प्रार्थना
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥
चिदग्निकुण्डसम्भूता देवकार्यसमुद्यता ॥ १॥
श्रीललितासहस्रनाम के प्रथम नाम “श्रीमाता” में भगवती का जगज्जननी-स्वरूप प्रकट हुआ। उसके तुरन्त बाद द्वितीय नाम “श्रीमहाराज्ञी” आता है। यह नाम बताता है कि वही जगन्माता सम्पूर्ण जगत् की परम साम्राज्ञी, नियन्त्री और पालनकर्त्री भी हैं।
“श्रीमहाराज्ञी” शब्द का पदच्छेद इस प्रकार है। श्री, महा और राज्ञी। “श्री” मंगल, ऐश्वर्य, कान्ति और मोक्षरूप कल्याण का द्योतक है। “महा” उनकी अनन्तता और सर्वोत्कृष्टता को सूचित करता है। “राज्ञी” वह है जो राज्य की रक्षा, मर्यादा, व्यवस्था और पालन करती है। अतः इस नाम का भाव है कि भगवती परम मङ्गलमयी महा-साम्राज्ञी हैं, जिनके अधीन चराचर जगत् स्थित है।
भास्कररायीय अर्थ
भास्करराय “श्रीमहाराज्ञी” का मुख्य अर्थ सृष्ट जगत् की नियन्त्री बताते हैं। प्रथम नाम में माता-रूप से सृष्टि का संकेत था। इस द्वितीय नाम में उसी सृष्टि के धारण, पालन और नियमन का भाव प्रकट होता है। वे केवल उत्पत्ति की जननी नहीं, अपितु उत्पन्न जगत् को व्यवस्थित रूप से धारण करने वाली परमेश्वरी भी हैं।
इसका भाव है कि जिससे ये भूत उत्पन्न होते हैं और जिसके द्वारा उत्पन्न होकर जीवित रहते हैं, वही ब्रह्म है। भास्करराय इसी “येन जातानि जीवन्ति” भाव से “श्रीमहाराज्ञी” को सृष्ट जगत् की नियन्त्री और पालनकर्त्री के रूप में समझाते हैं।
“राज्ञी” शब्द का भाव
राज्ञी केवल अधिकार रखने वाली नहीं होती। वह प्रजा की रक्षा, धर्म की मर्यादा, लोकव्यवस्था और सुख-समृद्धि की आधारशक्ति होती है। इसी प्रकार भगवती “श्रीमहाराज्ञी” रूप से ब्रह्माण्ड की दिव्य व्यवस्था को धारण करती हैं। सूर्य, चन्द्र, देवता, लोकपाल, कालचक्र, कर्मफल और जीवों की गति उनके परम शासन में स्थित हैं।
यह शासन लौकिक दण्डमात्र पर आधारित नहीं है। भगवती का शासन करुणा, न्याय, धर्म, अनुग्रह और चैतन्य पर आधारित है। वे परमेश्वरी हैं, पर उनका परमेश्वरत्व मातृभाव से रहित नहीं है। इसलिए प्रथम नाम “श्रीमाता” और द्वितीय नाम “श्रीमहाराज्ञी” साथ-साथ रखे गए हैं।
गूढ़ श्रीविद्या-संकेत
भास्करराय इस नाम में श्रीविद्या के अत्यन्त गूढ़ संकेत भी बताते हैं। वे कहते हैं कि इसमें श्रीविद्या के कुछ रहस्याक्षर निहित हैं, जिनमें एक षोडशीकला से सम्बद्ध है। इसी प्रकार “राज्ञी” भाग में मायाराज्ञी-मन्त्र का भी संकेत है। ये विषय गुरु-परम्परा से ही ग्रहण करने योग्य हैं, इसलिए यहाँ केवल इतना समझना पर्याप्त है कि “श्रीमहाराज्ञी” नाम बाह्य राजसत्ता ही नहीं, अपितु मन्त्र, तत्त्व और पराशक्ति की आन्तरिक राजराजेश्वरी सत्ता को भी सूचित करता है।
श्रीविद्या में नाम, मन्त्र और तत्त्व परस्पर पृथक् नहीं हैं। अतः “श्रीमहाराज्ञी” नाम का जप करते समय साधक केवल किसी देवमूर्ति की साम्राज्ञी-छवि का ध्यान नहीं करता, बल्कि उस पराशक्ति का स्मरण करता है जिसके अधीन मन्त्र, चक्र, तत्त्व, देवता और सम्पूर्ण विश्व-व्यवस्था स्थित है।
राजराजेश्वरी-भाव
सहस्रनाम में आगे भगवती को “राजराजेश्वरी”, “राज्यदायिनी”, “राज्यलक्ष्मीः” और “साम्राज्यदायिनी” कहा गया है। इससे “श्रीमहाराज्ञी” नाम का भाव और स्पष्ट होता है। उनका साम्राज्य किसी एक लोक, देश अथवा काल तक सीमित नहीं है। वे स्थूल, सूक्ष्म और कारण इन तीनों स्तरों पर समस्त सत्ता की अधिष्ठात्री हैं।
