प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
श्री ललिता सहस्रनाम के उनतीसवें नाम में माँ की अनुपम ठुड्डी (चिबुक) का वर्णन करने के बाद, अब वाग्देवियाँ उनके मुख-सौंदर्य के आधार कन्धरा (गर्दन) का वर्णन करती हैं। तीसवाँ नाम है 'कामेष-बद्ध-माङ्गल्य-सूत्र-शोभित-कन्धरा'। यह नाम भगवती को 'नित्य सुहागिन' के रूप में प्रतिष्ठित करता है और उनके गले में सुशोभित मंगलसूत्र की महिमा का गान करता है।
कामेश (भगवान कामेश्वर/शिव, जो इच्छाओं के स्वामी हैं) + बद्ध (बांधा गया या धारण कराया गया) + माङ्गल्य-सूत्र (पवित्र विवाह का सूत्र; मंगलसूत्र) + शोभित (अत्यंत सुशोभित या चमकदार) + कन्धरा (गर्दन)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिनकी गर्दन स्वयं भगवान कामेश्वर द्वारा बांधे गए पवित्र मंगलसूत्र से सुशोभित है"।
आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के 69वें श्लोक में माँ की ग्रीवा (गर्दन) पर स्थित तीन रेखाओं और विवाह सूत्र का अद्भुत वर्णन किया है:
गले रेखास्तिस्रो गति-गमक-गीतैक-निपुणे
विवाह-व्यानद्ध-प्रगुण-गुण-संख्या-प्रतिभुवः।
विराजन्ते नाना-विध-मधुर-रागाकर-भुवां
त्रयाणां ग्रामाणां स्थिति-नियम-सीमान इव ते ॥
भावार्थ: "हे संगीत की कलाओं में निपुण माता! आपकी गर्दन पर दिखाई देने वाली तीन रेखाएं मानो आपके विवाह के समय बांधे गए मंगलसूत्र के तीन धागों का प्रमाण हैं। ये रेखाएं संगीत के तीन ग्रामों (षड्ज, मध्यम और गांधार) की सीमाओं के समान प्रतीत होती हैं"। यह दर्शाता है कि माँ का कंठ समस्त नाद और संगीत का मूल स्रोत है।
'देवी भागवत पुराण' के अनुसार, मणिद्वीप की साम्राज्ञी की गर्दन शंख के समान चिकनी और कलात्मक डिजाइनों से सजी हुई है। उनके गले में मणियों और रत्नों के हार सुशोभित हैं, लेकिन सबसे प्रमुख वह मंगलसूत्र है जो उनके 'अविनाशी सुहाग' का प्रतीक है। पुराणों में वर्णन है कि माँ ललिता का सुहाग काल से परे है, क्योंकि वे और कामेश्वर एक ही परम तत्व के दो रूप हैं।
'मूक पंचशती' में मूक कवि कहते हैं कि माँ के गले का मंगलसूत्र साधक के लिए वह रक्षक सूत्र है जो उसे संसार के बंधनों से मुक्त कर देवी के चरणों से बांध देता है।
श्री विद्या साधना और तन्त्र के अनुसार, यह नाम अत्यंत गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ रखता है। शिव-शक्ति सामरस्य - 'कामेष-बद्ध' शब्द यह दर्शाता है कि शक्ति स्वयं को स्वेच्छा से शिव के बंधन में स्वीकार करती हैं। यह 'प्रकाशा' (शिव) और 'विमर्शा' (शक्ति) के अटूट मिलन का प्रतीक है।
गर्दन का स्थान 'विशुद्धि चक्र' का है। यहाँ मंगलसूत्र का होना यह दर्शाता है कि माँ की वाणी और विचार पूर्णतः शुद्ध और मंगलकारी हैं।
मंगलसूत्र के तीन धागे या गर्दन की तीन रेखाएं माँ की तीन प्रमुख शक्तियों - इच्छा, ज्ञान और क्रिया का प्रतिनिधित्व करती हैं।
तंत्र में माँ को 'नित्य सुवसिनी' कहा गया है, जिसका अर्थ है वह जो कभी विधवा नहीं होतीं। उनका सुहाग (शिव) शाश्वत है, इसलिए उनकी कृपा भी अक्षय है।
