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मंगलवार, 4 अगस्त 2026

82.कामेश्वरास्त्र-निर्दग्ध-सभण्डासुर-शून्यका - कामेश्वरास्त्रनिर्दग्धसभण्डासुरशून्यकायै नमः

कामेश्वरास्त्र-निर्दग्ध-सभण्डासुर-शून्यका

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

कामेश्वरास्त्रनिर्दग्धसभण्डासुरशून्यका ।
ब्रह्मोपेन्द्रमहेन्द्रादिदेवसंस्तुतवैभवा ॥33॥

श्रीललिताम्बिका और भण्डासुर के मध्य चल रहा महायुद्ध अब अपने निर्णायक क्षण पर पहुँचता है। पूर्ववर्ती नाम में भगवती ने महापाशुपतास्त्र की अग्नि से असुर-सेना का संहार किया था। वर्तमान नाम उस अन्तिम देवीकृत्य का वर्णन करता है जिसमें अकेला रह गया भण्डासुर तथा उसकी राजधानी शून्यक, दोनों कामेश्वरास्त्र के तेज से पूर्णतः दग्ध हो जाते हैं। यहाँ युद्ध का लक्ष्य केवल विरोधी सेना को परास्त करना नहीं, अधर्म के मूल केन्द्र का समूल उन्मूलन है।

पदच्छेद एवं प्रत्यक्ष अर्थ

कामेश्वर-अस्त्र-निर्दग्ध-स-भण्डासुर-शून्यका

कामेश्वर से अभिप्राय श्रीललिता के दिव्य सहचर परमशिवस्वरूप कामेश्वर से है। अस्त्र का अर्थ मन्त्रशक्ति से प्रयुक्त दिव्य आयुध है। निर्दग्ध का अर्थ पूर्णतः जला दिया गया या भस्मीकृत किया गया है। स का अर्थ ‘सहित’ है। भण्डासुर उस असुरराज का नाम है जिसके विनाश के लिए श्रीललिताम्बिका की शक्तिसेना ने युद्ध किया। शून्यका भण्डासुर की राजधानी का नाम है।

समस्त पद का व्याकरणिक आशय है: जिनके द्वारा कामेश्वर के अस्त्र की अग्नि से भण्डासुर-सहित शून्यक नामक उसकी नगरी पूर्णतः दग्ध कर दी गई, वे भगवती कामेश्वरास्त्र-निर्दग्ध-सभण्डासुर-शून्यका हैं। विशेषण के रूप में यह नाम उस देवी को सूचित करता है जिनकी निर्णायक शक्ति ने असुरराज तथा उसके सुरक्षित सत्ता-केन्द्र, दोनों का एक साथ अन्त कर दिया।

भास्कररायीय अर्थ

भास्करराय मखिन् अपने सौभाग्यभास्कर में पहले प्रत्यक्ष युद्धार्थ को स्पष्ट करते हैं। उनके अनुसार कामेश्वर का यह अस्त्र पूर्वप्रयुक्त महापाशुपतास्त्र से भी अधिक प्रभावशाली है। उसी की अग्नि से भण्डासुर और उसके साथ शून्यक नामक नगर दग्ध हुआ। इस व्याख्या से आयुधों का क्रम भी स्पष्ट होता है: महापाशुपतास्त्र ने भण्डासुर की शेष सेना का नाश किया, किन्तु कामेश्वरास्त्र ने स्वयं असुरराज तथा उसके नगर को समाप्त किया।

इसके बाद भास्करराय अध्यात्मपरक अर्थ प्रस्तुत करते हैं। उनके विवेचन में कामेश्वरास्त्र चिदग्नि, अर्थात् चैतन्य की अग्नि है। चिदात्मा ही वास्तविक कामेश्वर है, क्योंकि समस्त प्रियता अन्ततः आत्मा के कारण ही होती है। भण्डासुर उस जीवभाव का संकेत है जो द्वैत का भान उत्पन्न करता है, जबकि शून्यका दग्ध वस्त्र की क्षीण छाया के समान शेष दिखाई पड़ने वाले द्वैताभास का द्योतक है। जब जीवभाव और उसका द्वैताभास चिदग्नि में निवृत्त होते हैं, तब केवल चिन्मात्र का अवशेष रहता है।

ललितोपाख्यान में निर्णायक संहार

भण्डासुर की व्यापक सेना, उसके सहायक और उसके द्वारा उत्पन्न विविध प्रतिरोध एक-एक करके समाप्त हो चुके थे। अब वह अपने बन्धु-बान्धवों से रहित होकर स्वयं युद्धभूमि में शेष था। पराजय समीप देखकर भी उसका क्रोध शान्त नहीं हुआ; वह जगत् में पुनः विप्लव उत्पन्न करने के संकल्प से युद्धरत रहा। इस स्थिति में श्रीललिताम्बिका ने उस पर महाकामेश्वरास्त्र का प्रयोग किया।

ब्रह्माण्डपुराण-परम्परा में वर्णित प्रसंग के अनुसार उस अस्त्र का तेज सहस्र सूर्यों के समान था। उसने भण्डासुर का प्राणान्त कर दिया और उससे निकली ज्वालाओं ने उसकी राजधानी शून्यक को भी दग्ध कर दिया। नगर के भवन, सैन्य-साधन, भण्डार और उसकी असुरी व्यवस्था कुछ भी सुरक्षित नहीं रहा; अन्त में केवल भूमि शेष रह गई। इस प्रकार ‘शून्यक’ नाम वाला नगर वस्तुतः शून्य हो गया। भास्करराय इसी प्रसंग को वर्तमान नाम का प्रत्यक्ष आधार बताते हैं।

नाम में नगर का उल्लेख विशेष अर्थ रखता है। किसी अत्याचारी शासक का वध होने पर भी उसके द्वारा निर्मित दमनकारी व्यवस्था बनी रह सकती है। यहाँ भगवती केवल भण्डासुर को नहीं मारतीं; वे उस संरचना को भी नष्ट करती हैं जिसमें उसका अधर्म संगठित, संरक्षित और पुनरुत्पादित होता था। अतः ‘सभण्डासुर-शून्यका’ पद देवी-विजय की सम्पूर्णता व्यक्त करता है।

कामेश्वरास्त्र की विशिष्टता

‘कामेश्वरास्त्र’ को सामान्य लौकिक शस्त्र के समान समझना उचित नहीं है। अस्त्र उस दिव्य शक्ति का नाम है जो संकल्प, अधिष्ठाता देवता और मन्त्रशक्ति से कार्य करती है। वर्तमान युद्धक्रम में इसकी विशिष्टता उसके प्रभाव से प्रकट होती है। जहाँ अन्य देवीशक्तियाँ भण्डासुर के सेनापतियों, पुत्रों, विघ्नयन्त्रों और मायावी आयुधों का प्रतिकार करती हैं, वहीं यह अस्त्र युद्ध के मूल विरोधी तथा उसके नगर पर निर्णायक प्रहार करता है।

