प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
रागस्वरूप-पाशाढ्या क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला॥२॥
श्री ललिता सहस्रनाम के प्रथम पाँच नामों में हमने भगवती के स्वरूप, उनके शासन, उनके 'चिदग्नि' से प्राकट्य और उनके दिव्य संकल्प को समझा। छठा नाम, 'उद्यत्भानु-सहस्राभा', यहाँ से माँ के 'स्थूल रूप' (भौतिक विग्रह) के विस्तृत वर्णन का प्रारंभ करता है।
यहाँ इस छठे नाम की गहराई और उसके आध्यात्मिक रहस्यों पर आधारित एक विशेष विवेचन प्रस्तुत है:
'उद्यत्भानु-सहस्राभा' का अर्थ है "वह देवी जिनकी चमक एक साथ उदय होते हुए एक हजार सूर्यों के समान देदीप्यमान है।" सहस्र सूर्यों की कांति और आध्यात्मिक चेतना का दिव्य उदय। यह नाम माँ के उस तेज का वर्णन करता है जो अज्ञान के अंधकार को मिटाने में सक्षम है।
लाल या सिंदूरी रंग, जो उगते सूर्य की पहचान है, 'रजोगुण' का प्रतीक माना जाता है। यह ब्रह्मांड की गतिशील और रचनात्मक ऊर्जा को दर्शाता है, जो सृष्टि के निर्माण के लिए आवश्यक है। माँ का यह 'अरुणा' (लाल) वर्ण केवल शारीरिक सुंदरता नहीं, बल्कि उनकी सर्वव्यापी करुणा का प्रतीक है जो पूरे ब्रह्मांड को अपनी सुरक्षात्मक आभा में समेट लेती है।
तंत्र शास्त्र के अनुसार, माँ का यह स्वरूप उनकी 'विमर्श' शक्ति को दर्शाता है। जहाँ 'प्रकाश' (शिव) शुद्ध चेतना है, वहीं 'विमर्श' (शक्ति) उस चेतना का वह प्रतिबिंब है जो सृष्टि के रूप में प्रकट होता है। एक हजार सूर्यों की यह आभा यह संकेत देती है कि साधक के भीतर जब ज्ञान का उदय होता है, तो उसका अंतर्मन इसी प्रकार के दिव्य प्रकाश से भर जाता है।
शास्त्रों में कहा गया है कि माँ की यह कांति इतनी तीव्र है कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड को लाल प्रकाश के सागर में डुबो देती है। यह इस सत्य को प्रतिपादित करता है कि कण-कण में उसी आदि-शक्ति का प्रकाश विद्यमान है और कुछ भी उनकी करुणा की परिधि से बाहर नहीं है।
'उद्यत्भानु-सहस्राभा' का स्मरण हमें यह सिखाता है कि जिस प्रकार सूर्य के उदय होते ही रात्रि का अंधकार स्वतः समाप्त हो जाता है, उसी प्रकार माँ ललिता की कृपा का एक अंश ही हमारे जीवन के दुखों और अज्ञान को भस्म करने के लिए पर्याप्त है। यह नाम साधक को 'अविद्या' से मुक्त कर सत्य के प्रकाश की ओर ले जाने वाला एक महामंत्र है।
