक, पुष्प-बाण, खड्ग, कपाल-पात्र, अभय मुद्रा | बाएँ हाथ: पाश, श्वेत कमल, इक्षु-धनुष, ढाल, त्रिशूल, वरद मुद्रा।

ध्यान श्लोक:
उद्यत्प्रद्योतननिभां जपाकुसुमसन्निभां
    हरिचन्दनलिप्ताङ्गीं रक्तमाल्यविभूषिताम् ।
रत्नाभरणभूषाङ्गीं रक्तवस्त्रसुशोभितां
    जगदम्बां नमस्यामि नित्यां श्रीपरमेश्वरीम् ॥ १० ॥


11. श्री नीलपताका नित्या

नीलपताका का अर्थ है नीले ध्वज वाली। ध्वज विजय, दिशा, पहचान और संकल्प का प्रतीक है। नील वर्ण गहन आकाश, रहस्य, अनन्तता और गूढ़ चेतना का संकेत देता है। अतः नीलपताका वह देवी हैं जो साधक के भीतर दिव्य संकल्प का ध्वज फहराती हैं।

चन्द्र-कला
शुक्ल एकादशी चन्द्र-कला कृष्ण पंचमी चन्द्र-कला
शुक्ल एकादशी कृष्ण पंचमी
श्री नीलपताका नित्या - Sri Neelapataakaa Nityaa

उनका वर्ण नीलमणि के समान माना जाता है। वे अनेक मुखों और भुजाओं वाली, ध्वज, शस्त्र, धनुष, बाण, पाश, अंकुश आदि धारण करने वाली देवी के रूप में वर्णित होती हैं। उनका स्वरूप गहन, प्रभावशाली और रक्षक है।

नीलपताका साधक को सिखाती हैं कि साधना में दिशा आवश्यक है। केवल भाव, शक्ति या ज्ञान पर्याप्त नहीं; उन्हें एक ध्वज, एक लक्ष्य और एक दिव्य अनुशासन चाहिए। वे भ्रमित चित्त को दिशा देती हैं।

मुख भाव नील आकाश जैसा गम्भीर, विजयी, आदेशपूर्ण और रक्षक होती हैं। श्री नीलपताका नित्या नील ध्वज की देवी हैं। वे दिशा, विजय, आध्यात्मिक ध्वज, संरक्षण और दैवी शासन की शक्ति प्रकट करती हैं।

मुख: 5 | प्रत्येक मुख में नेत्र: 3 | भुजाएँ: 10 | दाहिने हाथ: अंकुश, शक्ति-अस्त्र, खड्ग, बाण, अभय मुद्रा | बाएँ हाथ: पाश, नील ध्वज, ढाल, शृङ्ग-धनुष, वरद मुद्रा।

ध्यान श्लोक:
पञ्चवक्त्रां त्रिनयनामरुणांशुकधारिणीं
    दशहस्तां लसन्मुक्ताप्रायाभरणमण्डिताम् ।
नीलमेघसमप्रख्यां धूम्रार्चिसदृशप्रभां
    नीलपुष्पस्रजोपेतां ध्यायेन्नीलपताकिनीम् ॥ ११ ॥


12. श्री विजया नित्या

विजया नित्या विजय की अधिष्ठात्री हैं। यह विजय केवल बाहरी शत्रुओं पर नहीं, बल्कि आन्तरिक दुर्बलताओं पर भी है। साधना में सबसे बड़ी विजय है अपने ही भय, संशय, अहंकार और अज्ञान पर विजय। ललिता-सहस्रनाम में 'विजया' नाम 346वें नाम के रूप में मिलता है। यह नाम विजय, सिद्धि, आत्मबल और दैवी सफलता प्रदान करने वाली देवी-शक्ति की स्मृति जगाता है।

चन्द्र-कला
शुक्ल द्वादशी चन्द्र-कला कृष्ण चतुर्थी चन्द्र-कला
शुक्ल द्वादशी कृष्ण चतुर्थी
श्री विजया नित्या - Sri Vijaya Nityaa

