प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
श्री ललिता सहस्रनाम के प्रथम चार नामों में हमने माँ के स्वरूप, उनके शासन और उनके 'चिदग्नि' (चेतना की अग्नि) से प्राकट्य को समझा। इसके तुरंत बाद पाँचवा नाम आता है - 'देवकार्य-समुद्यता'। यह नाम यह स्पष्ट करता है कि भगवती का प्राकट्य किसी साधारण कारण से नहीं, बल्कि एक महान ब्रह्मांडीय उद्देश्य की पूर्ति के लिए हुआ था।
'देवकार्य-समुद्यता' का सरल अर्थ है "वह देवी जो देवताओं के कार्य (लक्ष्य) की सिद्धि के लिए पूर्णतः उद्यत या तत्पर हैं।"
ललितोपाख्यान के अनुसार, जब असुर भण्डासुर ने अपनी शक्ति से देवताओं को पराजित कर दिया और पूरे ब्रह्मांड में अधर्म फैला दिया, तब देवताओं ने अपनी रक्षा के लिए भगवती की आराधना की। भगवती ललिता का प्राकट्य देवताओं के इसी 'कार्य' अर्थात भण्डासुर के विनाश और धर्म की पुनर्स्थापना के लिए हुआ था।
दार्शनिक और सूक्ष्म स्तर पर, इस नाम के अत्यंत गूढ़ अर्थ हैं। यहाँ 'देवता' वे शुद्ध आत्माएं या साधक हैं जो 'विद्या' (ज्ञान) की खोज में हैं, जबकि 'असुर' अज्ञान या 'अविद्या' का प्रतीक हैं। 'देवकार्य' केवल देवताओं की रक्षा नहीं, बल्कि प्रत्येक साधक के भीतर ज्ञान का उदय करना और उसके अहंकार (असुरत्व) को नष्ट करना है।
यह नाम कुण्डलिनी शक्ति के जागरण की प्रक्रिया को भी दर्शाता है, जहाँ माँ शक्ति साधक के आध्यात्मिक उत्थान के 'कार्य' के लिए सदा उद्यत रहती हैं। यह नाम भगवती के उस स्वरूप को दर्शाता है जहाँ वे शिव (प्रकाशा) और शक्ति (विमर्शा) के मिलन से उत्पन्न होकर ब्रह्मांडीय व्यवस्था को बनाए रखती हैं। वे केवल रक्षा ही नहीं करतीं, बल्कि साधक को मोक्ष और 'सच्चिदानंद' की अवस्था तक पहुँचाने के लिए भी प्रतिबद्ध हैं।
'देवकार्य-समुद्यता' हमें यह विश्वास दिलाता है कि यदि हम भक्ति और शुद्ध हृदय से माँ का आश्रय लेते हैं, तो वे हमारे जीवन से अज्ञान के अंधकार को मिटाने और हमें उच्च आध्यात्मिक चेतना तक ले जाने के लिए सदैव तत्पर रहती हैं। यह नाम माँ की असीम करुणा और उनकी अजेय शक्ति का प्रमाण है।