‘कामेश्वर’ नाम यहाँ लौकिक कामना का सूचक नहीं है। श्रीविद्यापरम्परा में कामेश्वर परमशिव का वह स्वरूप है जो श्रीललिता से अभिन्न दिव्य सामरस्य में प्रतिष्ठित है। इसलिए कामेश्वरास्त्र को देवी से पृथक किसी बाहरी सत्ता का आयुध नहीं मानना चाहिए। वह भगवती के परम ऐश्वर्य और शिवशक्ति-सामरस्य से अभिव्यक्त संहारशक्ति है। उसके द्वारा किया गया संहार उग्रता का अनियन्त्रित प्रदर्शन नहीं, धर्म-संस्थापन के लिए आवश्यक और पूर्णतः लक्षित देवीकृत्य है।

‘शून्यका’ का नाम और उसका अभिप्राय

प्रत्यक्ष कथा में शून्यका एक वास्तविक असुरनगरी है। उसका नाम पहले से ‘शून्यका’ था; देवी के अस्त्र से दग्ध होने के बाद वह अपने नाम के अनुरूप रिक्त हो गई। इस शब्दालंकार को भास्करराय भी रेखांकित करते हैं। नगर का विनाश इतना पूर्ण था कि उसकी पूर्व समृद्धि, दुर्ग-संरचना और सैन्यबल का कोई आधार शेष नहीं रहा।

तात्त्विक विवेचन में ‘शून्यका’ को किसी साधारण भौतिक रिक्तता अथवा निरर्थक अभाव का पर्याय नहीं बनाया गया है। भास्करराय इसे द्वैतभान की उस अवशिष्ट प्रतीति से जोड़ते हैं जो आत्मज्ञान के उदय के बाद भी प्रारब्ध के कारण कुछ समय तक दग्ध वस्त्र की आकृति के समान दिखाई दे सकती है। चिदग्नि उस अन्तिम आभास का भी अपगम करती है। फलतः निष्कर्ष शून्यवाद नहीं, प्रत्युत चिन्मात्र का अवशेष है।

श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत

उपासना-दृष्टि से भण्डासुर को उस सीमित जीवभाव का संकेत माना जा सकता है जो अपने को स्वतन्त्र, पृथक् और पूर्णतः देह-मन तक सीमित समझता है। इस भाव से उत्पन्न द्वैत-दृष्टि ही उसके लिए एक ‘शून्यक’ निर्मित करती है: नाम-रूपों, आग्रहों और स्वनिर्मित धारणाओं का ऐसा सुरक्षित नगर जिसमें अहन्ता अपने अस्तित्व को स्थायी मान बैठती है।

आरम्भिक विवेक अनेक आविद्यक वृत्तियों को क्षीण कर सकता है, फिर भी उनका केन्द्रभूत ‘मैं पृथक् हूँ’ का भाव सूक्ष्म रूप में बचा रह सकता है। भास्कररायीय संकेत में कामेश्वरास्त्ररूपी चिदग्नि उस मूल जीवभाव को ही निवृत्त करती है। तब साधक किसी जड़ शून्यता में नहीं पहुँचता; वह उस चैतन्य की ओर उन्मुख होता है जिसके प्रकाश में ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का समस्त व्यवहार प्रकट होता है।

इस अर्थ को किसी त्वरित मानसिक कल्पना अथवा बाहरी संघर्ष से जोड़ना उचित नहीं है। यह आत्मस्वरूप की परिपक्व पहचान की दिशा में दिया गया तात्त्विक संकेत है। यहाँ संहार का अर्थ अस्तित्व का निषेध नहीं, मिथ्या पृथक्त्व-बोध का अपगम है। जो शेष रहता है वह भगवती का चिद्रूप, अखण्ड और स्वयंप्रकाश स्वरूप है।

साधक के लिए संदेश

यह नाम साधक को अपने भीतर के दोषों के प्रति असंयत कठोरता नहीं, बल्कि सत्यनिष्ठ विवेक रखने की प्रेरणा देता है। कभी-कभी किसी एक अनुचित प्रवृत्ति को रोक देना पर्याप्त नहीं होता; उस प्रवृत्ति को आश्रय देने वाली मान्यताओं, आसक्तियों और अहंभाव को भी भगवती के सम्मुख समर्पित करना पड़ता है। अन्यथा बाहरी परिवर्तन के बाद भी उसका मूल केन्द्र बना रह सकता है।

इस नाम का स्मरण करते हुए साधक ऐसी प्रार्थना कर सकता है: हे श्रीललिताम्बिका, जो असत्य को आश्रय देने वाली मेरी अन्तःसंरचनाएँ हैं, उन्हें अपने ज्ञानमय प्रकाश से स्पष्ट कर दीजिए। मेरे भीतर जो पृथक्त्व, अभिमान और आग्रह आपके सर्वव्यापक चैतन्य को ढकते हैं, उन्हें अपनी कृपा से निवृत्त कीजिए। मुझे किसी रिक्त निराशा में नहीं, आपके स्वयंप्रकाश स्वरूप की शरण में स्थिर कीजिए।

भाव-सार

श्रीललिताम्बिका कामेश्वरास्त्र की अग्नि से भण्डासुर और उसकी राजधानी शून्यक को समूल दग्ध करने वाली परमेश्वरी हैं। प्रत्यक्ष कथा में यह अधर्म और उसके सत्ता-केन्द्र का निर्णायक अन्त है। भास्कररायीय दृष्टि में यही अस्त्र चिदग्नि है, जो द्वैत उत्पन्न करने वाले जीवभाव तथा उसके अवशिष्ट आभास को निवृत्त कर केवल चिन्मात्र को प्रकाशित करती है।

गुरुवार, 30 जुलाई 2026

77.कामेश्वर-मुखालोक-कल्पित-श्रीगणेश्वरा - कामेश्वरमुखालोककल्पितश्रीगणेश्वरायै नमः

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
    तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं बिभ्रतीं
    सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

विशुक्र-प्राणहरण-वाराही-वीर्य-नन्दिता ।
कामेश्वर-मुखालोक-कल्पित-श्रीगणेश्वरा ॥ ३०॥

श्रीललितासहस्रनाम के युद्ध-वर्णन में छिहत्तरवें नाम में वाराही देवी द्वारा विशुक्र के प्राणहरण से भगवती की प्रसन्नता कही गई। उसके पश्चात् सतहत्तरवाँ नाम “कामेश्वर-मुखालोक-कल्पित-श्रीगणेश्वरा” आता है। इस नाम में भगवती ललिता की वह दिव्य लीला प्रकट होती है, जिसमें उनके कामेश्वर-मुखावलोकन से श्रीगणेश्वर का आविर्भाव होता है।

इस नाम का पदच्छेद इस प्रकार है। कामेश्वर, मुखालोक, कल्पित और श्रीगणेश्वरा। “कामेश्वर” यहाँ परमशिव हैं, जो भगवती ललिता के दिव्य सहचर और प्रकाश-स्वरूप हैं। “मुखालोक” का अर्थ है उनके मुख का अवलोकन। “कल्पित” का अर्थ यहाँ कल्पना-मात्र नहीं, अपितु भगवती के संकल्प से आविर्भाव है। “श्रीगणेश्वरा” का अर्थ है श्रीगणेश्वर का प्राकट्य कराने वाली। अतः इस नाम का भाव है कि भगवती ललिता ने कामेश्वर के मुख का अवलोकन कर अपने दिव्य संकल्प से श्रीगणेश्वर को प्रकट किया।

