प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
श्री ललिता सहस्रनाम के क्रम में, बारहवें नाम के माध्यम से माँ के ब्रह्मांडीय प्रकाश का वर्णन करने के बाद, अब स्तोत्र उनके 'केशादि पादम्' सिर से पैर तक) सौंदर्य वर्णन के चरण में प्रवेश करता है।
तेरहवाँ नाम 'चम्पकाशोक-पुन्नाग-सौगन्धिक-लसत्कचा' भगवती के दिव्य केश-पाश और उनकी अलौकिक सुगन्ध का गुणगान करता है।
यह नाम भगवती के केशों को सजाने वाले चार विशिष्ट पुष्पों के मेल से बना है:
चम्पक सुनहरे पीले रंग का अत्यंत सुगंधित पुष्प।
अशोक लाल रंग का पुष्प, जो शोक का निवारण करता है।
पुन्नाग सफेद रंग का पवित्र पुष्प।
सौगन्धिक यह एक विशेष सुगंधित पुष्प (जैसे कल्हार) हो सकता है, या सभी फूलों की सम्मिलित श्रेष्ठ सुगंध को भी दर्शा सकता है।
लसत्कचा जिनके केश (कच) इन पुष्पों से चमक (लसत्) रहे हैं।
श्री विद्या और तंत्र शास्त्र के अनुसार, भगवती के घने, काले और लंबे केश 'मूल-प्रकृति' का प्रतिनिधित्व करते हैं।सृष्टि पूर्व की अवस्था: जैसे बाल घने और काले होते हैं, वैसे ही सृष्टि के प्राकट्य से पहले की अवस्था (अव्यक्त प्रकृति) को 'अंधकार' या 'शून्यता' के रूप में देखा जाता है। माँ के केश इसी अनभिव्यक्त ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतीक हैं।
केशों में विद्यमान पुष्पों की सुगन्ध साधक के 'पुण्य कर्मों' और आध्यात्मिक क्षमता का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि देवी उन्हीं के हृदय में निवास करती हैं जहाँ सदगुणों की सुगंध महकती है।
सौन्दर्य लहरी - श्लोक 43
धुनोतु ध्वान्तं नस्तुलितदलितेन्दीवरवनं
घनस्निग्धश्लक्ष्णं चिकुरनिकुरुम्बं तव शिवे।
यदीयं सौरभ्यं सहजमुपलब्धुं सुमनसो
वसन्त्यस्मिन्मन्ये वलमथनवाटीविटपिनाम्॥
अर्थ: "हे शिव की अर्धांगिनी! आपके घने, चिकने, कोमल और चमकदार केश, जो खिले हुए नीले कमलों के वन के समान प्रतीत होते हैं, हमारे अज्ञान के अंधकार को दूर करें। मेरा ऐसा मानना है कि इंद्र के नन्दन-वन के दिव्य पुष्प आपके केशों में इसलिए निवास करते हैं ताकि वे अपनी सुगंध आपके केशों से प्राप्त कर सकें।"
'केशादि पादम्' वर्णन का उद्देश्य साधक को एकाग्र करना है। माँ के इस सुगंधित और सुंदर स्वरूप का ध्यान करने से मन शांत होता है और साधक के भीतर सात्विक गुणों का विकास होता है।
'चम्पकाशोक-पुन्नाग-सौगन्धिक-लसत्कचा' नाम हमें माँ के उस वात्सल्य और कोमलता का अनुभव कराता है जो भक्त के जीवन के हर 'शोक' (अशोक) को मिटाकर उसे 'दिव्य सुगंध' से भर देती है। यह नाम केवल शारीरिक सुंदरता का नहीं, बल्कि उस परम चेतना का वर्णन है जो संपूर्ण प्रकृति को जीवन और सौंदर्य प्रदान करती है।