इन नामों से स्पष्ट है कि भगवती केवल एक प्रदेश की राज्ञी नहीं, अपितु राजाओं की भी राजेश्वरी हैं। वे धर्म, राज्य, श्री, मर्यादा और साम्राज्य की मूल अधिष्ठात्री हैं। साधक के लिए इसका अर्थ यह है कि उसके जीवन का वास्तविक स्वामित्व अहंकार, वासना या भय के हाथ में नहीं, बल्कि देवी-आज्ञा में होना चाहिए।
श्रीचक्र और राजपीठ
श्रीविद्या में भगवती श्रीचक्रराजनिलया हैं। श्रीचक्र का बिन्दु उनका राजपीठ है और उसके आवरण उनके दिव्य साम्राज्य के मण्डल हैं। इस दृष्टि से “श्रीमहाराज्ञी” नाम श्रीचक्र की अधिष्ठात्री परम साम्राज्ञी का स्मरण कराता है। वे बिन्दु में स्थित होकर समस्त आवरणों, देवताओं, शक्तियों और तत्त्वों को अपने चैतन्य से धारण करती हैं।
देवीभागवत में मणिद्वीप के चिन्तामणिगृह में भगवती के राजपीठ और उनकी दिव्य मन्त्रणा का वर्णन मिलता है। यह वर्णन “श्रीमहाराज्ञी” नाम के भाव को सुन्दर रूप से पुष्ट करता है। भगवती का राजत्व केवल अलंकारिक नहीं है। वह सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह इन पाँचों कृत्यों को धारण करने वाली पराशक्ति का राजत्व है।
शिव-शक्ति-सामरस्य
श्रीविद्या में भगवती की राजसत्ता शिव से पृथक् नहीं मानी जाती। सौन्दर्यलहरी के प्रथम श्लोक में कहा गया है कि शिव शक्ति से संयुक्त होकर ही सृष्टि-व्यापार में समर्थ होते हैं।
इसका भाव है कि शिव शक्ति से संयुक्त होने पर ही सृष्टि आदि कार्यों में समर्थ होते हैं। इसीलिए “श्रीमहाराज्ञी” का शासन शिव-शक्ति-सामरस्य का शासन है। वह पराशक्ति परमशिव से अभिन्न होकर जगत् को धारण करती है।
अन्तःकरण में महाराज्ञी
साधक के भीतर भी एक सूक्ष्म राज्य है। शरीर, प्राण, मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और वासनाएँ उस आन्तरिक राज्य के अंग हैं। जब ये सब विषयों में अनियन्त्रित होकर दौड़ते हैं, तब जीवन में अशान्ति और अव्यवस्था आती है। “श्रीमहाराज्ञी” नाम साधक को स्मरण कराता है कि इस आन्तरिक राज्य की अधिष्ठात्री भगवती ही हों।
साधक जब अपने मन, इन्द्रियों, कर्म और संकल्प को भगवती की आज्ञा में समर्पित करता है, तब भीतर की अव्यवस्था क्रमशः शान्त होती है। मन संयत होता है, बुद्धि निर्मल होती है और कर्म धर्ममय होने लगते हैं। यही “श्रीमहाराज्ञी” नाम का साधनार्थ है।
साधक के लिए संदेश
अर्चना में यह नाम “श्रीमहाराज्ञ्यै नमः” रूप से उच्चरित होता है। इस नाम के जप में साधक भगवती को विश्वसाम्राज्ञी, राजराजेश्वरी, श्रीचक्रराजनिलया और सृष्ट जगत् की नियन्त्री के रूप में प्रणाम करता है। वह प्रार्थना करता है कि उसका जीवन देवी-आज्ञा, धर्म, मर्यादा और आत्मकल्याण के पथ पर चले।
इस प्रकार “श्रीमहाराज्ञी” नाम भगवती के विश्वसाम्राज्ञी-स्वरूप का उद्घोष है। वे जगन्माता भी हैं और जगदधिष्ठात्री महाराज्ञी भी। उनके चैतन्यमय शासन में ब्रह्माण्ड की गति, धर्म की मर्यादा, देवताओं की शक्ति, श्रीचक्र का रहस्य और साधक का अन्तःकरण सब सम्यक् रूप से स्थित होते हैं। जो साधक श्रद्धा से “श्रीमहाराज्ञी” का स्मरण करता है, वह अपने जीवन को परमेश्वरी व्यवस्था और कृपा के अधीन कर देता है।