ललितोपाख्यान का प्रसंग

भण्डासुर-युद्ध में विशुक्र ने देवी-सेना की गति रोकने के लिए जयविघ्न नामक विघ्नयन्त्र का प्रयोग किया। उसके प्रभाव से शक्ति-सेना में उत्साह-क्षय, जड़ता और विघ्न का वातावरण उत्पन्न हुआ। यह देखकर भगवती ललिता ने कामेश्वर के मुख का अवलोकन किया। उसी दिव्य मुखावलोकन से श्रीगणेश्वर का आविर्भाव हुआ।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस नाम में श्रीगणेश्वर के प्राकट्य का वर्णन है, जबकि अगले नाम “महागणेश-निर्भिन्न-विघ्नयन्त्र-प्रहर्षिता” में महागणेश द्वारा विघ्नयन्त्र-भेदन से भगवती की प्रसन्नता कही गई है। अतः 77वें नाम का मुख्य विषय श्रीगणेश्वर का उदय है, और 78वें नाम का मुख्य विषय उनके द्वारा विघ्नयन्त्र का भेदन है।

कामेश्वर-मुखालोक का रहस्य

भास्करराय की व्याख्या का मूल भाव यह है कि भगवती ने कामेश्वर के मुखावलोकन से श्रीगणेश्वर को प्रकट किया। श्रीविद्या-दृष्टि से कामेश्वर प्रकाश-तत्त्व हैं और ललिता विमर्श-शक्ति हैं। जब प्रकाश और विमर्श का सामरस्य प्रकट होता है, तब साधना-पथ के विघ्नों को दूर करने वाली बुद्धि, स्थिरता और मंगलशक्ति का उदय होता है। श्रीगणेश्वर उसी मंगल-विघ्ननाशक शक्ति के देवस्वरूप हैं।

“मुखालोक” शब्द भी अत्यन्त सुन्दर है। मुख से प्रसन्नता, अनुग्रह और संकल्प व्यक्त होते हैं। भगवती का कामेश्वर के मुख की ओर देखना केवल लौकिक दृष्टि नहीं है, अपितु शिव और शक्ति के परस्पर सामरस्य का सूचक है। इसी सामरस्य से गणेश-तत्त्व प्रकट होता है, जो विघ्नों को पहचानता है और साधना की गति को पुनः सुचारु करता है।

गणेश-तत्त्व और विघ्ननाश

गणपति अथर्वशीर्ष में गणपति को प्रत्यक्ष तत्त्व, ब्रह्म, आत्मा और जगत् के कर्ता, धर्ता तथा हर्ता के रूप में प्रणाम किया गया है। उसी ग्रन्थ में उन्हें विघ्ननाशक भी कहा गया है। इससे स्पष्ट होता है कि गणेश-तत्त्व केवल बाह्य विघ्नों को हटाने वाला देवतारूप नहीं, अपितु अन्तःकरण को स्थिर करने वाली ब्रह्मविद्या-संबद्ध शक्ति भी है।

गणपति अथर्वशीर्ष का संकेत
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि । त्वमेव केवलं कर्ताऽसि ।
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि । त्वमेव केवलं हर्ताऽसि ।
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि । त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम् ॥

इसी कारण श्रीविद्या-साधना में गणपति-पूजन को प्रारम्भिक मंगल के रूप में विशेष स्थान प्राप्त है। साधक के भीतर जब विक्षेप, आलस्य, संशय, असंयम और भय उत्पन्न होते हैं, तब वे विघ्नयन्त्र के समान साधना की गति को रोकते हैं। श्रीगणेश्वर का स्मरण इन विघ्नों को देखने और उनसे ऊपर उठने की शक्ति देता है।

सौन्दर्यलहरी और मातृभाव

सौन्दर्यलहरी के बहत्तरवें श्लोक में गणेश और स्कन्द को देवी के पुत्ररूप में स्मरण किया गया है। वहाँ गणेश का बाल-सुलभ भाव देवी के वात्सल्य और शिव-शक्ति-परिवार की आनन्दमयी लीला को प्रकट करता है। इस दृष्टि से “कामेश्वर-मुखालोक-कल्पित-श्रीगणेश्वरा” नाम भी भगवती की मातृशक्ति और शिव-शक्ति-सामरस्य से उत्पन्न मंगलशक्ति को सूचित करता है।

त्रिपुरारहस्य की तात्त्विक दृष्टि

त्रिपुरारहस्य में त्रिपुरा को जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति से परे स्थित शुद्ध चैतन्य के रूप में समझाया गया है। इस तात्त्विक दृष्टि से देवी की युद्ध-लीला केवल बाह्य कथा नहीं रहती। वह साधक के अन्तःकरण में चैतन्य की विजय का संकेत बन जाती है। जब चैतन्य अपने ही प्रकाश को पहचानता है, तब विघ्नरूपी जड़ता का आधार टूटने लगता है।

इस नाम में कामेश्वर और ललिता का मुखावलोकन इसी चैतन्य-सामरस्य का सूचक है। उस सामरस्य से श्रीगणेश्वर का प्राकट्य होता है। साधनात्मक अर्थ में यह बताता है कि जब साधक अपने भीतर शिवरूप प्रकाश और शक्तिरूप जागरूकता को एक करता है, तब विवेक, स्थिरता और विघ्ननाशक बुद्धि का जन्म होता है।

साधक के लिए संदेश

“कामेश्वर-मुखालोक-कल्पित-श्रीगणेश्वरा” नाम साधक को सिखाता है कि विघ्नों का निवारण केवल बाहरी प्रयास से नहीं होता। जब साधक का चित्त भगवती की कृपा, शिव-शक्ति-सामरस्य और गणेश-तत्त्व से जुड़ता है, तब भीतर से समाधान की शक्ति प्रकट होती है। इसी शक्ति से आलस्य, भ्रम, भय, संशय और अस्थिरता दूर होते हैं।

अर्चना में यह नाम “कामेश्वर-मुखालोक-कल्पित-श्रीगणेश्वरायै नमः” रूप से उच्चरित होता है। इसके जप में साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि उसके जीवन और साधना में उपस्थित विघ्नरूपी जड़ता, संशय, प्रमाद और भय श्रीगणेश्वर के मंगलप्रकाश से दूर हों।

इस प्रकार “कामेश्वर-मुखालोक-कल्पित-श्रीगणेश्वरा” नाम भगवती ललिता की शिव-सामरस्यपूर्ण सृजन-लीला का अद्भुत उद्घोष है। इसमें मातृशक्ति, मंगल, बुद्धि, स्थिरता और विघ्ननाशक कृपा एक साथ प्रकट होते हैं। जब साधक इस नाम का श्रद्धा से स्मरण करता है, तब वह अपनी साधना को श्रीगणेश्वर की मंगलमयी आराधना और श्रीललिताम्बिका की करुणा के अधीन करता है।

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

63.कामदायिनी - कामदायिन्यै नमः

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

महापद्माटवीसंस्था कदम्बवनवासिनी ।
सुधासागरमध्यस्था कामाक्षी कामदायिनी ॥२३॥

श्रीललितासहस्रनाम का तिरसठवाँ नाम “कामदायिनी” भगवती की उस अनुग्रहमयी सामर्थ्य का उद्घोष करता है, जिसके द्वारा वे अपने आश्रितों के धर्मानुकूल मनोरथों को पूर्ण करती हैं। पूर्ववर्ती नाम “कामाक्षी” में उनके करुणामय एवं कमनीय नेत्रों का वर्णन है। उसके पश्चात् आया यह नाम बताता है कि उनकी कृपादृष्टि केवल दर्शनमात्र नहीं, अपितु अभीष्ट-प्रदायिनी भी है।

