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सोमवार, 24 अगस्त 2026

102.विष्णुग्रन्थि-विभेदिनी - विष्णुग्रन्थिविभेदिन्यै नमः

विष्णुग्रन्थि-विभेदिनी

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

मूलाधारैकनिलया ब्रह्मग्रन्थिविभेदिनी ।
मणिपूरान्तरुदिता विष्णुग्रन्थिविभेदिनी ॥३८॥

पूर्वनाम मणि-पूरान्तरुदिता में श्रीललिताम्बिका का मणिपूरचक्र में प्रकट होना वर्णित हुआ। अब विष्णुग्रन्थि-विभेदिनी उसी ऊर्ध्वगामी क्रम को आगे बढ़ाता है। यहाँ देवी कुण्डलिनी-रूपा होकर केवल किसी चक्र में स्थित नहीं हैं, बल्कि आगे के मार्ग को अवरुद्ध करने वाली विष्णुग्रन्थि का विशेष रूप से भेदन करती हैं। अतः यह नाम गति, अवरोध-भेदन और चेतना के क्रमिक ऊर्ध्वारोहण का सूचक है।

The preceding name, Maṇi-pūrāntaruditā, described Śrī Lalitāmbikā as manifesting within the Maṇipūra cakra. Viṣṇugranthi-vibhedinī continues that upward movement. Here the Goddess, in the form of Kuṇḍalinī, does not merely abide in a cakra; she specifically breaks through the Viṣṇugranthi that obstructs the further ascent. The name therefore points to movement, the piercing of an obstruction, and the progressive ascent of consciousness.

पदच्छेद एवं प्रत्यक्ष अर्थ

विष्णु-ग्रन्थि-विभेदिनी

यहाँ विष्णु उस ग्रन्थि की विशिष्ट संज्ञा से सम्बद्ध है, ग्रन्थि का सामान्य अर्थ गाँठ, बन्ध अथवा ऐसा संधि-स्थान है जो मार्ग को बाँधता या रोकता है, और विभेदिनी स्त्रीलिङ्ग पद है, जिसका अर्थ है विशेष रूप से भेदने वाली, खोलने वाली अथवा आर-पार कर देने वाली। वि उपसर्ग भेदन की क्रिया में विशेषता या पूर्णता का भाव देता है। इस प्रकार नाम का प्रत्यक्ष अर्थ है: वे श्रीललिताम्बिका जो विष्णुग्रन्थि का विशेष रूप से भेदन करती हैं।

Here Viṣṇu forms part of the specific designation of the knot; granthi ordinarily means a knot, bond, or constricted junction that binds or obstructs a passage; and vibhedinī is a feminine expression meaning “she who distinctly pierces, opens, or breaks through.” The prefix vi gives the act of piercing a sense of particularity or completeness. The direct meaning is therefore: Śrī Lalitāmbikā who specifically pierces the Viṣṇugranthi.

अर्चना-रूप विष्णुग्रन्थिविभेदिन्यै नमः में विभेदिनी का चतुर्थी एकवचन विभेदिन्यै होता है। अतः नमस्कार उस देवी को है जो इस ग्रन्थि को भेदकर ऊर्ध्वमार्ग को निर्बाध करती हैं।

In the worship form Viṣṇugranthivibhedinyai namaḥ, the feminine noun vibhedinī takes the dative singular form vibhedinyai. The salutation is thus offered to the Goddess who pierces this knot and clears the upward path.

भास्कररायीय अर्थ

सौभाग्यभास्कर में भास्करराय मखिन् इस नाम को पूर्वनाम के साथ एक निरन्तर प्रक्रिया के रूप में समझाते हैं। मणिपूरचक्र के भीतर देवी के उदित होने का वर्णन करने के बाद वे कहते हैं कि उसके ऊपर स्थित विष्णुग्रन्थि को वे विशेष रूप से भेदती हैं। इस व्याख्या में नाम किसी सामान्य रूपक का नाम नहीं है, बल्कि सूक्ष्म शरीर में कुण्डलिनी के क्रमिक आरोहण का एक निश्चित चरण है।

In the Saubhāgyabhāskara, Bhāskararāya Makhin understands this name as a continuous process with the preceding one. After describing the Goddess as arising within Maṇipūra, he explains that she specifically pierces the Viṣṇugranthi situated above it. In this reading, the name is not merely a general metaphor; it denotes a definite stage in the progressive ascent of Kuṇḍalinī through the subtle body.

भास्करराय आगे इस संज्ञा का कारण भी स्पष्ट करते हैं। मणिपूरचक्र से विष्णु का सम्बन्ध स्वीकार करते हुए वे उसके ग्रन्थि-स्थानों को विष्णुग्रन्थि नाम से सम्बोधित करते हैं। इससे एक महत्त्वपूर्ण बात सामने आती है: ब्रह्मग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि और रुद्रग्रन्थि केवल देवताओं के नामों से बने काव्यात्मक विशेषण नहीं हैं; वे चक्र-क्रम के विशिष्ट अवरोध-बिन्दुओं की पारम्परिक संज्ञाएँ हैं।

Bhāskararāya also explains the basis of the designation. By associating Viṣṇu with the Maṇipūra cakra, he identifies the relevant knot-junctions with the name Viṣṇugranthi. This establishes an important point: Brahmagranthi, Viṣṇugranthi, and Rudragranthi are not merely poetic expressions formed from the names of deities; they are traditional designations for particular obstructing junctions within the cakra sequence.

