प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
श्री ललिता सहस्रनाम के उनतालीसवें नाम में माँ की कोमल जंघाओं का वर्णन करने के बाद, वाग्देवियाँ अब उनके विग्रह के अगले भाग 'जानु' (घुटनों) की महिमा का गान करती हैं। चालीसवाँ नाम है 'माणिक्यमुकुटाकार-जानुद्वय-विराजिता'। यह नाम भगवती के घुटनों के सौन्दर्य को एक 'राजसी मुकुट' के रूप में चित्रित करता है, जो उनके ब्रह्मांडीय साम्राज्ञी होने का प्रमाण है।
'ललितोपाख्यान' और 'ब्रह्माण्ड पुराण' के अनुसार, माँ ललिता का प्राकट्य देवताओं के कल्याण के लिए 'चिदग्नि कुण्ड' (ज्ञान की अग्नि) से हुआ था। उनके विग्रह का प्रत्येक अंग दिव्य आभा से निर्मित है। माँ के घुटनों को 'माणिक्य मुकुट' के समान कहना यह दर्शाता है कि वे सम्पूर्ण सृष्टि की 'महारानी' हैं।
'देवी भागवत पुराण' के मणिद्वीप वर्णन में उल्लेख है कि भगवती जब भगवान कामेश्वर की बाईं गोद में विराजमान होती हैं, तब उनके चरणों और घुटनों की आभा करोड़ों सूर्यों के समान लालिमा बिखेरती है (उद्यद्भानु-सहस्त्राभा)।
आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के 82वें श्लोक में माँ की जंघाओं और घुटनों के सन्धि स्थल की तुलना स्वर्ण-कदली और ऐरावत की सूंड से की है, लेकिन सहस्रनाम में वाग्देवियाँ इसे और भी राजसी रूप प्रदान करती हैं।
'मूक पंचशती' के अनुसार, माँ कामाक्षी के घुटनों की चमक साधक के अज्ञान रूपी अंधकार को वैसे ही नष्ट कर देती है जैसे मणियों का प्रकाश गुफा के अंधेरे को दूर करता है। माँ का प्रत्येक अंग साधक के लिए ध्यान का एक केंद्र है।
श्री विद्या साधना और तंत्र शास्त्र के अनुसार, यह नाम 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर यात्रा का संकेत है। मुकुट सत्ता का प्रतीक है। घुटनों का मुकुट के समान होना यह दर्शाता है कि माँ ललिता की शक्ति समस्त गतियों और क्रियाओं पर शासन करती है।
माणिक्य का लाल रंग 'विमर्शा' शक्ति का प्रतीक है, जो सृजनात्मक ऊर्जा को दर्शाता है। तंत्र में माना जाता है कि घुटने स्थिरता प्रदान करते हैं; माँ के घुटनों का ध्यान करने से साधक के आध्यात्मिक जीवन में स्थिरता आती है। 'शिखा से नख' वर्णन में जंघाओं से घुटनों की ओर बढ़ना यह संकेत देता है कि साधक की चेतना अब आधार चक्रों से ऊपर उठकर माँ के हृदय और ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ रही है।
'त्रिपुरा रहस्य' के अनुसार, माँ त्रिपुरा सुन्दरी ही वह 'चित्त-शक्ति' हैं जो तीनों अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) में व्याप्त हैं। घुटनों का मुकुट जैसा स्वरूप यह सिद्ध करता है कि वे प्रकृति और पुरुष के मिलन का वह बिंदु हैं जहाँ से ब्रह्मांड की लय और गति नियंत्रित होती है।
