गुरुवार, 21 मई 2026

7.चतुर्बाहु-समन्विता - चतुर्बाहुसमन्वितायै नमः

प्रार्थना

शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
      तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
      सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥

उद्यद्भानु-सहस्राभा चतुर्बाहु-समन्विता
रागस्वरूप-पाशाढ्या क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला॥२॥

श्री ललिता सहस्रनाम के छठे नाम 'उद्यत्भानु-सहस्राभा' के माध्यम से हमने माँ के उस तेज को समझा जो हज़ारों सूर्यों के समान है। इसके तुरंत बाद सातवां नाम आता है 'चतुर्बाहु-समन्विता'। यहाँ से भगवती के साकार विग्रह की संरचना का वह भाग शुरू होता है जो उनके ब्रह्मांडीय प्रशासन और भक्त के मानस पर उनके नियंत्रण को दर्शाता है।

'चतुर्बाहु-समन्विता' का सरल अर्थ है "वह देवी जो चार भुजाओं से युक्त हैं"। तंत्र शास्त्र और श्री विद्या में देवी की चार भुजाएं केवल शारीरिक अंग नहीं हैं, बल्कि वे चार विशिष्ट शक्तियों और अस्त्रों (आयुधों) की वाहक हैं जो संपूर्ण सृष्टि का संचालन करती हैं। इसके अतिरिक्त, सूक्ष्म स्तर पर यह नाम 'पंचदशी मंत्र' के चार खंडों (अंगों) की ओर भी संकेत करता है।

माँ की इन चार भुजाओं में चार दिव्य अस्त्र हैं, जो साधक के भीतर के 'अंतःकरण' को शुद्ध करते हैं। इक्षु कोदण्ड (गन्ने का धनुष) 'मन' का प्रतीक है। देवी इसे धारण कर हमारे चंचल मन को दिशा देती हैं। पंच पुष्प बाण (पांच फूलों के तीर) 'पांच तन्मात्राओं' (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) या हमारी पांच ज्ञानेंद्रियों के प्रतीक हैं। देवी इन्हें नियंत्रित कर हमें विषयों की गुलामी से मुक्त करती हैं। पाश 'इच्छा' (राग) का प्रतीक है। इसके माध्यम से माँ भक्त की भटकती आत्मा को अपनी ओर खींच लेती हैं। अंकुश 'ज्ञान' का प्रतीक है जो हमारे भीतर के क्रोध और अज्ञान रूपी मतवाले हाथी को वश में करता है।

यह नाम भगवती के 'स्थूल रूप' (भौतिक विग्रह) का वर्णन करता है। श्री विद्या साधना के अनुसार, माँ के इस चार भुजाओं वाले सुंदर रूप का ध्यान करने से साधक का मन एकाग्र होता है, जो उसे अंततः उनके 'सूक्ष्म रूप' (श्री चक्र) और 'पर रूप' (शुद्ध चेतना) की ओर ले जाता है।

'चतुर्बाहु-समन्विता' नाम हमें यह सिखाता है कि माँ ललिता ने अपने हाथों में जो शस्त्र लिए हैं, वे हमें डराने के लिए नहीं, बल्कि हमारे मन और इंद्रियों को अनुशासित करने के लिए हैं। उनकी ये चार भुजाएं हमें यह आश्वासन देती हैं कि वे हमारे जीवन के हर पक्ष - इच्छा, ज्ञान, कर्म और मन पर अपनी कृपा बनाए हुए हैं।

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...