इसी प्रसंग में भास्करराय इस नाम-समूह का एक व्यापक कौलिक अर्थ भी संकेत करते हैं। उनके द्वारा उद्धृत परम्परा में चक्रों के युग्मों को पृथ्वी-जल, वह्नि-सूर्य तथा वायु-आकाश के आधार पर क्रमशः ब्रह्मग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि और रुद्रग्रन्थि से सम्बद्ध किया गया है। इससे ज्ञात होता है कि ग्रन्थि का अर्थ केवल एक बिन्दु पर बनी स्थूल गाँठ समझना पर्याप्त नहीं है। यह चक्र-समूह के भीतर शक्ति के मार्ग में उपस्थित एक तात्त्विक संधि या सीमा का भी द्योतक हो सकता है।

In the same context, Bhāskararāya also indicates a broader Kaulika interpretation of this group of names. In the tradition he cites, pairs of cakras are related to earth and water, fire and sun, and air and space, and are respectively designated in connection with Brahmagranthi, Viṣṇugranthi, and Rudragranthi. This shows that a granthi need not be imagined merely as a physical-looking knot at a single point. It can also signify a doctrinal junction or boundary encountered by Śakti within the cakra system.

चक्र और ग्रन्थि के क्रम में इस नाम का स्थान

सहस्रनाम का पाठ स्वयं इस क्रम को अत्यन्त सघन रूप में रखता है: पहले मूलाधारैकनिलया, फिर ब्रह्मग्रन्थिविभेदिनी, उसके बाद मणि-पूरान्तरुदिता और अब विष्णुग्रन्थि-विभेदिनी। अतः प्रत्येक नाम को अलग-अलग स्थिर चित्र की तरह देखने के स्थान पर इन्हें एक आरोही प्रवाह के रूप में पढ़ना अधिक उपयुक्त है। भगवती मूलाधार में अवस्थित शक्ति हैं, मार्ग का प्रथम अवरोध भेदती हैं, मणिपूर में प्रकट होती हैं और फिर वहाँ से आगे बढ़ते हुए विष्णुग्रन्थि का भेदन करती हैं।

The Sahasranāma itself presents this sequence with remarkable compactness: first Mūlādhāraika-nilayā, then Brahmagranthi-vibhedinī, followed by Maṇi-pūrāntaruditā, and now Viṣṇugranthi-vibhedinī. These names are therefore better read as an ascending flow than as unrelated static images. The Goddess is the power abiding in Mūlādhāra, she pierces the first obstruction, becomes manifest in Maṇipūra, and then advances onward by piercing the Viṣṇugranthi.

यहाँ विभेदिनी शब्द विशेष ध्यान देने योग्य है। कुण्डलिनी का आरोहण केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँच जाने का वर्णन नहीं है। जहाँ ग्रन्थि है वहाँ मार्ग में वास्तविक अवरोध का भाव निहित है, और जहाँ देवी विभेदिनी कही गयी हैं वहाँ उस सीमा का उल्लंघन उनकी शक्ति से होता है। इसलिए इस नाम का केन्द्र मणिपूर की स्थिति नहीं, बल्कि मणिपूर से आगे बढ़ने की सामर्थ्य है।

The word vibhedinī deserves particular attention. The ascent of Kuṇḍalinī is not described merely as movement from one location to another. Where there is a granthi, an actual obstruction or constriction of the path is implied; where the Goddess is called vibhedinī, that boundary is crossed through her power. The centre of this name is therefore not residence in Maṇipūra, but the power to proceed beyond it.

विष्णु-संज्ञा और उसके विषय में आवश्यक सावधानी

इस नाम में विष्णु शब्द देखकर इसे भगवान् विष्णु के किसी पुराणिक युद्ध अथवा उनके द्वारा उत्पन्न किसी बन्धन की कथा मानना उचित नहीं होगा। भास्करराय की व्याख्या स्पष्टतः योगिक चक्र-क्रम के भीतर प्रयुक्त विष्णुग्रन्थि संज्ञा से सम्बन्धित है। देवी विष्णु का विनाश नहीं करतीं; वे विष्णुग्रन्थि नामक अवरोध का भेदन करती हैं। देवता का नाम यहाँ उस सूक्ष्म क्षेत्र की पारम्परिक पहचान का अंग है।

The occurrence of the word Viṣṇu in this name should not be taken as referring to a Purāṇic battle with Viṣṇu or to a bondage created by him. Bhāskararāya's explanation clearly concerns the traditional designation Viṣṇugranthi within the yogic cakra sequence. The Goddess does not destroy Viṣṇu; she pierces the obstruction called Viṣṇugranthi. The divine name here forms part of the traditional identification of that subtle region.