उनका वर्ण उदय-सूर्य के समान लाल-स्वर्णिम माना जाता है। वे अनेक मुखों और भुजाओं से युक्त, शंख, चक्र, पाश, अंकुश, धनुष, बाण, ढाल, कमल, फल आदि प्रतीकों के साथ वर्णित होती हैं। उनके स्वरूप में वैष्णवी और शक्तिमयी दोनों प्रकार की विजय-ऊर्जा दिखाई देती है।

विजया नित्या साधक को विजय का सही अर्थ बताती हैं। बाहरी सफलता तभी मंगलमय है जब भीतर अहंकार न बढ़े। उनकी कृपा से विजय धर्मयुक्त, संतुलित और आत्मोन्नतिकारी बनती है।

नेत्रों में विजय, साहस और धर्म-संकल्प होता है। मुस्कान विजयी और शुभ होती है। श्री विजया नित्या धर्मयुक्त विजय, साहस, सफलता और संरक्षण की देवी हैं। वे साधक को भय, भ्रम और बाधाओं पर विजय देती हैं।

मुख: 5 | प्रत्येक मुख में नेत्र: 3 | भुजाएँ: 10 | दाहिने हाथ: चक्र, अंकुश, बाण, मातुलुङ्ग फल, अभय मुद्रा | बाएँ हाथ: शंख, पाश, ढाल, धनुष, श्वेत कुमुदिनी।

ध्यान श्लोक:
उद्यदर्कसमप्रभां दाडिमीपुष्पसन्निभां
    रत्नकङ्कणकेयूरकिरीटाङ्गदसम्युताम् ।
देवगन्धर्वयोगीशमुनिसिद्धनिषेवितां
    नमामि विजयां नित्यां सिंहोपरिकृतासनाम् ॥ १२ ॥


13. श्री सर्वमङ्गला नित्या

सर्वमङ्गला का अर्थ है सब प्रकार के मंगल की अधिष्ठात्री। उनका स्वरूप अपेक्षाकृत सौम्य, कल्याणमय और गृहस्थ-जीवन के मंगल से भी सम्बद्ध माना जाता है। वे देवी की वह शक्ति हैं जो जीवन में शान्ति, संतुलन, शुभता और सौभाग्य स्थापित करती हैं। 'सर्वमङ्गला' नाम श्री ललिता-सहस्रनाम में 200वें नाम के रूप में गाया गया है। यह नाम देवी के सर्वथा शुभ, कल्याणकारी और मंगल-प्रद स्वरूप को प्रकट करता है।

चन्द्र-कला
शुक्ल त्रयोदशी चन्द्र-कला कृष्ण तृतीया चन्द्र-कला
शुक्ल त्रयोदशी कृष्ण तृतीया
श्री सर्वमङ्गला नित्या - Sri Sarvamangala Nityaa

उनका वर्ण स्वर्णिम माना जाता है। वे चार भुजाओं में फल, पात्र, अभय और वर-मुद्रा धारण करती हुई कमल पर स्थित वर्णित होती हैं। उनका रूप सरल, शांत और आशीर्वादमय है। वे उग्र युद्ध-शक्ति की अपेक्षा कल्याण और पूर्णता की देवी के रूप में प्रकट होती हैं।

सर्वमङ्गला साधक को बताती हैं कि देवी का परम अनुग्रह केवल चमत्कार में नहीं, बल्कि जीवन के संतुलन, परिवार के सौहार्द, शुद्ध बुद्धि, स्वास्थ्य, धर्म और आन्तरिक प्रसन्नता में भी प्रकट होता है।

मुख सबसे शांत, सौम्य और आशीर्वादमयी अभिव्यक्ति रहता हैं। श्री सर्वमङ्गला नित्या कल्याण, शान्ति, समृद्धि, रक्षा और सौभाग्य की देवी हैं। उनका स्वरूप सर्वशुभता और सार्वभौमिक मंगल का प्रतीक है। इस रूप में दो-भुजा और चार-भुजा दोनों परम्पराएँ मिलती हैं

मुख: 1 | नेत्र: 2 | भुजाएँ: 4 | दाहिने हाथ: मातुलुङ्ग फल, अभय मुद्रा | बाएँ हाथ: अमृत-पात्र, वरद मुद्रा।

