प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
श्री ललिता सहस्रनाम के पंद्रहवें नाम 'अष्टमी-चन्द्र-विभ्राज-दलिक-स्थल-शोभिता' में माँ के अष्टमी के चंद्रमा के समान सुंदर ललाट (माथे) का वर्णन करने के बाद, अब वाग्देवियाँ सोलहवें नाम के माध्यम से उनके मुख-मंडल की पूर्णता और उस पर सुशोभित कस्तूरी तिलक का वर्णन करती हैं। वह नाम है 'मुख-चन्द्र-कलङ्काभ-मृगनाभि-विशेषका'।
यह नाम चार सूक्ष्म भावों का संगम है: मुख-चन्द्र (चंद्रमा के समान देदीप्यमान मुख) + कलङ्काभ (चंद्रमा में दिखने वाले धब्बे (लांछन) के समान आभा) + मृगनाभि (कस्तूरी जो हिरण की नाभि से प्राप्त होती है) + विशेषका (माथे पर लगाया जाने वाला विशेष तिलक)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिनके चंद्रमा रूपी मुख पर लगा कस्तूरी का तिलक वैसा ही सुशोभित है, जैसा चंद्रमा में दिखने वाला हिरण के आकार का धब्बा (कलंक) प्रतीत होता है"।
सौन्दर्य लहरी (श्लोक 46)
आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' में भगवती के मुख और तिलक की सुंदरता का वर्णन करते हुए ललाट और तिलक के संबंध को स्पष्ट किया है। हालाँकि श्लोक 46 मुख्य रूप से ललाट (माथे) पर केंद्रित है, लेकिन तिलक की आभा को समझने के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण है:
ललाटं लावण्य-द्युति-विमल-माभाति तव यत् द्वितीयं तन्मन्ये मुकुट-घटितं चन्द्र-शकलम्।
विपर्यास-न्यासा-दुभयमपि सम्भूय च मिथः सुधालेप-स्यूतिः परिणमति राका-हिमकरः॥
भावार्थ: "हे माता! आपका निर्मल ललाट मुकुट में जड़े हुए आधे चंद्रमा का दूसरा भाग प्रतीत होता है। यदि इन दोनों को मिला दिया जाए, तो वे पूर्ण चंद्रमा के रूप में परिणत होकर अमृत की वर्षा करते हैं"। इस पूर्ण चंद्रमा में जो केंद्र बिंदु है, वही सहस्रनाम का 'कस्तूरी तिलक' है।
'देवी भागवत पुराण' के अनुसार, भगवती ललिता मणिद्वीप में कस्तूरी और चंदन के लेप से सुशोभित रहती हैं। कस्तूरी (मृगनाभि) की सुगंध 'आकर्षण' और 'एकाग्रता' का प्रतीक है। पुराणों में वर्णन है कि माँ का मुख मंडल स्वयं एक ब्रह्मांडीय चंद्रमा है, और तिलक वह केंद्र बिंदु है जहाँ साधक का ध्यान स्थिर होना चाहिए। यह तिलक अज्ञान के 'कलंक' को भी दिव्य 'अलंकार' में बदलने की माँ की शक्ति को दर्शाता है।
योग शास्त्र के अनुसार, यह नाम माँ के आज्ञा चक्र की ओर संकेत करता है। माथे का तिलक वह स्थान है जहाँ साधक की 'चित्त-वृत्ति' एकाग्र होती है। चंद्रमा का धब्बा (कलंक) सामान्यतः दोष माना जाता है, लेकिन माँ के मुख पर वही 'कलंक' (कस्तूरी तिलक के रूप में) उनकी शोभा बढ़ाता है। यह दर्शाता है कि माँ अपने भक्तों के दोषों को भी स्वीकार कर उन्हें दिव्य बना देती हैं। सफेद मुख (चंद्रमा) 'प्रकाश' (शिव) का प्रतीक है और काला तिलक (कस्तूरी) 'विमर्श' (शक्ति) का प्रतीक है।
'मुख-चन्द्र-कलङ्काभ-मृगनाभि-विशेषका' नाम का ध्यान करने से साधक के मन में एकाग्रता और शांति का उदय होता है। यह तिलक हमें याद दिलाता है कि भक्ति का मार्ग 'बिंदु' (एकाग्रता) से शुरू होकर 'सिंधु' (असीम करुणा) तक जाता है। जब हम माँ के इस स्वरूप का चिंतन करते हैं, तो हमारे जीवन के मानसिक विकार भी माँ की कृपा से - आभूषण बन जाते हैं।