इसी कारण आधुनिक लोकप्रिय व्याख्याओं में ग्रन्थियों को केवल किसी एक मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति, सामाजिक आसक्ति या भावनात्मक समस्या के साथ समान कर देना शास्त्रीय अर्थ को संकुचित कर सकता है। ऐसी व्याख्याएँ साधनात्मक दृष्टान्त के रूप में उपयोगी हो सकती हैं, किन्तु प्रत्यक्ष नामार्थ और सौभाग्यभास्कर की चक्राधारित व्याख्या उनसे पहले और उनसे पृथक् रखी जानी चाहिए।

For the same reason, popular modern explanations that equate each granthi exclusively with one psychological tendency, social attachment, or emotional problem can narrow the classical meaning. Such explanations may occasionally serve as contemplative analogies, but the direct meaning of the name and the cakra-based interpretation given in the Saubhāgyabhāskara should remain prior to and distinct from them.

श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत

उपासना-दृष्टि से विष्णुग्रन्थि-विभेदिनी यह स्मरण कराती हैं कि शक्ति का स्वभाव स्थिर होकर रुक जाना नहीं, बल्कि अपने परम लक्ष्य की ओर निर्बाध रूप से अग्रसर होना है। चक्र स्वयं साधना के पड़ाव हैं, अन्तिम लक्ष्य नहीं। जिस शक्ति ने मणिपूर में उदय लिया है, वही वहाँ की सीमा को अतिक्रमित कर आगे बढ़ती है। अतः किसी उपलब्ध अवस्था को पूर्णता मान लेने के स्थान पर नाम साधक की दृष्टि को निरन्तर ऊर्ध्वगामी रखता है।

From the standpoint of contemplation, Viṣṇugranthi-vibhedinī recalls that the nature of Śakti is not to become arrested at an intermediate stage but to proceed unobstructed toward her supreme goal. The cakras are stages of the ascent, not its final end. The same power that becomes manifest in Maṇipūra crosses its limiting boundary and continues onward. The name therefore directs the aspirant's attention beyond the attainment of any intermediate state.

इस भेदन को अहंकारपूर्वक अर्जित की जाने वाली व्यक्तिगत सिद्धि मानना भी उपयुक्त नहीं है। सहस्रनाम में कर्त्री स्वयं भगवती हैं: वे ही निलया हैं, वे ही उदिता हैं और वे ही विभेदिनी हैं। साधक का उचित भाव अपनी सीमाओं को बलपूर्वक तोड़ने का नहीं, बल्कि साधना, संयम, गुरु-परम्परा के प्रति श्रद्धा और देवी के अनुग्रह के लिए ग्रहणशील बने रहने का है। जहाँ शास्त्र के सूक्ष्म साधनात्मक पक्ष दीक्षापरम्परा से सम्बद्ध हों, वहाँ उनका अभ्यास भी उसी मर्यादा में समझा जाना चाहिए।

This piercing should also not be treated as a personal achievement to be acquired through spiritual ambition. In the Sahasranāma, the acting power is the Goddess herself: she is the indwelling one, the one who arises, and the one who pierces. The appropriate disposition of the aspirant is therefore not to force subtle barriers open, but to remain receptive through disciplined practice, reverence for the guru tradition, and openness to the Goddess's grace. Where subtle practical aspects belong to an initiatory lineage, their practice is to be understood within that discipline.

साधक के लिए संदेश

इस नाम का स्मरण करते हुए साधक पराम्बा से प्रार्थना कर सकता है: “हे विष्णुग्रन्थि-विभेदिनी, साधना के मार्ग में जो भी वास्तविक बन्ध और सीमाएँ मेरे आगे उपस्थित हों, उन्हें पहचानने की निर्मलता प्रदान कीजिए। मुझे अधूरी उपलब्धियों में रुकने अथवा सूक्ष्म अनुभवों को अपना स्वत्व मान लेने से बचाइए। आपका अनुग्रह मुझे विनय, धैर्य और एकाग्रता के साथ उस दिशा में ले चले जहाँ चेतना अधिक स्वच्छ और व्यापक होती जाए।”

While remembering this name, the aspirant may pray to Parāmbā: “O Viṣṇugranthi-vibhedinī, grant me the clarity to recognise the real bonds and limitations that arise upon the path of practice. Protect me from stopping at incomplete attainments or claiming subtle experiences as possessions of the ego. May your grace lead me with humility, patience, and concentration toward an ever clearer and more expansive awareness.”

भाव-सार

विष्णुग्रन्थि-विभेदिनी वह श्रीललिताम्बिका हैं जो मणिपूर में उदित होकर उसके ऊपर स्थित विष्णुग्रन्थि का विशेष रूप से भेदन करती हैं। भास्करराय इस नाम को कुण्डलिनी के चक्रानुक्रमिक आरोहण का निश्चित चरण मानते हैं और विष्णु-संज्ञा को मणिपूर से सम्बद्ध सूक्ष्म क्षेत्र के आधार पर स्पष्ट करते हैं। नाम का भाव यह है कि देवी की शक्ति साधक को किसी मध्यवर्ती सीमा पर स्थिर नहीं रहने देती; उनके अनुग्रह में अवरोध भेदकर यात्रा आगे बढ़ती है।

Viṣṇugranthi-vibhedinī is Śrī Lalitāmbikā who, having arisen in Maṇipūra, specifically pierces the Viṣṇugranthi situated above it. Bhāskararāya treats this as a definite stage in the progressive ascent of Kuṇḍalinī and explains the designation Viṣṇu through its association with the Maṇipūra region. The name conveys that the Goddess's power does not allow the ascent to remain confined at an intermediate boundary; through her grace the obstruction is pierced and the journey continues.