ध्यान श्लोक:
रक्तोत्पलसमप्रख्यां पद्मपत्रनिभेक्षणां
    इक्षुकार्मुकपुष्पौघपाशाङ्कुशसमन्विताम् ।
सुप्रसन्नां शशिमुखीं नानारत्नविभूषितां
    शुभ्रपद्मासनस्थां तां भजामि सर्वमङ्गलाम् ॥ १३ ॥


14. श्री ज्वालामालिनी नित्या

ज्वालामालिनी का अर्थ है अग्नि-ज्वालाओं की माला धारण करने वाली। वे चतुर्दशी तिथि से सम्बद्ध मानी जाती हैं और अत्यंत तेजस्वी रक्षक देवी हैं। उनके स्वरूप में अग्नि, रक्षण, संहार और आध्यात्मिक प्रकाश एक साथ प्रकट होते हैं। श्री ललिता-सहस्रनाम के 71वें नाम 'ज्वालामालिनिकाक्षिप्त-वह्नि-प्राकार-मध्यगा' में ज्वालामालिनी नित्या का स्पष्ट स्मरण आता है। यह नाम देवी के अग्नि-प्राकार और रक्षणमयी ज्वाला-शक्ति से सम्बन्ध को दर्शाता है।

चन्द्र-कला
शुक्ल चतुर्दशी चन्द्र-कला कृष्ण द्वितीया चन्द्र-कला
शुक्ल चतुर्दशी कृष्ण द्वितीया
श्री ज्वालामालिनी नित्या - Sri Jvaalaamaalini Nityaa

उनका वर्ण अग्नि-ज्वाला के समान बताया जाता है। वे छह मुखों और बारह भुजाओं वाली भी वर्णित होती हैं, प्रत्येक मुख में तीन नेत्र, और हाथों में पाश, अंकुश, खड्ग, ढाल, धनुष, बाण, गदा, शूल, अग्नि आदि आयुधों के साथ। वे अभय और वर-मुद्रा भी प्रदान करती हैं। इस प्रकार उनका रूप उग्र होते हुए भी भक्तवत्सल है।

ज्वालामालिनी का विशेष आध्यात्मिक अर्थ है अज्ञान के अंधकार को जलाने वाली रक्षा-ज्योति। वे साधक के चारों ओर अग्नि-प्राकार की तरह सुरक्षा देती हैं। उनके भीतर की ज्वाला विनाशकारी नहीं, बल्कि अविद्या, भय और दुष्ट संस्कारों को जलाने वाली ज्ञान-ज्वाला है।

मुख भाव अग्नि-जैसा उग्र, रक्षक, तेजस्वी और करुणामय होता हैं । मुस्कान हल्की रहती हैं, पर नेत्रों में ज्वाला और आदेश होता हैं। श्री ज्वालामालिनी नित्या अग्नि-माला धारण करने वाली देवी हैं। वे अशुद्धि, भय, शत्रुता और अज्ञान को जलाती हैं तथा साधक के चारों ओर अग्नि-प्राकार जैसी रक्षा स्थापित करती हैं।

मुख: 6 | प्रत्येक मुख में नेत्र: 3 | भुजाएँ: 12 | दाहिने हाथ: अंकुश, खड्ग, बाण, गदा, अग्नि, अभय मुद्रा | बाएँ हाथ: पाश, ढाल, धनुष, कूर्म-चिह्न, त्रिशूल, वरद मुद्रा।

ध्यान श्लोक:
अग्निज्वाला समाभाक्षीं नीलवक्त्रां चतुर्भुजां
    नीलनीरदसङ्काशां नीलकेशीं तनूदरीम् ।
खड्गं त्रिशूलं बिभ्राणां वरांसाभयमेव च
    सिंहपृष्ठसमारूढां ध्यायेज्ज्वालाद्यमालिनीम् ॥ १४ ॥


15. श्री चित्रा नित्या

चित्रा नित्या पन्द्रहवीं तिथि-नित्या मानी जाती हैं। 'चित्रा' का अर्थ है विचित्र, उज्ज्वल, विविध रंगों से युक्त, अद्भुत। वे देवी की वह शक्ति हैं जो सृष्टि को विविधता, कला, रूप, रंग और सूक्ष्म रचना देती हैं।