यहाँ “काम” का प्राथमिक अर्थ इच्छा, अभिलाषा अथवा मनोरथ है। किन्तु श्रीविद्या-दृष्टि से इसका अर्थ केवल क्षणभंगुर विषयाकांक्षा तक सीमित नहीं है। इसमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूपी पुरुषार्थों की प्राप्ति की कामना तथा अन्ततः परम तत्त्व की उपलब्धि का मनोरथ भी समाविष्ट हो सकता है।

पदच्छेद, व्युत्पत्ति और प्रत्यक्ष अर्थ

पदच्छेद: काम + दायिनी

व्युत्पत्ति: कामान् ददातीति कामदायिनी।

अर्थात् जो कामनाओं और मनोरथों को प्रदान करती हैं, वे कामदायिनी हैं। “दायिनी” स्त्रीलिङ्ग पद का अर्थ देने वाली अथवा प्रदान करने वाली है।

अर्चना-मन्त्र: ॐ कामदायिन्यै नमः।

भास्कररायीय अर्थ

भास्करराय मखीन्द्र इस नाम का सर्वप्रथम अत्यन्त सरल और प्रत्यक्ष अर्थ करते हैं:

कामान् मनोरथान् ददातीति कामदायिनी ।
अर्थात् जो कामनारूपी मनोरथों को प्रदान करती हैं, वे कामदायिनी हैं।

यही इस नाम का प्रधान और सीधा अर्थ है। भगवती जीव के अन्तरतम भाव को जानती हैं और उसकी पात्रता, धर्म तथा परम कल्याण के अनुरूप फल प्रदान करती हैं। अतः यहाँ कामनापूर्ति का आशय प्रत्येक अविवेकी इच्छा को पुष्ट करना नहीं, अपितु देवी के सर्वज्ञ अनुग्रह द्वारा उचित मनोरथ की सिद्धि है।

भास्करराय इसके पश्चात् कुछ गूढ़ व्युत्पत्तिपरक अर्थ भी प्रस्तुत करते हैं। एक अर्थ में भगवती अपने भक्तों को कामेश्वर प्रदान करती हैं। इसका तात्पर्य किसी लौकिक वस्तु के दान से नहीं, अपितु शिव के साथ अभेदभाव की प्राप्ति से है। श्रीविद्या में देवी और कामेश्वर का परमार्थतः अभेद स्वीकार किया जाता है। अतः उनका परम दान साधक को शिवतत्त्व की अनुभूति प्रदान करना है।

भाष्यकार एक अन्य व्युत्पत्ति में “काम” को मन्मथ मानकर उसके खण्डन की ओर संकेत करते हैं। इस दृष्टि से भगवती अनियन्त्रित कामवृत्ति का शमन करके साधक के लिए शुभ मार्ग प्रशस्त करती हैं। यह अर्थ प्रत्यक्ष नामार्थ के स्थान पर नहीं, अपितु भाष्य में प्रस्तुत एक वैकल्पिक शब्दनिर्वचन के रूप में ग्रहण करना चाहिए।

एक और व्युत्पत्ति में “दाय” का अर्थ परम्परा से प्राप्त स्वत्व है। इस प्रकार भगवती कामेश्वर के साथ अनादिसिद्ध अभिन्नता से सम्पन्न हैं। इन विभिन्न निर्वचनों से स्पष्ट होता है कि नाम का विस्तार लौकिक मनोरथों की पूर्ति से लेकर शिवाभेदरूपी परम फल तक है।

ब्रह्माण्डपुराण का प्रमाण

भास्करराय इस नाम की पुष्टि में ब्रह्माण्डपुराण का वचन उद्धृत करते हैं:

सर्वज्ञा साक्षिभावेन तत्तत्कामानपूरयत् ।
सर्वज्ञ भगवती ने साक्षिरूप में स्थित होकर उन-उन कामनाओं को पूर्ण किया।

“साक्षिभावेन” पद विशेष महत्त्व रखता है। देवी जीव के बाह्य आचरण की ही नहीं, उसके अन्तःकरण में स्थित अभिलाषा, संस्कार और वास्तविक आवश्यकता की भी साक्षिणी हैं। उनका दान सर्वज्ञता से उद्भूत है, इसलिए वह केवल याचना के बाह्य शब्दों पर निर्भर नहीं रहता।

भगवती के चरणों की अभीष्ट-प्रदायिनी महिमा

सौन्दर्यलहरी के चतुर्थ श्लोक में भगवती के चरणों को प्रार्थना से भी अधिक फल प्रदान करने में समर्थ कहा गया है। यह पद्य “कामदायिनी” नाम की भावभूमि को सुन्दर रूप से प्रकाशित करता है:

भयात्त्रातुं दातुं फलमपि च वाञ्छासमधिकं
शरण्ये लोकानां तव हि चरणावेव निपुणौ ॥
हे समस्त लोकों की शरण्ये! भय से रक्षा करने और कामना से भी अधिक फल देने में आपके दोनों चरण ही पूर्ण समर्थ हैं।

यहाँ “वाञ्छासमधिकम्” पद यह दर्शाता है कि देवी का अनुग्रह साधक की सीमित कल्पना से बँधा हुआ नहीं है। साधक किसी अल्प फल की याचना कर सकता है, किन्तु भगवती उसके कल्याण के अनुरूप अधिक व्यापक फल प्रदान कर सकती हैं। अतः उनका वरदान केवल इच्छित वस्तु की प्राप्ति नहीं, कभी-कभी इच्छा का परिष्कार भी होता है।

श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत

श्रीविद्या में इच्छा को सर्वथा त्याज्य नहीं माना जाता। इच्छा भगवती की इच्छाशक्तिरूपी व्यापक तत्त्व-व्यवस्था का जीव में सीमित प्रतिबिम्ब हो सकती है। बन्धन का कारण इच्छा का अस्तित्वमात्र नहीं, अपितु अविवेक, अहंभाव और विषयासक्ति से उसका संयोग है।

कामदायिनी भगवती साधक के मनोरथ को तीन प्रकार से अनुगृहीत कर सकती हैं। धर्मानुकूल इच्छा को उचित फल प्रदान करके, अहितकारी इच्छा का शमन करके तथा सीमित इच्छा को परम पुरुषार्थ की ओर परिवर्तित करके। इस प्रकार वे केवल कामना का विषय प्रदान करने वाली नहीं, कामना को शुद्ध और उदात्त करने वाली भी हैं।

भास्करराय का “कामेश्वर को भक्तों में वितरित करने” वाला अर्थ इसी उच्चतर तत्त्व की ओर संकेत करता है। भगवती का सर्वोच्च दान कोई बाह्य पदार्थ नहीं, अपितु साधक को अपने शिवस्वरूप की पहचान प्रदान करना है। यह अर्थ रहस्योपासना के विवरण का उद्घाटन किए बिना देवी के अनुग्रह की परम दिशा को प्रकट करता है।