बुधवार, 29 जुलाई 2026

76.विशुक्र-प्राणहरण-वाराही-वीर्य-नन्दिता - विशुक्रप्राणहरणवाराहीवीर्यनन्दितायै नमः

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

विशुक्रप्राणहरणवाराहीवीर्यनन्दिता ।
कामेश्वरमुखालोककल्पितश्रीगणेश्वरा ॥ ३०॥

श्रीललितासहस्रनाम के इस अंश में भण्डासुर के विरुद्ध चल रहे देवी-सेना के महायुद्ध का वर्णन है। भगवती के सम्मुख उनकी प्रधान शक्तियाँ अपने-अपने विशिष्ट सामर्थ्य का प्रकाश करती हैं। बाला त्रिपुरसुन्दरी भण्डासुर के पुत्रों का वध करती हैं, मन्त्रिणी अम्बा विषङ्ग का संहार करती हैं और दण्डिनी वाराही विशुक्र के प्राणों का हरण करती हैं। इन शक्तियों का पराक्रम देखकर श्रीललिताम्बिका क्रमशः नन्दित, तोषित और हर्षित होती हैं।

छिहत्तरवाँ नाम “विशुक्रप्राणहरणवाराहीवीर्यनन्दिता” इसी युद्ध-प्रसंग को प्रत्यक्ष रूप से अभिव्यक्त करता है। इसका प्रधान अर्थ किसी कल्पित मनोवैज्ञानिक प्रतीक पर आधारित नहीं है। सर्वप्रथम यह नाम उस शास्त्रीय घटना का स्मरण कराता है जिसमें वाराही देवी ने विशुक्र नामक दैत्य का वध किया और उनके शौर्य से पराम्बा प्रसन्न हुईं।

पदच्छेद और प्रत्यक्ष अर्थ

मूल नाम: विशुक्रप्राणहरणवाराहीवीर्यनन्दिता

पदच्छेद: विशुक्र-प्राण-हरण-वाराही-वीर्य-नन्दिता।

समास-विग्रह: विशुक्रस्य प्राणानां हरणं यया कृतम्, तस्याः वाराह्याः वीर्येण नन्दिता।

अर्थात् जो विशुक्र नामक दैत्य के प्राणों का हरण करने वाली वाराही देवी के वीर्य अर्थात् शौर्य से आनन्दित हुईं, वे श्रीललिताम्बिका विशुक्रप्राणहरणवाराहीवीर्यनन्दिता हैं।

विशुक्र अर्थात् विशुक्र नामक दैत्य।
प्राणहरण अर्थात् प्राणों का हरण अथवा वध।
वाराही अर्थात् दण्डिनी अथवा दण्डनाथा नाम से प्रसिद्ध देवी वाराही।
वीर्य अर्थात् शौर्य, पराक्रम और युद्ध-सामर्थ्य।
नन्दिता अर्थात् आनन्दित अथवा प्रसन्न हुईं।
सम्पूर्ण प्रत्यक्ष अर्थ: विशुक्र का वध करने वाली वाराही देवी के पराक्रम से आनन्दित श्रीललिताम्बिका।

भास्कररायीय अर्थ

भास्करराय मखिन् इस नाम का सरल और प्रसंगानुकूल निर्वचन करते हैं। उनके अनुसार विशुक्र नामक दैत्य के प्राणों का हरण करने वाली दण्डिनी देवी वाराही के वीर्य अर्थात् शौर्य से भगवती नन्दित हुईं। इस व्याख्या में “हरण” का सम्बन्ध विशुक्र के प्राणहरण से, “वाराही” का सम्बन्ध दण्डिनी देवी से और “वीर्य” का अर्थ शौर्य से है।

अतः इस नाम का केन्द्र वाराही देवी की उपासना का स्वतन्त्र वर्णन नहीं, बल्कि श्रीललिताम्बिका की वह प्रसन्नता है जो अपनी ही दण्डनायिका शक्ति का विजयी पराक्रम देखकर प्रकट होती है। नाम का प्रधान विशेष्य “नन्दिता” है। भगवती किस कारण नन्दित हुईं, इसका उत्तर शेष समस्त पद देता है। वे विशुक्र के प्राणहरण में प्रकट वाराही के शौर्य से नन्दित हुईं।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि भगवती की शक्तियाँ उनसे सर्वथा पृथक् और स्वतन्त्र सत्ता नहीं हैं। श्रीललिताम्बिका की आज्ञा, ज्ञान, क्रिया और सामर्थ्य ही विविध देवी-रूपों में अभिव्यक्त होते हैं। इसलिए वाराही की विजय वस्तुतः पराशक्ति की ही विजय है, यद्यपि सहस्रनाम युद्ध-लीला की रमणीयता के लिए प्रत्येक शक्ति के विशिष्ट कार्य और पराक्रम को पृथक् रूप से सम्मानित करता है।