चन्द्र-कला
पूर्णिमा चन्द्र-कला कृष्ण प्रतिपदा चन्द्र-कला
पूर्णिमा कृष्ण प्रतिपदा
श्री चित्रा नित्या - Sri Chitra Nitya

उनका वर्ण उदय-सूर्य की किरणों जैसा माना जाता है। वे चार भुजाओं में पाश, अंकुश, वर और अभय-मुद्रा धारण करती हुई वर्णित होती हैं। उनका स्वरूप अपेक्षाकृत शांत, प्रकाशपूर्ण और सौन्दर्यमय है। वे विविधता के भीतर छिपी दिव्य योजना की प्रतीक हैं।

चित्रा साधक को यह बोध देती हैं कि जगत् की विविधता भ्रम मात्र नहीं; देवी की लीला में हर रंग, हर रूप और हर अनुभव का स्थान है। जब साधक का चित्त शुद्ध होता है, तो वह संसार को बन्धन नहीं, देवी की चित्-शक्ति की चित्र-विभूति के रूप में देखता है।

मुख पर अभिव्यक्ति सूक्ष्म, कलात्मक, रहस्यमयी और ज्ञानमयी होता हैं। नेत्रों में सृष्टि की विविधता और आन्तरिक दृष्टि का भाव रहता है।

श्री चित्रा नित्या दिव्य रचना, रूप-विविधता, मन्त्र-रूप और सूक्ष्म सृष्टि-चित्र की देवी हैं। वे जगत् की विविधता में छिपी दिव्य योजना को प्रकाशित करती हैं।

मुख: 1 | नेत्र: 3 | भुजाएँ: 4 | दाहिने हाथ: अंकुश, अभय मुद्रा | बाएँ हाथ: पाश, वरद मुद्रा।

ध्यान-पाठ में पुष्प-बाण और इक्षु-चाप का भी उल्लेख मिलता है।

ध्यान श्लोक:
शुद्धस्फटिकसङ्काशां पलाशकुसुमप्रभां
    नीलमेघप्रतीकाशां चतुर्हस्तां त्रिलोचनाम् ।
सर्वालङ्कारसम्युक्तां पुष्पबाणेक्षुचापिनीं
    पाशाङ्कुशसमोपेतां ध्यायेच्चित्रां महेश्वरीम् ॥ १५ ॥


16. श्री महा-नित्या/श्रीललिता त्रिपुरसुन्दरी

सोलहवीं नित्या महा-नित्या हैं स्वयं श्रीललिता त्रिपुरसुन्दरी। वे पन्द्रह तिथि-नित्याओं की अधिष्ठात्री, स्रोत और पूर्णता हैं। यदि पन्द्रह नित्याएँ चन्द्रमा की पन्द्रह कलाएँ हैं, तो महा-नित्या वह अदृश्य पूर्ण चैतन्य हैं जिससे सभी कलाएँ प्रकट होती हैं और जिसमें अंततः लीन होती हैं। श्री ललिता-सहस्रनाम में 'नित्या-षोडशिकारूपा' नाम 391वें नाम के रूप में आता है। इसका अर्थ है वे देवी जो षोडश नित्याओं के रूप में प्रकट होती हैं। इस नाम में कामेश्वरी से चित्रा तक पन्द्रह तिथि-नित्याएँ और उनसे परे, उन सबकी अधिष्ठात्री महा-नित्या स्वयं श्रीललिता त्रिपुरसुन्दरी समाहित हैं। इस प्रकार महा-नित्या सभी चन्द्र-कलाओं, तिथियों और नित्य-शक्तियों की मूल परम चैतन्य-स्वरूपिणी हैं।



श्री महा-नित्या/श्रीललिता त्रिपुरसुन्दरी - Sri Maha Nityaa / Sri Lalita Tripura Sundari

