हिन्दू वेदान्त में जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति केवल नींद-जागरण की मनोवैज्ञानिक अवस्थाएँ नहीं हैं; वे आत्मा और चैतन्य के विवेचन की तीन प्रत्यक्ष भूमियाँ हैं। माण्डूक्य उपनिषद् कहता है “यह आत्मा चार पादों वाला है”; फिर वह पहले तीन पादों को जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति के रूप में और चौथे को तुरीय के रूप में निरूपित करता है।
जाग्रत् अवस्था में जीव बाह्य जगत् का अनुभव करता है। इस अवस्था के भोक्ता को माण्डूक्य उपनिषद् वैश्वानर कहता है “जागरितस्थानो बहिःप्रज्ञः…” अर्थात् जिसका क्षेत्र जाग्रत है और जिसकी प्रज्ञा बाहर की ओर प्रवृत्त है। यहाँ इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि स्थूल वस्तुओं से सम्बन्ध बनाते हैं; इसलिए इसे स्थूल अनुभव की अवस्था कहा जाता है।
स्वप्न अवस्था में बाह्य इन्द्रियाँ विश्राम में रहती हैं, पर मन अपने संस्कारों और स्मृतियों से एक आन्तरिक जगत् रचता है। माण्डूक्य उपनिषद् इस अवस्था के भोक्ता को तैजस कहता है अन्तःप्रज्ञ, अर्थात् भीतर के सूक्ष्म अनुभवों का ज्ञाता। बृहदारण्यक उपनिषद् भी कहता है कि स्वप्न में पुरुष अपने ही प्रकाश से स्वप्न-शरीर और स्वप्न-जगत् बनाकर अनुभव करता है; वहाँ वास्तविक रथ, मार्ग आदि नहीं होते, पर वह उन्हें रचता हुआ देखता है।
सुषुप्ति अवस्था में न बाह्य अनुभव रहता है, न स्वप्न; इच्छाएँ और मानसिक चित्र शान्त हो जाते हैं। माण्डूक्य उपनिषद् इसे प्राज्ञ की अवस्था कहता है जहाँ अनुभव एकीकृत, अविभक्त और आनन्दमय प्रतीत होता है। छान्दोग्य उपनिषद् सुषुप्ति को इस प्रकार समझाता है कि जब पुरुष सोता है, तब वह सत् से सम्पन्न होता है और अपने स्वरूप में लौटता है। प्रश्नोपनिषद् भी बताता है कि जब मन तेज से अभिभूत होकर स्वप्न नहीं देखता, तब शरीर में सुख का अनुभव होता है और सब कुछ परम आत्मा में प्रतिष्ठित हो जाता है।
परन्तु सुषुप्ति को सीधे मोक्ष नहीं कहा जा सकता। सुषुप्ति में द्वैत का प्रकट अनुभव नहीं रहता, पर आत्मज्ञान भी प्रकट नहीं होता; इसलिए जागने पर जीव फिर अहंकार, कर्म और संसार-बोध में लौट आता है। इसी कारण वेदान्त का लक्ष्य केवल गहरी नींद जैसा विश्राम नहीं, बल्कि उस चैतन्य को जानना है जो जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति - तीनों में साक्षी रूप से विद्यमान है। बृहदारण्यक उपनिषद् में याज्ञवल्क्य आत्मा को “स्वयं प्रकाश” और इन अवस्थाओं से असंग बताकर मुक्ति-विवेक की दिशा देता है।
इन तीनों अवस्थाओं से परे, और फिर भी इनके आधार रूप में, तुरीय का विधान है। माण्डूक्य उपनिषद् तुरीय को न बाह्यप्रज्ञ, न अन्तःप्रज्ञ, न सुषुप्ति-जैसा प्रज्ञानघन कहता है; वह उसे “प्रपञ्चोपशम”, “शान्त”, “शिव” और “अद्वैत” कहकर बताता है - वही आत्मा है, वही जानने योग्य है। इसी शिक्षा को ओंकार-चिन्तन में अकार, उकार, मकार और अमात्र के रूप में भी रखा गया है। अकार जाग्रत्, उकार स्वप्न, मकार सुषुप्ति और अमात्र तुरीय का संकेत है।
संक्षेप में: जाग्रत् में आत्मा स्थूल जगत् का भोक्ता-सा प्रतीत होता है, स्वप्न में सूक्ष्म मनोजगत् का द्रष्टा-सा, सुषुप्ति में अविभक्त आनन्दमय प्राज्ञ-सा; पर उसका वास्तविक स्वरूप इन तीनों से परे साक्षी-चैतन्य है। वेदान्त में इसी विवेक को अवस्था-त्रय-विवेक कहा जाता है। तीनों बदलती अवस्थाओं के बीच जो अचल, प्रकाशित और असंग है, वही आत्मा है।