ललितोपाख्यान का युद्ध-प्रसंग

भण्डासुर के साथ युद्ध में श्रीललिताम्बिका के पक्ष की शक्ति-सेना सुव्यवस्थित रूप से कार्य करती है। मन्त्रिणी श्यामला और दण्डिनी वाराही इस दिव्य शासन-व्यवस्था की प्रमुख शक्तियाँ हैं। विषङ्ग और विशुक्र भण्डासुर-पक्ष के महत्त्वपूर्ण योद्धा हैं। मन्त्रिणी अम्बा विषङ्ग का संहार करती हैं, जबकि वाराही देवी विशुक्र का वध करती हैं।

सहस्रनाम में इन दोनों घटनाओं का क्रम भी अर्थपूर्ण है। पहले कहा गया है कि श्रीललिताम्बिका मन्त्रिणी अम्बा द्वारा किए गए विषङ्ग-वध से तोषित हुईं। उसके तुरन्त पश्चात् वर्तमान नाम में कहा गया है कि वे वाराही के उस वीर्य से नन्दित हुईं जिसके द्वारा विशुक्र के प्राणों का हरण हुआ। इस प्रकार युद्ध में ज्ञानशक्ति और दण्डशक्ति दोनों अपनी-अपनी भूमिका पूर्ण करती हैं।

यहाँ “प्राणहरण” शब्द युद्ध की निर्णायक परिणति को प्रकट करता है। वाराही ने विशुक्र को केवल पराजित अथवा पीछे नहीं हटाया, बल्कि उसके प्राणों का हरण कर भण्डासुर की सैन्यशक्ति के एक प्रमुख आधार को समाप्त कर दिया। इसीलिए उनके पराक्रम के लिए “वीर्य” शब्द प्रयुक्त हुआ है।

दण्डिनी वाराही का स्थान

इसी युद्ध-वर्णन में पूर्वतः श्रीललिताम्बिका को “किरिचक्ररथारूढदण्डनाथापुरस्कृता” कहा गया है। वहाँ दण्डनाथा अपने किरिचक्र-रथ पर आरूढ़ होकर भगवती की सेना का नेतृत्व करती हैं। दण्डनाथा अथवा दण्डिनी ही वाराही देवी हैं। उनका पद देवी-साम्राज्य की दण्डशक्ति, सैन्यव्यवस्था और आज्ञापालन से सम्बन्धित है।

“दण्ड” को केवल दण्ड देने के सामान्य अर्थ तक सीमित नहीं करना चाहिए। शास्त्रीय शासन में दण्ड का प्रयोजन धर्म और मर्यादा की रक्षा, अव्यवस्था का निरोध तथा प्रजा का संरक्षण है। इसी प्रकार देवी वाराही का उग्र पराक्रम भी स्वेच्छाचारी क्रोध नहीं है। वह श्रीललिताम्बिका की आज्ञा के अधीन धर्मरक्षण और दुष्टनिग्रह के लिए प्रवृत्त शक्ति है।

वाराही के लिए सहस्रनाम में प्रयुक्त “वीर्य” शब्द उनके शारीरिक बल मात्र का बोधक नहीं है। यहाँ वह शत्रु के सम्मुख निर्भयता, कार्यसिद्धि की क्षमता, युद्धकौशल और भगवती की आज्ञा को पूर्ण करने वाले तेजस्वी शौर्य का द्योतक है। पराम्बा उसी आज्ञापालक पराक्रम से नन्दित होती हैं।

श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत

इस नाम का प्रत्यक्ष अर्थ विशुक्र-वध की शास्त्रीय घटना ही है। तथापि उपासना-दृष्टि से बाह्य देवासुर-संग्राम में अन्तःकरण के संघर्ष का संकेत भी ग्रहण किया जा सकता है। ऐसा संकेत प्रत्यक्ष नामार्थ का स्थान नहीं लेता, बल्कि साधक को उस अर्थ का अपने जीवन में स्मरण करने में सहायता देता है।

भास्करराय युद्ध से सम्बन्धित इन नामों के पक्षान्तर में आणव आदि मलों, विरुद्ध सङ्ग तथा विषयाभिलाष जैसी बन्धनकारी प्रवृत्तियों का संकेत भी करते हैं। इस दृष्टि से देवी की विविध शक्तियों द्वारा दैत्यों का वध अन्तःकरण में विद्यमान उन वृत्तियों के निरसन का द्योतक माना जा सकता है जो साधक को उसके चैतन्यस्वरूप से विमुख करती हैं।

