प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
श्री ललिता सहस्रनाम के अट्ठाइसवें नाम में माँ की उस मंद मुस्कान का वर्णन किया गया जिसमें कामेश्वर का मन डूबा रहता है। अब, वाग्देवियाँ उस मुस्कान के आधार और मुख-सौंदर्य के अंतिम छोर ठुड्डी (ठोड़ी, चिबुक) का वर्णन करती हैं। उनतीसवाँ नाम है 'अनाकलित-सादृश्य-चिबुक-श्री-विराजिता'। यह नाम माँ ललिता के सौंदर्य की उस पराकाष्ठा को दर्शाता है जिसकी तुलना संसार की किसी भी वस्तु से करना असंभव है।
अनाकलित (जिसे ग्रहण न किया जा सके, या जिसकी कल्पना न की जा सके) + सादृश्य (समानता या उपमा) + चिबुक (ठुड्डी/Chin) + श्री (शोभा, कांति या लक्ष्मी) + विराजिता (विशेष रूप से सुशोभित)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जो अपनी ऐसी सुंदर ठुड्डी से सुशोभित हैं जिसकी समानता (उपमा) देने के लिए पूरे ब्रह्मांड में कोई दूसरी वस्तु उपलब्ध नहीं है"।
आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के 67वें श्लोक में माँ की ठुड्डी का वर्णन करते हुए उसे एक दिव्य 'वृंत (handle)' की उपमा दी है:
कराग्रेण स्पृष्टं तुहिनगिरिणा वत्सलतया गिरिशेनोदस्तं मुहुरधरपानाकुलतया।
करग्राह्यं शम्भोर्मुखमुकुरवृन्तं गिरिसुते कथंकारं ब्रूमस्तव चिवुकमौपम्यरहितम् ॥
भावार्थ: "हे पर्वतराज की पुत्री! आपकी ठुड्डी उपमा रहित है। इसे आपके पिता हिमवान ने वात्सल्यवश अपने हाथ के अग्रभाग से छुआ है, और आपके पति महादेव (गिरिश) ने चुंबन की आतुरता में बार-बार ऊपर उठाया है। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि आपकी यह ठुड्डी भगवान शिव के हाथ से पकड़ने योग्य आपके 'मुख-रूपी दर्पण' का वृंत (handle) है"।
'मूक पंचशती' के अनुसार, माँ का मुख पूर्ण चंद्र है और उनकी ठुड्डी उस चंद्र का वह आधार है जहाँ से करुणा का अमृत बहता है। मूक कवि कहते हैं कि जो ठुड्डी स्वयं शिव के हाथों द्वारा स्पर्श की जाती है, वह साधक के लिए मोक्ष का द्वार बन जाती है।
'देवी भागवत पुराण' के अनुसार, मणिद्वीप की साम्राज्ञी के विग्रह का प्रत्येक अंग दिव्य मणियों के प्रकाश से निर्मित है। उनकी ठुड्डी इतनी चिकनी और दीप्तिमान है कि वह पद्मराग मणियों की आभा को भी फीका कर देती है।
श्री विद्या साधना में, यह नाम 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर बढ़ने का संकेत है: तंत्र में शिव 'प्रकाश' (बिम्ब) हैं और माँ ललिता 'विमर्श' (दर्पण) हैं। ठुड्डी उस दर्पण का वह आधार है जिसे पकड़कर शिव स्वयं के आनंद का अनुभव करते हैं। यह शिव-शक्ति सामरस्य का प्रतीक है।
माँ का मुख मंडल 'वाग्भव कूट' के अंतर्गत आता है जो ज्ञान की पराकाष्ठा है। ठुड्डी इस कूट का अंतिम बिंदु है, जो वाणी (और विचार के प्रकट होने का आधार बनती है।
'अनाकलित-सादृश्य' शब्द का अर्थ है कि माँ के समान कोई दूसरा है ही नहीं। वे अद्वैत का साक्षात स्वरूप हैं।
'अनाकलित-सादृश्य-चिबुक-श्री-विराजिता' नाम का ध्यान करने से साधक को यह बोध होता है कि परमात्मा का सौंदर्य किसी भी सांसारिक उपमा से परे है। जब हम माँ की इस 'अनुपम ठुड्डी' का चिंतन करते हैं, तो हमारे भीतर का द्वैत भाव समाप्त होने लगता है और हम उस 'अद्वैत' आनंद की ओर बढ़ते हैं जहाँ केवल माँ की सत्ता शेष रहती है।
