प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
रागस्वरूप-पाशाढ्या क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला॥२॥
श्री ललिता सहस्रनाम के प्रथम सात नामों में हमने माँ के स्वरूप, उनके तेज और उनकी चार भुजाओं के रहस्य को समझा। आठवां नाम, 'रागस्वरूप-पाशाढ्या', हमें भगवती के उन दिव्य अस्त्रों (आयुधों) के गहन अर्थ की ओर ले जाता है, जो हमारे सूक्ष्म शरीर और इच्छाओं को नियंत्रित करते हैं।
यहाँ इस आठवें नाम की गहराई और उसके आध्यात्मिक रहस्यों पर आधारित एक विशेष विवेचन प्रस्तुत है:
'रागस्वरूप-पाशाढ्या' का अर्थ है "वह देवी जिन्होंने 'राग' (प्रेम या इच्छा) रूपी पाश (रस्सी) धारण किया है"। यहाँ 'राग' का अर्थ संसार के प्रति आसक्ति नहीं, बल्कि भक्त का ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम है। 'पाश' वह अस्त्र है जो बाँधने या खींचने का कार्य करता है।
तंत्र शास्त्र और श्री विद्या के अनुसार, भगवती के हाथ में स्थित 'पाश' उनकी 'इच्छा शक्ति' का प्रतिनिधित्व करता है। यह अस्त्र उनकी ऊपरी बाईं भुजा में स्थित है। जिस प्रकार एक रस्सी का उपयोग किसी वस्तु को अपनी ओर खींचने के लिए किया जाता है, उसी प्रकार माँ ललिता अपने इस 'प्रेम-पाश' से भक्त की भटकती हुई आत्मा को संसार की माया से खींचकर अपनी दिव्य चेतना की ओर ले आती हैं।
माँ हमारे भीतर की लौकिक इच्छाओं को 'शुद्ध इच्छा' में बदल देती हैं। वे भक्तों की कामनाओं को पूरा करती हैं ताकि वे अंततः उनसे ऊपर उठकर मोक्ष की इच्छा कर सकें।
'राग' हमारे अंतःकरण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि यह राग संसार की ओर है, तो यह बंधन (पाश) बन जाता है; लेकिन यदि यही राग माँ की ओर मुड़ जाए, तो यह मुक्ति का साधन बन जाता है। 'पाश' हमें यह याद दिलाता है कि हमारी सभी इच्छाओं का मूल स्रोत और अंतिम लक्ष्य केवल वह आदि-शक्ति ही है।
माँ का यह स्वरूप अत्यंत मनोहारी है। उनके लाल वर्ण (सिंदूरी रंग) के साथ यह स्वर्णमयी पाश उनकी करुणा को दर्शाता है। वे एक ऐसी साम्राज्ञी हैं जो दंड से नहीं, बल्कि प्रेम के बंधन से शासन करती हैं।
'रागस्वरूप-पाशाढ्या' नाम का जप हमें यह विश्वास दिलाता है कि हम चाहे कितने भी भ्रमित क्यों न हों, माँ का प्रेम-पाश हमें सदैव अपनी ओर खींच लेगा। यह नाम हमें सिखाता है कि भक्ति का अर्थ अपनी इच्छाओं को मारना नहीं, बल्कि उन्हें माँ के चरणों में समर्पित कर देना है। जब हम माँ के प्रेम में 'बँध' जाते हैं, तभी हम वास्तव में संसार के बंधनों से 'मुक्त' होते हैं।