साधक के लिए संदेश

“कामदायिनी” नाम के जप में साधक भगवती के सम्मुख अपनी कामनाओं को छिपाता नहीं, अपितु उन्हें श्रद्धापूर्वक समर्पित करता है। साथ ही वह यह प्रार्थना करता है कि देवी उसकी इच्छाओं में जो धर्मानुकूल और कल्याणकारी हो उसे पूर्ण करें, जो अहितकारी हो उसका शमन करें तथा जो सीमित हो उसे परम तत्त्व की ओर उन्नत करें।

शरणागति का अर्थ इच्छा-विहीन जड़ता नहीं है। उसका अर्थ है अपनी इच्छा को भगवती की सर्वज्ञ इच्छा के अधीन करना। साधक कहता है, “माता, मेरे मनोरथ को आप जानती हैं; किन्तु उसका कौन-सा फल मेरे लिए वास्तव में मंगलकारी है, यह भी आप ही जानती हैं।”

इस भाव से किया गया नामस्मरण याचना को उपासना में और अभिलाषा को आत्मसमर्पण में परिणत करता है। तब भगवती का वरदान कभी अभीष्ट वस्तु के रूप में, कभी विवेक के रूप में, कभी वैराग्य के रूप में और कभी शिवाभेद की परम अभिलाषा के रूप में प्रकट होता है।

नाम-सार
कामदायिनी का प्रत्यक्ष अर्थ है, मनोरथों को प्रदान करने वाली भगवती। भास्करराय के अनुसार वे जीवों की कामनाएँ पूर्ण करती हैं, भक्त को कामेश्वररूपी शिवतत्त्व प्रदान करती हैं, अनियन्त्रित कामवृत्ति का शमन करती हैं और कामेश्वर के साथ अनादिसिद्ध अभेद से सम्पन्न हैं। इस नाम के स्मरण में साधक श्रीललिताम्बिका से प्रार्थना करता है कि वे उसकी इच्छा को धर्मानुकूल करें, अन्तःकरण को शुद्ध करें और अन्ततः परम पुरुषार्थ की ओर ले जाएँ।

बुधवार, 15 जुलाई 2026

62.कामाक्षी - कामाक्ष्यै नमः

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

महापद्माटवीसंस्था कदम्बवनवासिनी ।
सुधासागरमध्यस्था कामाक्षी कामदायिनी ॥ २३ ॥

श्रीललितासहस्रनाम का बासठवाँ नाम कामाक्षी है। पूर्ववर्ती नामों में श्रीललिताम्बिका के श्रीनगर, चिन्तामणिगृह, महापद्माटवी, कदम्बवन तथा सुधासागर के मध्य स्थित दिव्य अधिष्ठान का निरूपण हुआ है। अब वाग्देवियाँ भगवती के कमनीय नेत्रों तथा कामेश्वर से सम्बद्ध उनकी दिव्य दृष्टि का वर्णन करती हैं।

इस नाम का प्रत्यक्ष अर्थ समझते समय कामाक्षी को अगले नाम कामदायिनी में मिला देना उचित नहीं है। कामाक्षी नाम का प्रथम अर्थ भगवती के कमनीय नेत्रों से सम्बन्धित है, जबकि कामदायिनी नाम उनके द्वारा अभिलषित फल प्रदान किए जाने का बोध कराता है।

नाम, व्युत्पत्ति और प्रत्यक्ष अर्थ

नाम: कामाक्षी

व्युत्पत्तिगत विग्रह: कामे, अर्थात् कमनीये, अक्षिणी यस्याः सा कामाक्षी।

कामे कमनीये अक्षिणी यस्याः ।
अर्थ: जिन भगवती के दोनों नेत्र कमनीय, मनोहर और दर्शनमात्र से चित्त को आकृष्ट करनेवाले हैं, वे कामाक्षी हैं।

यहाँ काम पद को भास्करराय सर्वप्रथम कमनीय, अर्थात् सुन्दर, प्रिय तथा मनोहर अर्थ में ग्रहण करते हैं। अक्षि का अर्थ नेत्र है। बहुव्रीहिसमास के द्वारा यह नाम उस देवी का बोध कराता है जिनके दोनों नेत्र परम कमनीय हैं। भास्करराय इस शब्दरूप की सिद्धि में समासान्त टच् प्रत्यय का भी निर्देश करते हैं।

भास्कररायीय अर्थ

सौभाग्यभास्कर में भास्करराय इस नाम के दो प्रमुख अर्थ प्रस्तुत करते हैं। प्रथम अर्थ भगवती के कमनीय नेत्रों से सम्बन्धित है। श्रीललिताम्बिका के नेत्र केवल बाह्य सौन्दर्य के अवयव नहीं हैं। वे उनकी सौम्यता, सर्वज्ञता, वात्सल्य तथा अनुग्रहपूर्ण अवलोकन के द्योतक भी हैं।

द्वितीय अर्थ में भास्करराय कहते हैं कि कामेश्वर ही उनका नेत्र हैं।

कामेश्वर एव नेत्रं यस्याः ।
अर्थ: जिन भगवती के लिए कामेश्वर स्वयं नेत्ररूप हैं, वे कामाक्षी हैं।

भास्करराय स्पष्ट करते हैं कि कामेश्वर भगवती की दृष्टि के विषय हैं, इसलिए उपचार अथवा रूपक के द्वारा उन्हें देवी का नेत्र कहा गया है। इसे प्रतिमा के किसी पृथक् नेत्रविधान के रूप में नहीं समझना चाहिए। इसका भाव यह है कि देवी की दृष्टि कामेश्वर में प्रतिष्ठित है तथा कामेश्वर और कामेश्वरी परस्पर अविभाज्य हैं।

काञ्चीपीठ की अधिष्ठात्री

भास्करराय का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण निर्देश यह है कि कामाक्षी काञ्चीपीठ की अधिष्ठात्री देवी का असाधारण, अर्थात् विशिष्ट नाम है। इस प्रकार सहस्रनाम में कामाक्षी केवल सुन्दर नेत्रों का सामान्य विशेषण नहीं है। यह श्रीललिताम्बिका के काञ्चीपीठस्थित उपास्य स्वरूप का भी स्पष्ट निर्देश करता है।

काञ्ची की कामाक्षी और श्रीविद्या की श्रीललितामहात्रिपुरसुन्दरी को पृथक् देवता मानना भास्कररायीय व्याख्या के अनुरूप नहीं है। नामभेद तथा स्थानविशेष होने पर भी उपास्य पराशक्ति एक ही हैं।

ब्रह्माण्डपुराण का प्रमाण

कामाक्षी नाम की व्याख्या करते हुए भास्करराय ब्रह्माण्डपुराण का एक प्रसंग उद्धृत करते हैं। उसमें भगवती को सर्वज्ञ तथा साक्षीभाव में स्थित होकर प्राणियों की पृथक्-पृथक् कामनाएँ पूर्ण करते हुए वर्णित किया गया है।

सर्वज्ञा साक्षिभावेन तत्तत्कामानपूरयत् ।
तद्दृष्ट्वा चरितं देव्या ब्रह्मा लोकपितामहः ॥
अर्थ: सर्वज्ञ भगवती ने साक्षीभाव में स्थित होकर सबकी पृथक्-पृथक् कामनाएँ पूर्ण कीं। देवी के इस चरित को देखकर लोकपितामह ब्रह्मा चकित हुए।