इस तात्त्विक दृष्टि में वाराहीरूपी दण्डशक्ति साधक के भीतर मर्यादा, निग्रह और दृढ़ता का स्मरण कराती है। विषयों की ओर अनियन्त्रित प्रवृत्ति, गुरु-उपदेश की उपेक्षा, साधना में प्रमाद और नियमभङ्गरूपी वृत्तियाँ आध्यात्मिक बल को क्षीण करती हैं। इनके निरोध के लिए केवल बौद्धिक ज्ञान पर्याप्त नहीं होता। ज्ञान के साथ अनुशासन, सतत अभ्यास और आज्ञापालन भी आवश्यक होते हैं।

साधक के लिए यह स्मरणीय संकेत हो सकता है कि भगवती की कृपा कभी-कभी सौम्य आश्वासन के रूप में और कभी दण्डिनी शक्ति के रूप में कार्य करती है। दण्डिनी का कार्य साधक को भयभीत करना नहीं, बल्कि उसकी साधना को विघटित करने वाली वृत्तियों का निरोध करना है। उनका वीर्य अन्तःकरण को मर्यादा में स्थिर करने वाली भगवती की क्रियाशक्ति का प्रतीक समझा जा सकता है।

भगवती की नन्दिता अवस्था

इस नाम का अत्यन्त मधुर पक्ष “नन्दिता” पद में निहित है। पराशक्ति सर्वसमर्थ होने पर भी अपनी शक्तियों के पराक्रम को प्रेमपूर्वक स्वीकार करती हैं। बाला के विक्रम से वे नन्दित होती हैं, मन्त्रिणी के कार्य से तोषित होती हैं और वाराही के वीर्य से पुनः नन्दित होती हैं। देवी-सेना की प्रत्येक विजय उनके लिए अपनी ही शक्ति के सफल प्रकाश का उत्सव बन जाती है।

यह वर्णन श्रीललिताम्बिका के साम्राज्य में शक्ति और आज्ञा के अद्भुत सामञ्जस्य को दिखाता है। वाराही का पराक्रम भगवती की आज्ञा से उद्भूत है, किन्तु भगवती उस पराक्रम का गौरव वाराही को प्रदान करती हैं। इससे स्पष्ट होता है कि दिव्य व्यवस्था में प्रत्येक शक्ति का अपना मान, कार्य और स्थान है।

साधक के लिए संदेश

श्रीविद्या-साधना में श्रद्धा और भक्ति के साथ नियम तथा मर्यादा भी आवश्यक हैं। साधक जब गुरु-उपदिष्ट मार्ग में स्थिर रहता है, अपने आचरण को संयमित करता है और प्रमाद से सावधान रहता है, तब उसके भीतर भगवती की दण्डिनी शक्ति का अनुग्रह कार्य करता है। यह अनुशासन कठोर अहंकार नहीं, बल्कि देवी-चरणों में समर्पित जीवन की रक्षा करने वाली शक्ति है।

इस नाम के जप में साधक भगवती से प्रार्थना कर सकता है कि वाराही देवी का आज्ञापालक शौर्य उसके अन्तःकरण में भी दृढ़ता, संयम और धर्मनिष्ठा के रूप में प्रकट हो। वह ऐसी वृत्तियों से रक्षित रहे जो उसकी श्रद्धा को क्षीण करती हैं और साधना को विषयों की ओर बिखेर देती हैं।

साथ ही यह नाम साधक को स्मरण कराता है कि अन्तःकरण की किसी विजय को अपने अहंकार का फल न माने। जिस प्रकार वाराही का वीर्य अन्ततः श्रीललिताम्बिका की ही शक्ति का प्रकाश है, उसी प्रकार साधक में उत्पन्न संयम, विवेक और साधना-सामर्थ्य भी भगवती तथा गुरु के अनुग्रह से ही पुष्ट होते हैं। इस बोध से पराक्रम के साथ विनय और अनुशासन के साथ शरणागति बनी रहती है।

भाव-सार

“विशुक्रप्राणहरणवाराहीवीर्यनन्दिता” नाम का प्रत्यक्ष अर्थ है कि श्रीललिताम्बिका विशुक्र नामक दैत्य के प्राणों का हरण करने वाली दण्डिनी वाराही के शौर्य से आनन्दित हुईं। यह नाम देवी-साम्राज्य में वाराही की दण्डशक्ति, आज्ञापालन और निर्णायक पराक्रम का गौरव प्रकट करता है। उपासना-दृष्टि से यह साधक को स्मरण कराता है कि श्रद्धा की रक्षा के लिए संयम, मर्यादा और प्रमाद-विनाशक दृढ़ता आवश्यक हैं। साधक इस नाम में भगवती से प्रार्थना करता है कि उनका वाराहीरूपी अनुग्रह अन्तःकरण की बन्धनकारी वृत्तियों का निरोध करे और समस्त साधना देवी-चरणों में विनयपूर्वक समर्पित हो।

सोमवार, 1 जून 2026

18.वक्त्रलक्ष्मी-परीवाह-चलन्मीनाभ-लोचना - वक्त्रलक्ष्मीपरीवाहचलन्मीनाभलोचनायै नमः

वक्त्रलक्ष्मीपरीवाहचलन्मीनाभलोचना

प्रार्थना

शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
      तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
      सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥

