शनिवार, 23 मई 2026

9.क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला - क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वलायै नमः

प्रार्थना

शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
      तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
      सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥

उद्यद्भानु-सहस्राभा चतुर्बाहु-समन्विता।
रागस्वरूप-पाशाढ्या क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला॥२॥

श्री ललिता सहस्रनाम के क्रम में, आठवें नाम 'रागस्वरूप-पाशाढ्या' (इच्छा शक्ति) के तुरंत बाद नौवां नाम आता है 'क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला'। जहाँ आठवां नाम देवी के हाथ में स्थित 'पाश' (प्रेम का फंदा) का वर्णन करता है, वहीं यह नौवां नाम उनके दूसरे शस्त्र 'अंकुश' के रहस्य को उजागर करता है।

'क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला' का अर्थ है "वह देवी जिन्होंने 'क्रोध' रूपी अंकुश धारण किया है, जो अत्यंत दैदीप्यमान  (उज्ज्वल) है"। शस्त्र की स्थिति: यह शस्त्र माँ की ऊपरी दाईं भुजा में स्थित है। 'उज्ज्वला' शब्द यह संकेत देता है कि यह अंकुश केवल एक लोहे का शस्त्र नहीं है, बल्कि यह शुद्ध ज्ञान के प्रकाश से चमक रहा है।

तंत्र शास्त्र और श्री विद्या के अनुसार, माँ ललिता के हाथ में स्थित 'अंकुश' उनकी 'ज्ञान शक्ति'का प्रतिनिधित्व करता है। जिस प्रकार एक महावत अंकुश का उपयोग कर एक अनियंत्रित या पागल हाथी को वश में करता है, उसी प्रकार माँ ललिता इस दिव्य अंकुश का उपयोग कर साधक के अनियंत्रित मन और अहंकार रूपी हाथी को नियंत्रित करती हैं।

शास्त्रों के अनुसार, जब हमारी इच्छाएं (राग) पूरी नहीं होतीं, तो वे 'क्रोध' में बदल जाती हैं। माँ इस अंकुश के माध्यम से हमारे भीतर के क्रोध और अज्ञान को नष्ट करती हैं और हमें 'ज्ञान' प्रदान करती हैं। इस नाम में 'क्रोध' का अर्थ सांसारिक गुस्सा नहीं है। आध्यात्मिक स्तर पर, इसमें काली का बीज मंत्र 'क्रों' छिपा हुआ है। यह बीज मंत्र बाधाओं के विनाश और एकाग्रता का प्रतीक है। माँ अपने भक्तों की कामनाओं को पूरा कर उन्हें धीरे-धीरे अज्ञान से ऊपर उठाकर अपने स्तर तक ले आती हैं।

आठवां नाम (पाश) 'राग' या आकर्षण का प्रतीक है, और नौवां नाम (अंकुश) 'द्वेष' या क्रोध के नियंत्रण का प्रतीक है। ये दोनों शस्त्र मिलकर साधक के अंतःकरण को शुद्ध करते हैं, जिससे वह माया के बंधनों से ऊपर उठकर परम चेतना को प्राप्त कर सके।

'क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला' नाम का स्मरण हमें यह सिखाता है कि आध्यात्मिक मार्ग पर बढ़ने के लिए केवल भक्ति ही काफी नहीं है, बल्कि अपने भीतर के क्रोध और अज्ञान पर नियंत्रण पाना भी आवश्यक है। माँ का यह उज्ज्वल अंकुश हमें सही दिशा दिखाने और हमारे भटकते हुए मन को एकाग्र करने का दिव्य साधन है।

123.शारदाराध्या - शारदाराध्यायै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...