रविवार, 24 मई 2026

10.मनोरूपेक्षु-कोदण्डा - मनोरूपेक्षुकोदण्डायै नमः

प्रार्थना

शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
      तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
      सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥

मनोरूपेक्षु-कोदण्डा पञ्चतन्मात्र-सायका।
निजारुण-प्रभापूर-मज्जद्ब्रह्माण्ड-मण्डला॥३॥

श्री ललिता सहस्रनाम के आयुधों (शस्त्रों) के वर्णन में, 'पाश' और 'अंकुश' के बाद दसवां नाम आता है 'मनोरूपेक्षुकोदण्डा'। यह नाम भगवती के उस दिव्य धनुष का वर्णन करता है जो न केवल सौंदर्य का प्रतीक है, बल्कि हमारे मनोवैज्ञानिक अस्तित्व की गहराई से जुड़ा है।

'मनोरूपेक्षुकोदण्डा' चार शब्दों के मेल से बना है: मन (चित्त) + रूप (स्वरूप) + इक्षु (गन्ना) + कोदण्ड (धनुष)। इसका पूर्ण अर्थ है "वह देवी जिनका धनुष गन्ने का बना है और जो स्वयं 'मन' का स्वरूप है"।

तंत्र शास्त्र और श्री विद्या के अनुसार, देवी के बाएं हाथ में स्थित यह गन्ने का धनुष हमारे 'मन' का प्रतिनिधित्व करता है। गन्ने की बाहरी परत कठोर होती है, लेकिन इसके भीतर मधुर रस भरा होता है। इसी प्रकार, मन को जब आध्यात्मिक अनुशासन के माध्यम से 'दबाया' या परिष्कृत किया जाता है, तभी उसमें से दिव्य आनंद का रस निकलता है। जैसे धनुष को चलाने के लिए एकाग्रता की आवश्यकता होती है, वैसे ही माँ ललिता इस 'मन रूपी धनुष' के माध्यम से साधक के संकल्प को केंद्रित करती हैं ताकि वह आत्म-साक्षात्कार प्राप्त कर सके।

पौराणिक कथाओं में गन्ने का धनुष और फूलों के बाण कामदेव के शस्त्र माने गए हैं, जो सांसारिक मोह और वासना उत्पन्न करते हैं। लेकिन जब यही शस्त्र भगवती ललिता के हाथों में होते हैं, तो वे बदल जाते हैं। माँ इन शस्त्रों का उपयोग साधक को संसार के जाल से 'मुक्त' करने और उसे अपनी ओर आकर्षित करने के लिए करती हैं।

श्री विद्या में माना जाता है कि हमारा मन ही हमारे बंधन और मोक्ष का कारण है। 'मनोरूपेक्षुकोदण्डा' के रूप में माँ हमें यह सिखाती हैं कि यदि हम अपने मन को उनके चरणों में समर्पित कर दें, तो वे उसे मधुर और स्थिर बना देती हैं। वे चंचल मन को नियंत्रित कर उसे आध्यात्मिक ज्ञान (विद्या) की ओर मोड़ देती हैं।

'मनोरूपेक्षुकोदण्डा' नाम का स्मरण हमें अपने भीतर की चंचलता को समाप्त कर मन को मधुर बनाने की प्रेरणा देता है। यह शस्त्र हमें विश्वास दिलाता है कि ब्रह्मांड की साम्राज्ञी स्वयं हमारे मन की लगाम थामे हुए हैं, और उनकी कृपा से हमारा मानसिक द्वंद्व अंततः परम शांति में विलीन हो जाएगा।

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...