मंगलवार, 26 मई 2026

12.निजारुण-प्रभापूर-मज्जद्ब्रह्माण्ड-मण्डला - निजारुणप्रभापूरमज्जद्ब्रह्माण्डमण्डलायै नमः

निजारुणप्रभापूरमज्जद्ब्रह्माण्डमण्डला

प्रार्थना

शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
      तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
      सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥

मनोरूपेक्षु-कोदण्डा पञ्चतन्मात्र-सायका।
निजारुण-प्रभापूर-मज्जद्ब्रह्माण्ड-मण्डला॥३॥

श्री ललिता सहस्रनाम के छठे नाम 'उद्यत्भानु-सहस्राभा' से माँ के स्थूल विग्रह का वर्णन शुरू हुआ था। उसी शृंखला में बारवहवाँ नाम 'निजारुण-प्रभा-पूर-मज्जद्-ब्रह्माण्ड-मंडला' भगवती की उस असीम कांति का वर्णन करता है, जो संपूर्ण चराचर जगत को अपनी ओट में ले लेती है।

यह नाम अत्यंत विस्तृत और अर्थपूर्ण है, जो सात शब्दों के मेल से बना है:

निज (स्वयं की) + अरुण (उगते हुए सूर्य की सिंदूरी लालिमा) + प्रभा (दिव्य ज्योति या चमक) + पूर (बाढ़, प्रवाह या महासागर) + मज्जद् (डुबो देना या सराबोर कर देना) + ब्रह्माण्ड-मंडला (संपूर्ण ब्रह्मांड का घेरा)। इसका पूर्ण अर्थ है "वह देवी जिन्होंने अपने स्वयं के विग्रह की लालिमा से संपूर्ण ब्रह्मांड को एक महासागर की तरह डुबो दिया है"।

शास्त्रों के अनुसार, माँ ललिता का यह सिंदूरी वर्ण (लाल रंग) उनकी सर्वव्यापी करुणा और रचनात्मक ऊर्जा (रजोगुण) का प्रतीक है। जैसे सूर्योदय होने पर अंधकार स्वतः समाप्त हो जाता है, वैसे ही देवी की यह 'अरुण' कांति साधक के भीतर की 'अविद्या' (अज्ञान) की रात्रि को समाप्त कर देती है। यह नाम दर्शाता है कि इस ब्रह्मांड में ऐसी कोई वस्तु या स्थान नहीं है जो माँ की दया और उनके प्रकाश से वंचित हो। पूरा ब्रह्मांड उनकी 'करुणा की बाढ़' में डूबा हुआ है।

श्री विद्या में माना जाता है कि देवी का यह प्रकाश केवल भौतिक प्रकाश नहीं है, बल्कि यह शुद्ध चेतना का विस्तार है। जब साधक इस नाम का ध्यान करता है, तो वह अनुभव करता है कि उसका अस्तित्व भी उसी दिव्य लालिमा में विलीन हो रहा है, जो उसे द्वैत से अद्वैत की ओर ले जाती है।

यह नाम भगवती की सुंदरता के उस पक्ष को उजागर करता है जहाँ उनका तेज इतना शक्तिशाली है कि वह उनके आभूषणों और वस्त्रों से भी ऊपर उठकर पूरे आकाशमंडल को 'अरुण' (लाल) कर देता है।

'निजारुण-प्रभा-पूर-मज्जद्-ब्रह्माण्ड-मंडला' नाम का स्मरण हमें यह विश्वास दिलाता है कि हम माँ की करुणा के महासागर में सुरक्षित हैं। उनकी दिव्य लालिमा हमारे जीवन के हर अंधकार को मिटाकर हमें आत्म-साक्षात्कार के प्रकाश की ओर ले जाने का सामर्थ्य रखती है।

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...