श्रीललितासहस्रनाम के युद्धवर्णन में भगवती की शक्तियों के विविध पराक्रमों का स्मरण किया गया है। नित्यादेवियों के शौर्य से प्रसन्न होने के उपरान्त इस नाम में श्रीललिताम्बिका की पुत्रीरूपा बाला के अद्भुत विक्रम का वर्णन आता है। भण्डासुर के पुत्र युद्ध के लिए उपस्थित हुए और उनके वध के लिए बाला स्वयं उद्यत हुईं। अपनी पुत्री के इस असाधारण पराक्रम से श्रीललिताम्बिका आनन्दित हुईं। इसी प्रत्यक्ष आख्यान को यह नाम संक्षेप में धारण करता है।
पदच्छेद और प्रत्यक्ष अर्थ
इस नाम का पदच्छेद है: भण्ड-पुत्र-वध-उद्युक्त-बाला-विक्रम-नन्दिता।
भण्डपुत्र से भण्डासुर के पुत्र अभिप्रेत हैं। वधोद्युक्त का अर्थ उनके वध के लिए उद्यत अथवा तत्पर है। बाला श्रीललिताम्बिका की पुत्रीरूपा देवी बाला हैं। विक्रम का अर्थ शौर्य, पराक्रम अथवा वीरतापूर्ण कृत्य है। नन्दिता का अर्थ प्रसन्न अथवा आनन्दित हुई है।
अतः नाम का सीधा अर्थ है: भण्डासुर के पुत्रों के वध के लिए उद्यत बाला के पराक्रम से आनन्दित होने वाली श्रीललिताम्बिका।
भास्कररायीय अर्थ
भास्करराय मखिन् इस नाम का अर्थ ललितोपाख्यान में वर्णित बाला के युद्धविक्रम से सम्बद्ध करते हैं। यहाँ नाम का प्रधान आशय किसी कल्पित प्रतीक से नहीं, अपितु एक प्रत्यक्ष शास्त्रीय घटना से है। भण्डासुर के पुत्र युद्धभूमि में आए और श्रीललिताम्बिका की पुत्रीरूपा बाला उनके वध के लिए उद्यत हुईं। उनके असाधारण शौर्य के समाचार से भगवती अत्यन्त प्रसन्न हुईं।
नाम में बाला-विक्रम पद विशेष ध्यान देने योग्य है। बाला का स्वरूप कोमल और कुमारिका का है, किन्तु उनकी शक्ति अपरिमित है। उनका पराक्रम यह दर्शाता है कि भगवती की पूर्ण शक्ति बालारूप में भी न्यून नहीं होती। श्रीललिताम्बिका का आनन्द केवल युद्ध में विजय के कारण नहीं, अपनी पुत्री में प्रकट उसी देवीशक्ति के अद्भुत सामर्थ्य के कारण है।
ललितोपाख्यान में बाला का युद्ध
ब्रह्माण्डपुराणान्तर्गत ललितोपाख्यान में भण्डासुर के तीस पुत्रों का उल्लेख मिलता है। भण्डासुर ने उन्हें विशाल असुरसेना के साथ युद्ध के लिए भेजा। जब बाला ने उनके आगमन का समाचार सुना, तब उन्होंने स्वयं युद्ध करने की इच्छा श्रीललिताम्बिका के सम्मुख प्रकट की।
आख्यान में बाला को श्रीललितादेवी की पुत्री, समस्त विद्याओं की निधि और सदैव नौ वर्ष की कुमारिका के समान बताया गया है। उनका स्वरूप श्रीललिताम्बिका के समान था और वे निरन्तर अपनी माता के समीप रहती थीं। ग्रन्थ उनकी माता से अभिन्न निकटता को व्यक्त करते हुए उन्हें भगवती के प्राण के समान कहता है।
मातृस्नेहवश श्रीललिताम्बिका ने आरम्भ में उन्हें युद्ध में जाने से रोका। भगवती ने उनकी कोमल अवस्था का स्मरण कराया और कहा कि युद्ध के लिए मन्त्रिणी, दण्डिनी तथा असंख्य शक्तियाँ विद्यमान हैं। किन्तु बाला अपने संकल्प पर स्थिर रहीं। उनकी दृढ़ता देखकर श्रीललिताम्बिका ने उन्हें आलिङ्गन किया, अपना कवच तथा आवश्यक आयुध प्रदान किए और युद्ध की अनुमति दी।
बाला एक आवृत यान पर आरूढ़ हुईं, जिसे अनेक दिव्य हंस खींच रहे थे। मन्त्रिणी और दण्डनायिका उनके दोनों ओर रक्षार्थ उपस्थित रहीं, किन्तु युद्ध का प्रधान पराक्रम बाला ने स्वयं प्रकट किया। उन्होंने असुरसेना का सामना किया और दिव्य अस्त्रप्रयोग से उसकी विशाल वाहिनी को परास्त कर दिया।
अन्त में बाला ने एक साथ तीस बाण छोड़े। उन अर्धचन्द्राकार अग्रभाग वाले तीस बाणों से भण्डासुर के तीसों पुत्रों का वध हुआ। देवगण और शक्तियाँ उनके अप्रतिम शौर्य से विस्मित हो उठे। मन्त्रिणी और दण्डनायिका ने उन्हें हर्षपूर्वक आलिङ्गन किया तथा सेनानायकों ने श्रीललिताम्बिका के सम्मुख उनके पराक्रम का निवेदन किया।
