प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
श्री ललिता सहस्रनाम के छत्तीसवें नाम में माँ के उदर पर स्थित 'त्रिवली' (तीन रेखाओं) का वर्णन करने के बाद, अब वाग्देवियाँ उनके शरीर के मध्य भाग के सौंदर्य और उनके दिव्य वस्त्रों का वर्णन करती हैं। सैंतीसवाँ नाम है 'अरुणारुण-कौसुम्भ-वस्त्र-भास्वत्-कटी-तटी'। यह नाम माँ ललिता के उस तेज को प्रकट करता है जो उनके रेशमी वस्त्रों और उनके विग्रह की स्वर्णिम लाल आभा से उत्पन्न होता है।
'ललितोपाख्यान' (ब्रह्माण्ड पुराण) के अनुसार, जब माँ ललिता 'चिदग्नि कुण्ड' से प्रकट हुईं, तब उनका विग्रह करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी था। पुराणों में वर्णन है कि उन्होंने अनार के फूलों के समान लाल रंग के दिव्य वस्त्र धारण किए हुए थे। यह रंग उनकी 'विजया' (विजयी) और 'सृजनात्मक' शक्ति का सूचक है।
'देवी भागवत पुराण' के मणिद्वीप वर्णन में उल्लेख है कि भगवती ललिता रत्न जड़ित पलंग पर विराजमान हैं और उनके वस्त्रों की लाल आभा सम्पूर्ण ब्रह्मांड को प्रकाशित कर रही है। उनके ये लाल वस्त्र भक्तों के प्रति उनके 'अनुराग' (परम प्रेम) को दर्शाते हैं।
आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के 94वें श्लोक में माँ की इस करुणा को 'अरुणा' (लाल) रूप में चित्रित किया है:जगत् त्रातुं शम्भोर्-जयति करुणा काचिदरुणा। भावार्थ: "जगत की रक्षा के लिए भगवान शिव की करुणा ही 'अरुणा' (लाल रंग की देवी ललिता) के रूप में प्रतिष्ठित है"।
'मूक पंचशती' में मूक कवि कहते हैं कि माँ कामाक्षी की कटि पर सुशोभित वस्त्र की लालिमा साधक के हृदय में ज्ञान की अग्नि प्रज्वलित करती है। यह वस्त्र केवल एक आच्छादन नहीं, बल्कि 'माया' का वह पवित्र स्वरूप है जो सत्य को सुंदर बनाता है।
श्री विद्या साधना और तन्त्र शास्त्र के अनुसार, यह नाम अत्यंत महत्वपूर्ण है। लाल रंग 'रजोगुण' का प्रतीक है, जो सृष्टि की रचना और गतिविधि के लिए उत्तरदायी है। माँ का कटि प्रदेश 'मणिपूर चक्र' और 'स्वाधिष्ठान चक्र' के निकट है, जो मनुष्य की इच्छा और सृजनात्मक ऊर्जा के केंद्र हैं।
श्री विद्या में शिव 'प्रकाशा' (सफेद रंग) हैं और शक्ति 'विमर्शा' (लाल रंग) हैं। माँ के लाल वस्त्र यह संकेत देते हैं कि वे शिव की उस शक्ति का क्रियात्मक रूप हैं जो इस दृश्य जगत को प्रकट करती है।
'वामकेश्वर तन्त्र' और 'योगिनी हृदय' के अनुसार, माँ का लाल रूप साधक को आंतरिक कुण्डलिनी जागरण की ऊर्जा प्रदान करता है। लाल रेशमी वस्त्र उस सुरक्षा और अनुशासन का प्रतीक हैं जिसमें साधक की ऊर्जा सुरक्षित रहती है।
'अरुणारुण-कौसुम्भ-वस्त्र-भास्वत्-कटी-तटी' नाम का ध्यान करने से साधक के भीतर उत्साह और तेज का संचार होता है। यह नाम हमें सिखाता है कि दिव्य चेतना न केवल निराकार है, बल्कि वह सौंदर्य और वैभव के रूप में भी प्रकट होती है। जब हम माँ के इस जाज्वल्यमान स्वरूप का चिंतन करते हैं, तो हमारी कामवासना 'राम-वासना' (दिव्य आनंद) में बदल जाती है और हमारा जीवन माँ के प्रेम के रंग (अनुराग) में रंग जाता है।