श्रीललिता त्रिपुरसुन्दरी का स्वरूप अरुण, सौन्दर्यमय, करुणामय और परम राजराजेश्वरी के रूप में ध्यान किया जाता है। वे पाश, अंकुश, इक्षु-धनुष और पंच-पुष्प-बाण धारण करती हैं। उनके आयुध बाहरी युद्ध के साधन नहीं, बल्कि चित्त, इच्छा, आकर्षण, करुणा और आत्मसमर्पण के सूक्ष्म संकेत हैं।

महा-नित्या के रूप में वे केवल किसी एक तिथि की देवी नहीं हैं; वे सभी तिथियों, सभी कलाओं, सभी मन्त्रों, सभी चक्रों और सभी शक्तियों की मूल सत्ता हैं। वे समय में भी हैं और समय से परे भी। वे साधक को यह अंतिम बोध देती हैं कि नित्याएँ अलग-अलग शक्तियाँ नहीं, बल्कि उसी एक पराशक्ति की विविध दीप्तियाँ हैं।

मुख पर अरुण-स्वर्ण प्रभा, पूर्ण कमल-नेत्र, कोमल चिबुक, सौम्य लाल अधर, शांत दिव्य मुस्कान, और करुणामय राजराजेश्वरी तेज। श्री महा-नित्या स्वयं श्रीललिता त्रिपुरसुन्दरी हैं। वे सभी नित्याओं की पूर्णता, श्रीविद्या की परम अधिष्ठात्री, चन्द्रकलाओं की मूल सत्ता और सौन्दर्य-चेतना-शक्ति की परम देवी हैं।

मुख: 1 | नेत्र: 3 | भुजाएँ: 4 | दाहिने हाथ: अंकुश, पंच-पुष्प-बाण | बाएँ हाथ: पाश, इक्षु-धनुष।

ध्यान श्लोक:
आरक्ताभां त्रिनेत्रामरुणिमवसनां रत्नताटङ्करम्यां
    हस्ताम्भोजैः सपाशाङ्कुशमदनधनुः सायकैर्विस्फुरन्तीम् ।
आपीनोत्तुङ्गवक्षोरुहकलशलुठत्तारहारोज्ज्वलाङ्गीं
    ध्यायेदम्भोरुहस्थामरुणिमवसनामीश्वरीमीश्वराणाम् ॥ १६ ॥


समग्र भाव

षोडश नित्याओं का दर्शन यह बताता है कि समय केवल क्षय का नाम नहीं है। समय देवी का शरीर है। प्रत्येक तिथि, प्रत्येक चन्द्र-कला, प्रत्येक भाव और प्रत्येक अनुभव देवी की किसी न किसी नित्या-शक्ति का प्रकटन है। कामेश्वरी में इच्छा शुद्ध होती है; भगमालिनी में सौभाग्य जागता है; नित्यक्लिन्ना में हृदय द्रवित होता है; भेरुण्डा में विष नष्ट होता है; वह्निवासिनी में तप शुद्ध होता है; महावज्रेश्वरी में संकल्प दृढ़ होता है; शिवदूती में धर्म सक्रिय होता है; त्वरिता में गति आती है; कुलसुन्दरी में ज्ञान और परम्परा सुन्दर बनते हैं; नित्या में नित्यत्व का बोध होता है; नीलपताका दिशा देती हैं; विजया विजय देती हैं; सर्वमङ्गला शुभता देती हैं; ज्वालामालिनी रक्षा-ज्वाला बनती हैं; चित्रा जगत् की दिव्य विविधता दिखाती हैं; और महा-नित्या श्रीललिता इन सबको एक पूर्ण चैतन्य में समेट लेती हैं।

इस प्रकार षोडश नित्याएँ श्रीविद्या की केवल देवियों की सूची नहीं हैं; वे चन्द्र, काल, मन्त्र, चक्र और आत्मबोध की क्रमिक रहस्य-माला हैं। साधक जब उन्हें श्रद्धा से स्मरण करता है, तो वह धीरे-धीरे समय के बन्धन से समय की अधिष्ठात्री देवी तक पहुँचता है और अंततः उसी महा-नित्या श्रीललिता त्रिपुरसुन्दरी में विश्रान्ति पाता है।

123.शारदाराध्या - शारदाराध्यायै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...