वदनस्मर-माङ्गल्य-गृहतोरण-चिल्लिका।
वक्त्रलक्ष्मी-परीवाह-चलन्मीनाभ-लोचना॥६॥

श्री ललिता सहस्रनाम के सत्रहवें नाम में माँ की धनुषाकार भौहों की सुंदरता का वर्णन करने के बाद, वाग्देवियाँ अब उनके अत्यंत प्रभावशाली और करुणामयी 'लोचन' (नेत्रों) का वर्णन करती हैं। अठारहवाँ नाम है 'वक्त्र-लक्ष्मी-परीवाह-चलन्मीनाभ-लोचना'।

यह नाम माँ ललिता के मुखमंडल को केवल एक चेहरा नहीं, बल्कि सौंदर्य और ऐश्वर्य का एक प्रवाह मानता है।आइए इस नाम के गहरे रहस्यों को समझते हैं:

यह नाम सौंदर्य शास्त्र और अध्यात्म का अद्भुत मेल है: वक्त्र (मुख) + लक्ष्मी (ऐश्वर्य और अपार सौंदर्य) + परीवाह (बाढ़ या जल का प्रवाह) + चलन्-मीन (तैरती या चलती हुई मछलियाँ) + आभ (के समान चमक वाली) + लोचना (नेत्र)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिनका मुखमंडल सौंदर्य के बहते हुए प्रवाह (तालाब) के समान है, और जिनके नेत्र उस सौंदर्य-प्रवाह में तैरती हुई सुंदर मछलियों की तरह चंचल और दीप्तिमान हैं"।

आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के श्लोक 50 में माँ के इन नेत्रों की चंचलता और उनके कानों तक विस्तार का वर्णन किया है:
कवीनां सन्दर्भ-स्तबक-मकरन्दैक-रसिकं कटाक्ष-व्याक्षेप-भ्रमर-कलभौ कर्ण-युगलम्। 
अमुञ्चन्तौ दृष्ट्वा तव नवरसा-स्वाद-तरलौ असूया-संसर्गादलिक-नयनं किंचिदरुणम् ॥

भावार्थ: "हे माता! आपके दोनों नेत्र कवियों के काव्य-रूपी फूलों के गुच्छों के मकरंद (शहद) का पान करने के लिए लालायित रहते हैं। वे कानों तक इतने लंबे हैं कि मानो वे कानों के पास जाकर उस अमृत को पीना चाहते हैं। आपकी आँखों की इस निकटता और चंचलता को देखकर आपका तीसरा नेत्र (ललाट स्थित) ईर्ष्या से थोड़ा लाल हो गया है"।

मूक कवि द्वारा रचित 'मूक पंचशती' में भगवती के कटाक्ष (तिरछी दृष्टि) की महिमा गाई गई है। इसमें बताया गया है कि माँ के नेत्र 'मीनाक्षी' हैं। जिस प्रकार मछली अपनी पलकें नहीं झपकाती और केवल अपनी दृष्टि से ही अपनी संतानों का पालन करती है, उसी प्रकार माँ ललिता भी बिना पलक झपकाए संपूर्ण ब्रह्मांड का अपनी करुणामयी दृष्टि से पोषण करती हैं।

'देवी भागवत पुराण' के अनुसार, भगवती के नेत्र कमल के दल के समान विशाल और सुंदर हैं। पुराणों में उनके मुख को एक ऐसा सरोवर माना गया है जहाँ 'लावण्य' (सौंदर्य) का अमृत बहता है। उनके नेत्रों की मछलियों जैसी आकृति यह संकेत देती है कि वे ज्ञान और आनंद के सागर में निरंतर 'विहार' कर रही हैं।

माँ का चेहरा शुद्ध चेतना का केंद्र है। 'लक्ष्मी' यहाँ भौतिक धन नहीं, बल्कि 'आत्म-लक्ष्मी' (आध्यात्मिक ऐश्वर्य) है। मीनाक्षी तत्व: साधना में 'मीन' (मछली) एकाग्रता का प्रतीक है। माँ के नेत्र हमें संसार के बंधनों से मुक्त कर अंतर्मुखी होने की प्रेरणा देते हैं। उनके नेत्रों में नौ रसों (प्रेम, दया, वीर आदि) का समावेश है, जो भक्तों की स्थिति के अनुसार प्रकट होते हैं।

'वक्त्र-लक्ष्मी-परीवाह-चलन्मीनाभ-लोचना' नाम का ध्यान करने से साधक के जीवन में मानसिक शांति और दिव्यता का संचार होता है। यह नाम हमें सिखाता है कि माँ की दृष्टि सदैव हम पर बनी हुई है, और उनकी एक तिरछी चितवन (कटाक्ष) ही हमारे जीवन के दुखों को समाप्त कर हमें परम आनंद के सागर में डुबोने के लिए पर्याप्त है।

रविवार, 31 मई 2026

17.वदनस्मर-माङ्गल्य-गृहतोरण-चिल्लिका - वदनस्मरमाङ्गल्यगृहतोरणचिल्लिकायै नमः

वदनस्मरमाङ्गल्यगृहतोरणचिल्लिका

प्रार्थना

शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
      तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
      सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥

वदनस्मर-माङ्गल्य-गृहतोरण-चिल्लिका।
वक्त्रलक्ष्मी-परीवाह-चलन्मीनाभ-लोचना॥६॥

श्री ललिता सहस्रनाम के सोलहवें नाम में माँ के मुख-मंडल पर सुशोभित कस्तूरी तिलक का वर्णन करने के बाद, वाग्देवियाँ अब उनके नेत्रों के ठीक ऊपर स्थित 'चिल्लिका' (eyebrows) की सुंदरता का वर्णन करती हैं। वह सत्रहवाँ नाम है 'वदन-स्मर-माङ्गल्य-गृह-तोरण-चिल्लिका'। यह नाम भगवती के सौंदर्य को प्रेम और आध्यात्मिकता के एक नए शिखर पर ले जाता है।

यह नाम पाँच सूक्ष्म शब्दों का एक अत्यंत सुंदर संयोजन है: वदन (मुख) + स्मर (कामदेव) + माङ्गल्य-गृह (वह घर जो मंगलकारी और सौभाग्यशाली है) + तोरण (वह मेहराब या वंदनवार जो घर के मुख्य द्वार पर सजाया जाता है ) + चिल्लिका (भौहें/Eyebrows)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिनका मुख साक्षात कामदेव का मंगलकारी निवास स्थान है और जिनकी भौहें उस घर के मुख्य द्वार पर सजी हुई सुंदर वंदनवार या मेहराब के समान हैं"।

सौन्दर्य लहरी (श्लोक 47)
आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' में भगवती की भौहें की सुंदरता का वर्णन करते हुए उन्हें कामदेव के धनुष से जोड़ा है, जो इस नाम के भाव को और भी प्रगाढ़ करता है:

भ्रुवौ भुग्ने किञ्चिद् भुवन-भय-भङ्ग-व्यसनिनि त्वदीये नेत्राभ्यां मधुकर-रुचिभ्यां धृत-गुणम्। 
धनुर्मन्ये सव्ये'तर-कर-गृहीतं रतिपतेः प्रकोष्ठे मुष्टौ च स्थगयति निगूढान्तर-मुमे ॥
भावार्थ: "हे माता उमे! आपकी थोड़ी सी मुड़ी हुई भौहें, जो संसार के भय को नष्ट करने वाली हैं, मुझे कामदेव (रतिपति) के धनुष के समान प्रतीत होती हैं। ऐसा लगता है कि आपके नेत्र रूपी भौंरों ने उस धनुष की डोरी थाम रखी है और उसका मध्य भाग आपकी मुट्ठी (नासिका के ऊपर का भाग) में छिपा हुआ है"।

'देवी भागवत पुराण' के अनुसार, भगवती ललिता का मुख-मंडल स्वयं विशुद्ध प्रेम और आनंद का केंद्र है। पुराणों में वर्णन है कि कामदेव (स्मर) अपनी शक्ति और आकर्षण माँ के इसी मुख-मंडल से प्राप्त करते हैं। उनकी भौहें की वक्रता (Curvature) केवल शारीरिक विशेषता नहीं है, बल्कि वह उस 'इच्छा शक्ति' का प्रतीक है जो सृष्टि की रचना के लिए उत्तरदायी है।

माँ की भौहें उस महल के प्रवेश द्वार की तरह हैं जहाँ प्रवेश करते ही साधक को 'कामेश्वर' (परम शिव) और 'कामेश्वरी' (परम शक्ति) के अद्वैत प्रेम का अनुभव होता है।

तंत्र शास्त्र में माँ का मुख "मंगल गृह" माना गया है। भौहें उस द्वार की "तोरण" हैं। यह संकेत देता है कि जब हम माँ के चेहरे का ध्यान करते हैं, तो हम उनके हृदय के प्रेम-महल में प्रवेश कर रहे होते हैं। जिस प्रकार एक सुंदर तोरण अतिथि का स्वागत करता है, माँ की भौहें भक्त का स्वागत करती हैं, लेकिन कामदेव के शस्त्रों के रूप में वे साधक के भीतर के काम, क्रोध और अहंकार को भस्म भी कर देती हैं। आज्ञा चक्र के ठीक नीचे स्थित ये भौहें साधक को उस 'बिंदु' की ओर ले जाती हैं जहाँ समस्त द्वंद्व समाप्त हो जाते हैं।

'वदन-स्मर-माङ्गल्य-गृह-तोरण-चिल्लिका' नाम का ध्यान करने से साधक के जीवन में मंगल और शुभता का आगमन होता है। यह नाम हमें सिखाता है कि माँ का सौंदर्य केवल बाहरी नहीं है, बल्कि वह उस परम कल्याणकारी घर का द्वार है जहाँ केवल अमृत और आनंद की वर्षा होती है। जब हम माँ की इन धनुषाकार भौहों का चिंतन करते हैं, तो हमारे जीवन के मानसिक विक्षेप शांत हो जाते हैं और हम उनके चरणों में पूर्ण समर्पण प्राप्त करते हैं।

168.निष्क्रोधा - निष्क्रोधायै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...