अपनी पुत्री के इस विलक्षण विक्रम का समाचार सुनकर श्रीललिताम्बिका अत्यन्त प्रसन्न हुईं। सहस्रनाम का वर्तमान नाम ललितोपाख्यान के इसी प्रसंग को अत्यन्त संक्षिप्त और सारगर्भित रूप में व्यक्त करता है।
बाला और श्रीललिताम्बिका का सम्बन्ध
ललितोपाख्यान में बाला का परिचय केवल एक वीर कुमारिका के रूप में नहीं दिया गया। वे श्रीललिताम्बिका की अत्यन्त अन्तरङ्ग शक्ति हैं। उनका रूप माता के रूप के समान है और उनका तेज उदित होते हुए सूर्य के समान अरुण बताया गया है। वे बालिका होकर भी समस्त विद्याओं की महान निधि हैं।
इस प्रकार बाला में कोमलता और अपरिमित सामर्थ्य परस्पर विरोधी नहीं हैं। उनकी कुमारिका-अवस्था शक्ति की अपूर्णता नहीं, अपितु नित्य नवीनता, निष्कलुषता और सहज दिव्य सामर्थ्य की अभिव्यक्ति है। माता और पुत्री का सम्बन्ध भी सामान्य लौकिक सम्बन्ध से ऊपर देवी की अपनी शक्ति के अन्तरङ्ग प्रकाश के रूप में समझा जाना चाहिए।
श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत
इस नाम का प्रथम और मुख्य अर्थ ललितोपाख्यान में वर्णित युद्धघटना ही है। तथापि उपासना-दृष्टि से बाला का कुमारिकारूप साधक को चैतन्य की निर्मलता, सहजता और नित्य नवीनता का स्मरण करा सकता है। यहाँ यह अर्थ प्रत्यक्ष आख्यान का स्थान नहीं लेता, केवल उसके आधार पर प्राप्त एक साधनात्मक संकेत है।
भण्डासुर के पुत्रों को साधक के भीतर स्थित किसी निश्चित संख्या के दोषों से समान ठहराना मूल नाम या भास्कररायीय व्याख्या का प्रत्यक्ष कथन नहीं है। फिर भी सामान्य उपासना-दृष्टि से उनका मद, आक्रमणशीलता और दैवी व्यवस्था के प्रति विरोध अहंकार, अविवेक और आसुरी प्रवृत्तियों का स्मरण करा सकता है। बाला का विक्रम ऐसे अन्तर्विरोधों के सम्मुख निर्मल किन्तु दृढ़ विवेक का संकेत देता है।
श्रीविद्या के मन्त्र, बीज और रहस्यात्मक उपासनाएँ गुरु-परम्परा तथा दीक्षा की मर्यादा से सम्बद्ध हैं। इसलिए बाला से सम्बन्धित गोपनीय मन्त्रविषयों का सार्वजनिक विस्तार उचित नहीं है। इस नाम के अध्ययन में इतना समझना पर्याप्त है कि बाला श्रीललिताम्बिका की अत्यन्त अन्तरङ्ग, ज्ञानमयी और पराक्रमशालिनी शक्तिरूपा हैं।
साधक के लिए संदेश
इस नाम से साधक को यह प्रेरणा मिलती है कि आध्यात्मिक जीवन की सरलता दुर्बलता नहीं है। निर्मल भाव के साथ दृढ़ संकल्प, गुरु और भगवती के प्रति आज्ञाकारिता तथा धर्मसम्मत साहस भी आवश्यक हैं। बाला ने स्वेच्छाचारपूर्वक नहीं, अपितु माता की अनुमति और उनके द्वारा प्रदत्त कवच तथा आयुधों के साथ युद्ध किया। इसमें शक्ति के साथ मर्यादा का सुन्दर समन्वय दिखाई देता है।
साधक इस नाम के जप में भगवती से प्रार्थना करता है कि उसका अन्तःकरण निष्कपट बना रहे, किन्तु अधर्म और अविवेकरूपी प्रवृत्तियों के सम्मुख दुर्बल न हो। उसे ऐसा विवेक, धैर्य और साधनात्मक निष्ठा प्राप्त हो जिससे वह गुरु-उपदिष्ट मार्ग पर स्थिर रह सके।
श्रीललिताम्बिका का बाला के विक्रम से प्रसन्न होना यह भी स्मरण कराता है कि साधक का प्रत्येक धर्मसम्मत और मर्यादित प्रयत्न अन्ततः भगवती के चरणों में समर्पित होना चाहिए। विजय का वास्तविक सौन्दर्य अहंकार में नहीं, माता की प्रसन्नता में है।
भण्डपुत्रवधोद्युक्तबालाविक्रमनन्दिता वे श्रीललिताम्बिका हैं जो भण्डासुर के पुत्रों के वध के लिए उद्यत अपनी पुत्रीरूपा बाला के अद्भुत पराक्रम से आनन्दित हुईं। इस नाम में मातृवात्सल्य, कुमारिका-शक्ति, शौर्य और दैवी मर्यादा का मनोहर समन्वय है। इसके जप में साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि वे उसके अन्तःकरण को निर्मलता के साथ दृढ़ता, विनय के साथ साहस और साधना के साथ समर्पण प्रदान करें।