इसके अनन्तर ब्रह्मा ने भगवती को कामाक्षी और कामेश्वरी नाम प्रदान किए। इस पुराणप्रसंग से नाम का एक विस्तृत भाव सामने आता है। भगवती सबके अन्तःकरण को जानती हैं और साक्षीभाव में स्थित होकर पात्रता तथा विधान के अनुरूप अनुग्रह करती हैं।

इस प्रसंग का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक लौकिक अभिलाषा बिना विवेक अथवा मर्यादा के पूर्ण हो जाती है। यहाँ देवी की सर्वज्ञता, साक्षित्व और अनुग्रहशक्ति का स्तवन है।

कामाक्षी और कामदायिनी का पार्थक्य

सहस्रनाम के पद्य में सुधासागरमध्यस्था, कामाक्षी और कामदायिनी नाम साथ आते हैं, किन्तु प्रत्येक नाम का अपना स्वतंत्र व्युत्पत्तिगत अर्थ है।

सुधासागरमध्यस्था भगवती के दिव्य अधिष्ठान का बोध कराता है। कामाक्षी उनके कमनीय नेत्रों, कामेश्वरनिष्ठ दृष्टि तथा काञ्चीपीठस्थित स्वरूप का निर्देश करता है। कामदायिनी अभिलषित फल प्रदान करनेवाली देवी का नाम है। अतः कामनाओं की पूर्ति को कामाक्षी का एकमात्र प्रत्यक्ष अर्थ मानना दोनों नामों के पार्थक्य को मिटा देता है।

नामक्रम में सुन्दर अर्थसामञ्जस्य अवश्य है। सुधासागर के मध्य विराजमान भगवती अपने कमनीय नेत्रों से समस्त जगत् का अवलोकन करती हैं और कामदायिनी के रूप में जीवों को उनकी पात्रता के अनुरूप फल प्रदान करती हैं।

श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत

उपासना दृष्टि से नेत्र ज्ञान, प्रकाश और अवलोकन का प्रतीक है। भगवती का कामाक्षी स्वरूप यह स्मरण कराता है कि समस्त दृश्य जगत् उनकी सर्वज्ञ चैतन्यदृष्टि में प्रकाशित हो रहा है। वे प्रत्येक जीव के बाह्य आचरण के साथ उसके अन्तःकरण की गति को भी जानती हैं।

भास्करराय का “कामेश्वर ही उनका नेत्र हैं” वाला अर्थ शिव और शक्ति की परस्पर अभिन्नता का सूक्ष्म संकेत देता है। कामेश्वरी की दृष्टि कामेश्वर से पृथक् नहीं और कामेश्वर का प्रकाश कामेश्वरी की विमर्शशक्ति से पृथक् नहीं माना जाता। यह साधनात्मक संकेत है, नाम के प्रत्यक्ष अर्थ का प्रतिस्थापन नहीं।

ब्रह्माण्डपुराण में वर्णित साक्षीभाव भी इसी तत्त्व को पुष्ट करता है। देवी सबकी कामनाओं को जानती हैं, किन्तु स्वयं उनसे बँधती नहीं हैं। वे साक्षिणी हैं, सर्वज्ञा हैं और अनुग्रह की स्वतन्त्र अधिष्ठात्री हैं।

साधक के लिए संदेश

ॐ कामाक्ष्यै नमः का जप करते हुए साधक भगवती के कमनीय, करुणापूर्ण और सर्वज्ञ नेत्रों का स्मरण करता है। वह प्रार्थना करता है कि उसकी अपनी दृष्टि भी राग, द्वेष, असूया और अविवेक से मुक्त होकर शुद्ध तथा कल्याणमयी बने।

इस नाम का चिन्तन साधक को अपनी कामनाओं का परीक्षण करने की प्रेरणा देता है। जो कामना धर्म, उपासना और अन्तःकरण की शुद्धि में सहायक हो, उसे भगवती के चरणों में समर्पित करना चाहिए। जो अभिलाषा बन्धन, अहंकार अथवा विषयासक्ति को बढ़ाती हो, उसके परिष्कार के लिए देवी से विवेक माँगना चाहिए।

कामाक्षी की उपासना में साधक केवल यह नहीं कहता कि भगवती उसकी ओर देखें। वह यह भी स्वीकार करता है कि देवी की दृष्टि उससे कभी पृथक् थी ही नहीं। उसकी प्रत्येक भावना, प्रार्थना और अन्तःकरण की गति भगवती के सर्वज्ञ साक्षित्व में ही प्रकाशित होती है।

भावसार

कामाक्षी नाम का प्रत्यक्ष अर्थ है, कमनीय नेत्रोंवाली भगवती। भास्करराय इसके साथ यह वैकल्पिक अर्थ भी देते हैं कि कामेश्वर स्वयं उनका नेत्र हैं। यह काञ्चीपीठ की अधिष्ठात्री श्रीललिताम्बिका का विशिष्ट नाम है। सर्वज्ञ और साक्षिरूपा भगवती सबके अन्तःकरण को जानती हैं तथा पात्रता के अनुरूप अनुग्रह करती हैं। उनके चरणों में साधक यही प्रार्थना करता है कि उसकी दृष्टि शुद्ध हो, उसकी कामनाएँ पवित्र हों और उसका अन्तःकरण कामेश्वरी तथा कामेश्वर की अभिन्न चैतन्यसत्ता में प्रतिष्ठित हो।

सोमवार, 22 जून 2026

39. कामेश-ज्ञात-सौभाग्य-मार्दवोरु-द्वयान्विता - कामेशज्ञातसौभाग्यमार्दवोरुद्वयान्वितायै नमः

कामेशज्ञातसौभाग्यमार्दवोरुद्वयान्विता - Goddess Lalitha Tripura Sundari

प्रार्थना

शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
      तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
      सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥

कामेश-ज्ञात-सौभाग्य-मार्दवोरु-द्वयान्विता।
माणिक्य-मुकुटाकार-जानुद्वय-विराजिता॥१७॥

श्री ललिता सहस्रनाम के अड़तीसवें नाम में माँ की रत्नजड़ित करधनी का वर्णन करने के बाद, अब वाग्देवियाँ उनके विग्रह के उस भाग की ओर बढ़ती हैं जो सौंदर्य की पराकाष्ठा है और जिसका ज्ञान केवल परमेश्वर को है। उनतालीसवाँ नाम है 'कामेष-ज्ञात-सौभाग्य-मार्दवोरु-द्वयान्विता'। यह नाम भगवती के 'सौभाग्य' और उनके विग्रह की 'कोमलता' को एक अत्यंत गोपनीय और पवित्र संदर्भ में प्रस्तुत करता है।

इस नाम के प्रत्येक पद में रहस्य छिपा है। कामेष (भगवान कामेश्वर, जो इच्छाओं के स्वामी और माँ ललिता के प्रियतम हैं) + ज्ञात (जो जाना गया हो) + सौभाग्य (अत्यंत शुभ सुंदरता, वैभव या सुहाग) + मार्दव (कोमलता) + उरु-द्वय (जंघाओं का जोड़ा) + अन्विता (युक्त या सुशोभित)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिनकी जंघाओं के युग्म का अलौकिक सौभाग्य (सौंदर्य) और अद्वितीय कोमलता केवल भगवान कामेश्वर ही जानते हैं"।

यह नाम माँ ललिता के 'शिखा से नख' वर्णन की श्रृंखला का हिस्सा है। शास्त्रों के अनुसार, माँ का यह सौंदर्य केवल भौतिक नहीं है।

