प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
श्री ललिता सहस्रनाम के सोलहवें नाम में माँ के मुख-मंडल पर सुशोभित कस्तूरी तिलक का वर्णन करने के बाद, वाग्देवियाँ अब उनके नेत्रों के ठीक ऊपर स्थित 'चिल्लिका' (eyebrows) की सुंदरता का वर्णन करती हैं। वह सत्रहवाँ नाम है 'वदन-स्मर-माङ्गल्य-गृह-तोरण-चिल्लिका'। यह नाम भगवती के सौंदर्य को प्रेम और आध्यात्मिकता के एक नए शिखर पर ले जाता है।
यह नाम पाँच सूक्ष्म शब्दों का एक अत्यंत सुंदर संयोजन है: वदन (मुख) + स्मर (कामदेव) + माङ्गल्य-गृह (वह घर जो मंगलकारी और सौभाग्यशाली है) + तोरण (वह मेहराब या वंदनवार जो घर के मुख्य द्वार पर सजाया जाता है ) + चिल्लिका (भौहें/Eyebrows)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिनका मुख साक्षात कामदेव का मंगलकारी निवास स्थान है और जिनकी भौहें उस घर के मुख्य द्वार पर सजी हुई सुंदर वंदनवार या मेहराब के समान हैं"।
सौन्दर्य लहरी (श्लोक 47)
आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' में भगवती की भौहें की सुंदरता का वर्णन करते हुए उन्हें कामदेव के धनुष से जोड़ा है, जो इस नाम के भाव को और भी प्रगाढ़ करता है:
भ्रुवौ भुग्ने किञ्चिद् भुवन-भय-भङ्ग-व्यसनिनि त्वदीये नेत्राभ्यां मधुकर-रुचिभ्यां धृत-गुणम्।
धनुर्मन्ये सव्ये'तर-कर-गृहीतं रतिपतेः प्रकोष्ठे मुष्टौ च स्थगयति निगूढान्तर-मुमे ॥
भावार्थ: "हे माता उमे! आपकी थोड़ी सी मुड़ी हुई भौहें, जो संसार के भय को नष्ट करने वाली हैं, मुझे कामदेव (रतिपति) के धनुष के समान प्रतीत होती हैं। ऐसा लगता है कि आपके नेत्र रूपी भौंरों ने उस धनुष की डोरी थाम रखी है और उसका मध्य भाग आपकी मुट्ठी (नासिका के ऊपर का भाग) में छिपा हुआ है"।
'देवी भागवत पुराण' के अनुसार, भगवती ललिता का मुख-मंडल स्वयं विशुद्ध प्रेम और आनंद का केंद्र है। पुराणों में वर्णन है कि कामदेव (स्मर) अपनी शक्ति और आकर्षण माँ के इसी मुख-मंडल से प्राप्त करते हैं। उनकी भौहें की वक्रता (Curvature) केवल शारीरिक विशेषता नहीं है, बल्कि वह उस 'इच्छा शक्ति' का प्रतीक है जो सृष्टि की रचना के लिए उत्तरदायी है।
माँ की भौहें उस महल के प्रवेश द्वार की तरह हैं जहाँ प्रवेश करते ही साधक को 'कामेश्वर' (परम शिव) और 'कामेश्वरी' (परम शक्ति) के अद्वैत प्रेम का अनुभव होता है।
तंत्र शास्त्र में माँ का मुख "मंगल गृह" माना गया है। भौहें उस द्वार की "तोरण" हैं। यह संकेत देता है कि जब हम माँ के चेहरे का ध्यान करते हैं, तो हम उनके हृदय के प्रेम-महल में प्रवेश कर रहे होते हैं। जिस प्रकार एक सुंदर तोरण अतिथि का स्वागत करता है, माँ की भौहें भक्त का स्वागत करती हैं, लेकिन कामदेव के शस्त्रों के रूप में वे साधक के भीतर के काम, क्रोध और अहंकार को भस्म भी कर देती हैं। आज्ञा चक्र के ठीक नीचे स्थित ये भौहें साधक को उस 'बिंदु' की ओर ले जाती हैं जहाँ समस्त द्वंद्व समाप्त हो जाते हैं।
'वदन-स्मर-माङ्गल्य-गृह-तोरण-चिल्लिका' नाम का ध्यान करने से साधक के जीवन में मंगल और शुभता का आगमन होता है। यह नाम हमें सिखाता है कि माँ का सौंदर्य केवल बाहरी नहीं है, बल्कि वह उस परम कल्याणकारी घर का द्वार है जहाँ केवल अमृत और आनंद की वर्षा होती है। जब हम माँ की इन धनुषाकार भौहों का चिंतन करते हैं, तो हमारे जीवन के मानसिक विक्षेप शांत हो जाते हैं और हम उनके चरणों में पूर्ण समर्पण प्राप्त करते हैं।
