प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
श्री ललिता सहस्रनाम के प्रथम दो नामों - 'श्री माता' (सृष्टि) और 'श्री महाराज्ञी' (स्थिति) - के बाद तीसरा नाम हमें भगवती के उस स्वरूप से परिचित कराता है जो ब्रह्मांड के अंतिम और सबसे रहस्यमयी कार्य से जुड़ा है। वह नाम है - 'श्रीमत्सिंहासनेश्वरी'।
जहाँ प्रथम नाम वात्सल्य का प्रतीक है और द्वितीय नाम शासन का, वहीं यह तृतीय नाम 'संहार' (dissolution) के दिव्य कार्य को दर्शाता है,। यहाँ इस नाम का गहरा आध्यात्मिक विश्लेषण प्रस्तुत है:
शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्मांड के पाँच मुख्य कार्यों (पंचकृत्य) में से 'संहार' तीसरा कार्य है,। 'श्रीमत्सिंहासनेश्वरी' के रूप में भगवती इस कार्य की अधिष्ठात्री हैं,। यहाँ 'संहार' का अर्थ केवल विनाश नहीं, बल्कि 'लय' है - अर्थात अपने भक्तों के पापों को नष्ट करना और अंततः उन्हें स्वयं में विलीन कर लेना। एक भक्त के लिए, यह वह अवस्था है जहाँ देवी उसके कर्मों के बंधनों को काटकर उसे मोक्ष प्रदान करती हैं।
'सिंहासन' का अर्थ है सिंह का आसन। यह भगवती के अदम्य साहस और सर्वोच्च अधिकार का प्रतीक है। विशेष रूप से, उनके सिंहासन को पंच-ब्रह्मासन कहा जाता है,। इस सिंहासन की संरचना भगवती की श्रेष्ठता को इस प्रकार दर्शाती है:
- चार पैर - ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और ईशान
- फलक - सदाशिव,- देवी इन पाँचों देवताओं के ऊपर विराजमान हैं, जो यह दर्शाता है कि सृजन, पालन और संहार के ये सभी अधिष्ठाता उन्हीं की प्राण-शक्ति से संचालित होते हैं। उनकी उपस्थिति के बिना ये पुरुष तत्व निष्क्रिय या 'प्रेत' के समान माने जाते हैं।
- श्रीमत् - यह शब्द परम शुभता, तेज और दिव्य ऐश्वर्य का सूचक है।
- सिंहासनेश्वरी - यह दर्शाता है कि वे न केवल एक रानी हैं, बल्कि वे उस सिंहासन की स्वामिनी भी हैं जो पूरे ब्रह्मांड की सत्ता का केंद्र है। जब साधक इस नाम का स्मरण करता है, तो वह यह अनुभव करता है कि उसका अहंकार और अज्ञान देवी की सत्ता के समक्ष विलीन हो रहा है।
श्री विद्या साधना और शैव सिद्धांत के अनुसार, यह नाम हमारे भीतर के चक्रों के लय होने की प्रक्रिया को भी दर्शाता है। जैसे साधना की उच्चतम अवस्था में पृथ्वी तत्व जल में, जल अग्नि में और अंततः सब कुछ 'सहस्रार' (परम चेतना) में विलीन हो जाता है, वैसे ही 'श्रीमत्सिंहासनेश्वरी' वह शक्ति हैं जो साधक के सूक्ष्म शरीर के तत्वों को शुद्ध कर उसे आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाती हैं।
'श्रीमत्सिंहासनेश्वरी' नाम हमें यह सिखाता है कि जिस प्रकार एक माँ (श्री माता) जन्म देती है और एक रानी (श्री महाराज्ञी) रक्षा करती है, उसी प्रकार वह स्वामिनी (सिंहासनेश्वरी) अंततः हमें अपने भीतर समेटकर पूर्णता प्रदान करती है। यह नाम भक्त को निर्भयता प्रदान करता है, क्योंकि वह जानता है कि उसकी आत्मा का 'लय' किसी शून्य में नहीं, बल्कि साक्षात ब्रह्मांड की स्वामिनी की गोद में हो रहा है।
अगली बार जब आप सहस्रनाम का जप करें, तो इस नाम के माध्यम से स्वयं को उस दिव्य 'सिंह-सिंहासन' के चरणों में समर्पित करने का अनुभव करें, जहाँ समस्त द्वंद्व समाप्त हो जाते हैं।
