प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
श्री ललिता सहस्रनाम के सैंतीसवें नाम में माँ के अरुण वर्ण के रेशमी वस्त्रों का वर्णन करने के बाद, अब वाग्देवियाँ उनके कटि प्रदेश (कमर) के सबसे आकर्षक आभूषण करधनी का वर्णन करती हैं। अड़तीसवाँ नाम है 'रत्नकिङ्किणिकारम्य-रशनादाम-भूषिता'। यह नाम माँ ललिता के उस वैभव को दर्शाता है जहाँ मणियों की चमक और नन्हीं घंटियों की ध्वनि मिलकर एक दिव्य संगीत (नाद) उत्पन्न करती है।
इस नाम में माँ के श्रृंगार का बहुत ही सूक्ष्म वर्णन है। रत्न (बहुमूल्य मणियाँ जैसे माणिक्य, पन्ना और हीरा) + किङ्किणिका (छोटी-छोटी घंटियाँ) + रम्य (अत्यंत मनमोहक या सुंदर) + रशना-दाम (करधनी या कमरबंद) + भूषिता (विशेष रूप से अलंकृत या सुशोभित) । पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जो रत्नों से जड़ित छोटी-छोटी घंटियों वाली अत्यंत सुंदर करधनी (कमरबंद) से सुशोभित हैं"।
आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के सातवें श्लोक में माँ के इस आभूषण का वर्णन करते हुए उन्हें कामदेव (मन्मथ) की विजय शक्ति के रूप में देखा है:
क्वणत्-काञ्ची-दामा करि-कलभ-कुम्भ-स्तन-भरा
परिक्षीणा मध्ये परिणत-शरच्चन्द्र-वदना।
भावार्थ: "हे माता! आपकी कमर उस स्वर्ण-करधनी (काञ्ची-दाम) से सुशोभित है जो 'क्वणत्' (निरंतर मधुर ध्वनि) उत्पन्न कर रही है। भारी वक्षस्थल के कारण आपकी कमर पतली (क्षीण) हो गई है और आपका मुख शरद पूर्णिमा के चंद्रमा के समान उज्ज्वल है"। यहाँ करधनी की घंटियों की आवाज़ को साधक के मन को एकाग्र करने वाला 'नाद' माना गया है।
देवी भागवत और ललितोपाख्यान पुराणों के अनुसार, मणिद्वीप की साम्राज्ञी की करधनी शुद्ध स्वर्ण से निर्मित है और उसमें जड़ित 'वैडूर्यमणि' और 'माणिक्य' संपूर्ण दिशाओं को आलोकित करते हैं। उनकी करधनी में लगी नन्हीं घंटियों की आवाज़ समस्त वेदों के मंत्रों का सूक्ष्म रूप है।
त्रिपुरा रहस्य के अनुसार, कमर का यह आभूषण 'शक्ति' का वह केंद्र है जहाँ से ऊर्जा ऊपर की ओर (हृदय की ओर) प्रवाहित होती है। 'योगिनी हृदय' के अनुसार, करधनी 'इच्छा शक्ति'का प्रतीक है जो साधक की चेतना को संसार से खींचकर माँ के चरणों में स्थिर करती है।
मूक कवि अपनी रचना 'आर्या शतकम्' में कहते हैं कि माँ कामाक्षी की करधनी की घंटियाँ उन भक्तों को पुकार रही हैं जो संसार के भंवर में खो गए हैं। यह करधनी ही वह 'बंधन' है जो साधक को मोक्ष के मार्ग पर बांधे रखती है।
श्री विद्या साधना में, करधनी का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। करधनी का स्थान शरीर के उन चक्रों के निकट है जहाँ कुण्डलिनी शक्ति सुप्त अवस्था में रहती है। 'किङ्किणिका' (घंटियों) की ध्वनि उस 'अनाहत नाद' का संकेत है जो कुण्डलिनी के जाग्रत होने पर साधक को सुनाई देता है। करधनी में जड़ित रत्न नौ ग्रहों की शक्तियों को नियंत्रित करते हैं। माँ का इन्हें धारण करना यह दर्शाता है कि वे काल और ग्रहों के प्रभाव से परे हैं और अपने शरणागत भक्तों की रक्षा करती हैं।
तंत्र में 'रशना-दाम' को अनुशासन का प्रतीक माना गया है। यह साधक को अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण रखने की प्रेरणा देता है ताकि वह आध्यात्मिक शिखर तक पहुँच सके।
'रत्नकिङ्किणिकारम्य-रशनादाम-भूषिता' नाम का ध्यान करने से साधक के भीतर के 'अज्ञान' का अंधकार मिटता है और उसे दिव्य 'नाद' का अनुभव होता है। यह नाम हमें सिखाता है कि जिस प्रकार रत्न और घंटियाँ मिलकर सौंदर्य बढ़ाती हैं, वैसे ही ज्ञान (रत्न) और भक्ति (ध्वनि) मिलकर ही पूर्णता प्रदान करते हैं। जब हम माँ के इस वैभवशाली स्वरूप का चिंतन करते हैं, तो हमारे जीवन की हर हलचल एक मधुर संगीत में बदल जाती है।
