प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
श्री ललिता सहस्रनाम के चालीसवें नाम में माँ के माणिक्य-मुकुट के समान सुशोभित घुटनों का वर्णन करने के बाद, वाग्देवियाँ अब उनके विग्रह के अगले भाग पिंडलियों अर्थात् जङ्घाओं की सुंदरता का गान करती हैं। 41वाँ नाम है इन्द्रगोप-परिक्षिप्त-स्मरतूणाभ-जङ्घिका — इन्द्रगोपपरिक्षिप्तस्मरतूणाभजङ्घिकायै नमः। यह नाम भगवती की पिंडलियों की तुलना कामदेव के दिव्य तरकश से करता है, जो इन्द्रगोपों जैसी सूक्ष्म अरुण-लाल आभा से घिरा हुआ प्रतीत होता है।
इन्द्रगोप गहरे लाल रंग का एक छोटा बरसाती कीट माना जाता है, जो वर्षा ऋतु में पृथ्वी पर लाल बिंदुओं के समान दिखाई देता है। यहाँ उसका संकेत सचमुच कीटों से सजावट नहीं, बल्कि उसकी गहरी अरुण-लालिमा और मखमली स्पर्श-जैसी कोमल आभा से है। परिक्षिप्त का अर्थ है चारों ओर से घिरा हुआ, आच्छादित या अलंकृत; स्मर-तूण का अर्थ है कामदेव का तरकश; आभ का अर्थ है सदृश या समान आभा वाला; और जङ्घिका का अर्थ है पिंडलियाँ। अतः इस नाम का भावार्थ है "वह देवी जिनकी पिंडलियाँ कामदेव के तरकश के समान मनोहर हैं और इन्द्रगोपों की अरुण-लाल छटा से अलंकृत प्रतीत होती हैं।"
इस नाम में देवी के अंग-सौंदर्य का वर्णन अत्यंत सूक्ष्म काव्य-शैली में किया गया है। कामदेव का तरकश सौंदर्य, आकर्षण और इच्छा-शक्ति का प्रतीक है। जब माँ की पिंडलियों को कामदेव के तरकश के समान कहा जाता है, तो इसका भाव यह है कि संसार में जो भी आकर्षण, माधुर्य और सृजनात्मक प्रेरणा है, वह अंततः भगवती की ही शक्ति से प्रकाशित होती है। कामदेव के बाण भी माँ की दिव्य इच्छा-शक्ति के अधीन हैं।
आदि शंकराचार्य ने सौन्दर्य लहरी के 83वें श्लोक में इसी भाव का सुंदर विस्तार किया है...
पराजेतुं रुद्रं द्विगुणशरगर्भौ गिरिसुते
निषङ्गौ जङ्घे ते विषमविशिखो बाढमकृत ।
यदग्रे दृश्यन्ते दशशरफलाः पादयुगली-
नखाग्रच्छद्मानः सुरमुकुटशाणैकनिशिताः ॥
इस श्लोक का भाव है कि हे गिरिसुते! पाँच बाणों वाले कामदेव ने रुद्र को जीतने के लिए आपकी दोनों जङ्घाओं को अपने दो तरकशों के समान बना लिया है। उन तरकशों के अग्रभाग में आपके दोनों चरणों के दस नख मानो दस बाणों की तीक्ष्ण नोकों के समान चमक रहे हैं, जो देवताओं के मुकुटों की मणियों से और भी अधिक तीक्ष्ण और प्रकाशमान हो गए हैं।
यहाँ कामदेव की कथा भी स्मरणीय है। कामदेव ने भगवान शिव को मोहित करने का प्रयास किया था, परंतु शिव के तृतीय नेत्र की अग्नि से वह भस्म हो गया। सौन्दर्य लहरी के इस श्लोक में कवि संकेत करते हैं कि वही कामदेव अब देवी की शरण में है। उसकी शक्ति स्वतंत्र नहीं है; वह भगवती की कृपा और सौंदर्य से ही समर्थ होती है। इसलिए माँ की जङ्घाएँ उसके तरकश के समान कही गई हैं।