ब्रह्माण्ड पुराण और ललितोपाख्यान ग्रंथों के अनुसार, जब माँ ललिता भंडासुर के वध हेतु प्रकट हुईं, तो उनके विग्रह का निर्माण देवताओं के तेज और चित-अग्नि से हुआ था। उनकी जंघाओं का सौंदर्य कामदेव के तरकश के समान बताया गया है, जो भगवान शिव के वैराग्य को भी भंग करने में सक्षम है।

मणिद्वीप के वर्णन में उल्लेख है कि माँ ललिता कामेश्वर की बाईं गोद में विराजमान हैं। यह नाम उसी स्थिति को दर्शाता है जहाँ शिव और शक्ति का पूर्ण एकीकरण होता है। त्रिपुरा रहस्य ग्रंथ माँ को 'तीन अवस्थाओं' (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) की अधिष्ठात्री बताता है। यहाँ 'ज्ञात' शब्द संकेत देता है कि शक्ति का वास्तविक स्वरूप केवल विशुद्ध चेतना (शिव) ही जान सकती है।

आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के 82वें श्लोक में (जो इस नाम के समान भाव रखता है) माँ की जंघाओं की तुलना स्वर्ण-कदली के स्तंभों और ऐरावत की सूंड से की है, और उन्हें 'अतुलनीय' बताया है।

'मूक पंचशती' में मूक कवि कहते हैं कि माँ कामाक्षी के अंगों की कोमलता साधक के कठोर से कठोर पापों और कर्म-बंधनों को पिघलाने वाली है। 'मार्दव' (कोमलता) यहाँ माँ के वात्सल्य और करुणा का प्रतीक है।

श्री विद्या साधना में, यह नाम 'सामरस्य' की उच्च अवस्था का प्रतीक है। तंत्र में जंघाओं को 'गुप्त' रखा जाता है। 'कामेष-ज्ञात' शब्द दर्शाता है कि परा-शक्ति का रहस्य अत्यंत गोपनीय है और इसे केवल गुरु की कृपा या शिवत्व की प्राप्ति के बाद ही जाना जा सकता है।

योगिनी हृदय और वामकेश्वर तंत्रों के अनुसार, माँ का शरीर स्वयं 'श्री चक्र' है। उनकी जंघाएँ उन आधारों का प्रतीक हैं जिन पर संपूर्ण सृष्टि टिकी है। जंघाएँ गति का प्रतीक हैं। माँ का यह स्वरूप साधक को संसार में रहते हुए भी आध्यात्मिक लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ने की प्रेरणा देता है।

'पराशुराम कल्पसूत्र' के अनुसार, श्री विद्या की दीक्षा लेने वाला साधक माँ के हर अंग में मंत्र और यंत्र का दर्शन करता है। यह नाम 'सौभाग्य' प्रदान करने वाला है, जिसका अर्थ है कि माँ अपने भक्त को वह सब कुछ प्रदान करती हैं जिसकी वह कामना करता है, और अंत में उसे मोक्ष की ओर ले जाती हैं।

'कामेष-ज्ञात-सौभाग्य-मार्दवोरु-द्वयान्विता' नाम का ध्यान करने से दांपत्य जीवन में मधुरता आती है और साधक को गुरु-तत्व का सान्निध्य प्राप्त होता है। यह नाम हमें सिखाता है कि सत्य 'कोमल' और 'सुंदर' है, लेकिन वह केवल पूर्ण समर्पण से ही जाना जा सकता है। जब शिव और शक्ति का मिलन हृदय में होता है, तब भक्त माँ के उस वास्तविक 'सौभाग्य' का अनुभव करता है जो वाणी और बुद्धि से परे है।

मंगलवार, 16 जून 2026

33.कामेश्वर-प्रेमरत्न-मणि-प्रतिपण-स्तनी - कामेश्वरप्रेमरत्नमणिप्रतिपणस्तन्यै नमः

कामेश्वरप्रेमरत्नमणिप्रतिपणस्तनी - Goddess Lalitha Tripura Sundari

प्रार्थना

शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
      तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
      सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥

कामेश्वर-प्रेमरत्न-मणि-प्रतिपण-स्तनी।
नाभ्यालवाल-रोमालि-लता-फल-कुचद्वयी॥१४॥

श्री ललिता सहस्रनाम के बत्तीसवें नाम में माँ के हृदय पर सुशोभित 'चिन्तामणि' और 'गज-मुक्ता' के हारों का वर्णन करने के बाद, वाग्देवियाँ अब उस आध्यात्मिक रहस्य की ओर बढ़ती हैं जो माँ के विग्रह और भगवान कामेश्वर के बीच के 'अनन्य प्रेम' को दर्शाता है। तैंतीसवाँ नाम है 'कामेश्वर-प्रेम-रत्न-मणि-प्रतिपण-स्तनी'। यह नाम सौंदर्य वर्णन की पराकाष्ठा है, जहाँ माँ की शारीरिक शोभा सीधे उनके और शिव के अटूट प्रेम-सम्बन्ध (अद्वैत) से जुड़ जाती है।

इस नाम का अर्थ अत्यंत गूढ़ और दार्शनिक है। कामेश्वर (परम शिव, जो इच्छाओं के स्वामी हैं) + प्रेम (निस्वार्थ और दिव्य अनुराग) + रत्न-मणि (बहुमूल्य रत्न या माणिक्य) + प्रतिपण (विनिमय, बदले में दी गई वस्तु) + स्तनी (उन्नत वक्षस्थल या हृदय प्रदेश)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिन्होंने भगवान कामेश्वर के 'प्रेम-रूपी रत्न' को प्राप्त करने के लिए अपने वक्षस्थल (सौंदर्य) को अर्पण (विनिमय) कर दिया है"। इसका दार्शनिक अर्थ यह है कि माँ ने अपनी पूर्ण सत्ता शिव के प्रेम में समर्पित कर दी है और बदले में शिव का अनन्य प्रेम प्राप्त किया है।

आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के 73वें श्लोक में माँ के इस स्वरूप का वर्णन किया है:
अमू ते वक्षोजौ अमृत-रस-माणिक्य-कुतपौ 
    न सन्देह-स्पन्दो कनक-कलशौ दत्तमणयौ।

भावार्थ: "हे माता! आपके ये वक्षस्थल अमृत रूपी रस से भरे हुए माणिक्य के पात्रों के समान हैं। ये स्वर्ण कलशों की भांति हैं जिनमें (शिव के प्रेम की) मणियाँ जड़ी हुई हैं।" यह श्लोक स्पष्ट करता है कि माँ का सौंदर्य केवल आकर्षण नहीं, बल्कि 'अमृत' (मोक्ष) और 'प्रेम' का स्रोत है।

'देवी भागवत पुराण' के अनुसार, मणिद्वीप के केंद्र में भगवती 'चिन्तामणि गृह' में विराजमान हैं। वहाँ वे भगवान कामेश्वर के वामांग (बाईं गोद) में बैठी हैं। पुराणों में उल्लेख है कि माँ का यह स्वरूप इतना तेजस्वी है कि उनके वक्षस्थल की आभा करोड़ों सूर्यों को फीका कर देती है। यहाँ माँ को 'सर्व-सौभाग्य-दायिनी' कहा गया है, क्योंकि शिव और शक्ति का यह मिलन ही सृष्टि के आनंद का मूल आधार है।

'मूक पंचशती' के अनुसार, माँ कामाक्षी का प्रत्येक अंग साधक को यह सिखाता है कि 'समर्पण' ही ईश्वर को प्राप्त करने का एकमात्र मार्ग है।

श्री विद्या साधना में, यह नाम 'अनहद नाद' और 'अनाहत चक्र' (हृदय केंद्र) की उच्च अवस्था को दर्शाता है। तंत्र में इसका अर्थ है "अहंकार का त्याग कर प्रेम की प्राप्ति। साधक जब अपना 'स्व' माँ को समर्पित करता है, तभी उसे माँ का 'प्रेम-रत्न' प्राप्त होता है"।

शिव 'प्रकाशा' हैं और शक्ति 'विमर्शा' हैं। यह नाम इन दोनों के 'सामरस्य' को दर्शाता है, जहाँ दोनों एक-दूसरे में पूर्णतः विलीन हैं। यह नाम माँ की ममता को भी दर्शाता है। उनके स्तन 'ज्ञान' और 'भक्ति' के दूध से भरे हुए हैं, जो कार्तिकेय और गणेश (ज्ञान और क्रिया) को पोषण देते हैं।

'कामेश्वर-प्रेम-रत्न-मणि-प्रतिपण-स्तनी' नाम का ध्यान करने से साधक के भीतर 'द्वैत' का भाव समाप्त होता है। यह नाम हमें सिखाता है कि प्रेम का अर्थ केवल पाना नहीं, बल्कि स्वयं को समर्पित करना है। जब हम माँ के इस स्वरूप का चिन्तन करते हैं, तो हमारा हृदय शिव-शक्ति के उस महा-मिलन का केंद्र बन जाता है, जहाँ केवल परमानंद शेष रहता है।

शनिवार, 13 जून 2026

30.कामेश-बद्ध-माङ्गल्य-सूत्र-शोभित-कन्धरा - कामेशबद्धमाङ्गल्यसूत्रशोभितकन्धरायै नमः

कामेशबद्धमाङ्गल्यसूत्रशोभितकन्धरा - Goddess Lalitha

प्रार्थना

शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
      तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
      सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥

अनाकलित-सादृश्य-चिबुकश्री-विराजिता।
कामेश-बद्ध-माङ्गल्य-सूत्र-शोभित-कन्धरा॥१२॥

श्री ललिता सहस्रनाम के उनतीसवें नाम में माँ की अनुपम ठुड्डी (चिबुक) का वर्णन करने के बाद, अब वाग्देवियाँ उनके मुख-सौंदर्य के आधार कन्धरा (गर्दन) का वर्णन करती हैं। तीसवाँ नाम है  'कामेष-बद्ध-माङ्गल्य-सूत्र-शोभित-कन्धरा'। यह नाम भगवती को 'नित्य सुहागिन' के रूप में प्रतिष्ठित करता है और उनके गले में सुशोभित मंगलसूत्र की महिमा का गान करता है।

कामेश (भगवान कामेश्वर/शिव, जो इच्छाओं के स्वामी हैं) + बद्ध (बांधा गया या धारण कराया गया) + माङ्गल्य-सूत्र (पवित्र विवाह का सूत्र; मंगलसूत्र) + शोभित (अत्यंत सुशोभित या चमकदार) + कन्धरा (गर्दन)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिनकी गर्दन स्वयं भगवान कामेश्वर द्वारा बांधे गए पवित्र मंगलसूत्र से सुशोभित है"।

आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के 69वें श्लोक में माँ की ग्रीवा (गर्दन) पर स्थित तीन रेखाओं और विवाह सूत्र का अद्भुत वर्णन किया है:
गले रेखास्तिस्रो गति-गमक-गीतैक-निपुणे 
    विवाह-व्यानद्ध-प्रगुण-गुण-संख्या-प्रतिभुवः। 
विराजन्ते नाना-विध-मधुर-रागाकर-भुवां 
    त्रयाणां ग्रामाणां स्थिति-नियम-सीमान इव ते ॥

भावार्थ: "हे संगीत की कलाओं में निपुण माता! आपकी गर्दन पर दिखाई देने वाली तीन रेखाएं मानो आपके विवाह के समय बांधे गए मंगलसूत्र के तीन धागों का प्रमाण हैं। ये रेखाएं संगीत के तीन ग्रामों (षड्ज, मध्यम और गांधार) की सीमाओं के समान प्रतीत होती हैं"। यह दर्शाता है कि माँ का कंठ समस्त नाद और संगीत का मूल स्रोत है।

'देवी भागवत पुराण' के अनुसार, मणिद्वीप की साम्राज्ञी की गर्दन शंख के समान चिकनी और कलात्मक डिजाइनों से सजी हुई है। उनके गले में मणियों और रत्नों के हार सुशोभित हैं, लेकिन सबसे प्रमुख वह मंगलसूत्र है जो उनके 'अविनाशी सुहाग' का प्रतीक है। पुराणों में वर्णन है कि माँ ललिता का सुहाग काल से परे है, क्योंकि वे और कामेश्वर एक ही परम तत्व के दो रूप हैं।

'मूक पंचशती' में मूक कवि कहते हैं कि माँ के गले का मंगलसूत्र साधक के लिए वह रक्षक सूत्र है जो उसे संसार के बंधनों से मुक्त कर देवी के चरणों से बांध देता है।

श्री विद्या साधना और तन्त्र के अनुसार, यह नाम अत्यंत गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ रखता है। शिव-शक्ति सामरस्य -  'कामेष-बद्ध' शब्द यह दर्शाता है कि शक्ति स्वयं को स्वेच्छा से शिव के बंधन में स्वीकार करती हैं। यह 'प्रकाशा' (शिव) और 'विमर्शा' (शक्ति) के अटूट मिलन का प्रतीक है।

गर्दन का स्थान 'विशुद्धि चक्र' का है। यहाँ मंगलसूत्र का होना यह दर्शाता है कि माँ की वाणी और विचार पूर्णतः शुद्ध और मंगलकारी हैं।

मंगलसूत्र के तीन धागे या गर्दन की तीन रेखाएं माँ की तीन प्रमुख शक्तियों - इच्छा, ज्ञान और क्रिया का प्रतिनिधित्व करती हैं।

तंत्र में माँ को 'नित्य सुवसिनी' कहा गया है, जिसका अर्थ है वह जो कभी विधवा नहीं होतीं। उनका सुहाग (शिव) शाश्वत है, इसलिए उनकी कृपा भी अक्षय है।

'कामेष-बद्ध-माङ्गल्य-सूत्र-शोभित-कन्धरा' नाम का ध्यान करने से साधक के जीवन में सौभाग्य, स्थिरता और शांति का उदय होता है। यह नाम हमें सिखाता है कि जिस प्रकार माँ का गला मंगलसूत्र से सुशोभित है, उसी प्रकार हमारा जीवन भी ईश्वरीय अनुशासन और प्रेम के 'सूत्र' से बंधा होना चाहिए। माँ के इस स्वरूप का चिन्तन करने से हमारे भीतर का द्वैत समाप्त होता है और हम शिव-शक्ति के अद्वैत आनंद को प्राप्त करते हैं ।

168.निष्क्रोधा - निष्क्रोधायै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...