इन्द्रगोप की लालिमा इस नाम में विशेष महत्त्व रखती है। लाल रंग श्रीविद्या परंपरा में इच्छा-शक्ति, राग, अनुराग, सृजन और चैतन्य की सक्रियता का प्रतीक माना जाता है। देवी ललिता का वर्ण भी अरुण, रक्तिम और उदित सूर्य के समान बताया गया है। इसलिए इन्द्रगोप की लाल बिंदु-जैसी छटा माँ के अंगों की अरुण माधुरी को और अधिक काव्यमय बना देती है।
यह नाम केवल शारीरिक सौंदर्य का वर्णन नहीं करता। इसमें एक गहरा आध्यात्मिक संकेत भी है। मनुष्य की इच्छाएँ यदि अहंकार और विषयों की ओर जाती हैं, तो वे बंधन बन जाती हैं; पर वही इच्छाएँ यदि माँ के चरणों की ओर मुड़ जाएँ, तो वे साधना का साधन बन जाती हैं। कामदेव का तरकश यहाँ इस बात का प्रतीक है कि समस्त कामनाएँ, आकर्षण और प्रेरणाएँ अंततः देवी की शक्ति में ही स्थित हैं।
माँ की पिंडलियाँ गति का आधार हैं। वे साधक को यह स्मरण कराती हैं कि आध्यात्मिक पथ पर आगे बढ़ने के लिए केवल ज्ञान ही पर्याप्त नहीं, बल्कि दिव्य प्रेरणा और माँ की कृपा भी आवश्यक है। जिस प्रकार पिंडलियाँ शरीर को गति देती हैं, उसी प्रकार भगवती की इच्छा-शक्ति साधक की चेतना को स्थूल इच्छाओं से उठाकर परम सत्य की ओर ले जाती है।
श्रीविद्या की दृष्टि से यह नाम माँ की इच्छा-शक्ति और आनंद-शक्ति का सुंदर संकेत है। कामदेव का संबंध इच्छा से है, पर देवी के अधीन होकर वही इच्छा शुद्ध होकर भक्ति, साधना और आत्मोन्नति का कारण बन जाती है। इस प्रकार स्मर-तूण केवल लौकिक कामना का प्रतीक नहीं रहता, बल्कि वह दिव्य प्रेम और ब्रह्मानंद की ओर ले जाने वाला साधन बन जाता है।
इन्द्रगोप-परिक्षिप्त-स्मरतूणाभ-जङ्घिका नाम का ध्यान करते समय साधक माँ की पिंडलियों को अरुण प्रभा से दीप्त, कोमल, सुंदर और दिव्य गति देने वाली शक्ति के रूप में देख सकता है। उनके चरणों के समीप कामदेव की शक्ति भी विनम्र हो जाती है। यह ध्यान साधक को सिखाता है कि संसार की सारी इच्छाएँ माँ के चरणों में समर्पित होकर पवित्र हो सकती हैं।
अतः इस नाम का सार यह है कि माँ ललिता का सौंदर्य केवल दृश्य रूप-लावण्य नहीं है; वह स्वयं ब्रह्मांड को चलाने वाली परम इच्छा-शक्ति का प्रकटीकरण है। इन्द्रगोप की लालिमा, कामदेव का तरकश और माँ की जङ्घाओं की कोमल गति — ये सब मिलकर बताते हैं कि आकर्षण, सौंदर्य, प्रेम और सृजन — सब भगवती की ही लीला हैं। माँ के इन दिव्य अंगों का चिंतन करने से मन की चंचलता शांत होती है और साधक अपनी समस्त कामनाओं को माँ के चरणों में समर्पित कर शांति, भक्ति और आत्मिक उन्नति प्राप्त करता है।

