प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
श्री ललिता सहस्रनाम में माँ ललिता का वर्णन अत्यंत सूक्ष्म और काव्यमय ढंग से ‘शिखा से नख’ के क्रम में किया गया है। पिछले नाम में वाग्देवियों ने माँ के गुप्त और सुघड़ गुल्फों, अर्थात टखनों, की महिमा कही। अब तैंतालीसवें नाम में वे माँ के चरणों के ऊपरी उठे हुए भाग की दिव्य सुषमा का वर्णन करती हैं जिसे प्रपद कहा जाता है। यह नाम है कूर्मपृष्ठ-जयिष्णु-प्रपदान्विता।
इस नाम का पदच्छेद है कूर्म-पृष्ठ + जयिष्णु + प्रपद + अन्विता। कूर्म-पृष्ठ का अर्थ है कछुए की पीठ या उसका उभरा हुआ कवच; जयिष्णु का अर्थ है जीतने वाली, मात देने वाली या श्रेष्ठ सिद्ध होने वाली; प्रपद चरण का उठा हुआ अग्र/ऊपरी भाग है; और अन्विता का अर्थ है युक्त या सुशोभित। इस प्रकार नाम का सरल अर्थ है “वे देवी जिनके चरणों का उठा हुआ प्रपद अपनी सुंदर गोलाई और सुडौल उभार में कछुए की पीठ की सुंदरता को भी मात देता है।”
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि तुलना कछुए की पीठ की कठोरता से नहीं, बल्कि उसके उठे हुए, गोल और सममित आकार से है। माँ के चरण तो भक्तों के लिए करुणा, शरण और कोमलता के परम आश्रय हैं; इसलिए कूर्म-पृष्ठ की उपमा केवल उनके प्रपद की सुंदर बनावट और दिव्य रेखा को समझाने के लिए है।
सौन्दर्य लहरी के प्रसिद्ध 88वें श्लोक में इसी भाव को बहुत सुंदर काव्यात्मक प्रश्न के रूप में व्यक्त किया गया है—
पदं ते कीर्तीनां प्रपदमपदं देवि विपदां
कथं नीतं सद्भिः कठिनकमठीकर्परतुलाम्।
कथं वा बाहुभ्यामुपयमनकाले पुरभिदा
यदादाय न्यस्तं दृषदि दयमानेन मनसा॥
भावार्थ: हे देवि! आपके चरण तो कीर्ति के निवास हैं और विपत्तियों को दूर करने वाले हैं। फिर सत्पुरुषों ने आपके इस प्रपद की तुलना कठोर कछुए के कवच से कैसे कर दी? और विवाह के समय पुरभिद् भगवान शिव ने अपने कर-कमलों से आपके उस कोमल चरण को कितनी सावधानी और करुणा से उठाकर शिला पर रखा होगा!
इस श्लोक का भाव अत्यंत मधुर है। एक ओर वाग्देवियाँ माँ के चरणों के आकार को कूर्म-पृष्ठ के समान सुडौल कहती हैं, दूसरी ओर सौन्दर्य लहरी उस तुलना को और सूक्ष्म बनाकर कहती है कि माँ के चरण इतने कोमल हैं कि उन्हें कठोर कवच से जोड़ना भी आश्चर्य उत्पन्न करता है। इस प्रकार नाम में रूप-सौंदर्य और श्लोक में चरण कोमलता दोनों भाव एक साथ उजागर होते हैं।
सामुद्रिक लक्षण की दृष्टि से भी चरणों का सुडौल, उन्नत और कोमल होना दिव्य सौंदर्य, मंगल और श्रेष्ठता का संकेत माना गया है। ललिता सहस्रनाम के 41वें, 42वें और 43वें नामों में माँ की जंघा, गुल्फ और प्रपद का जो क्रमिक वर्णन आता है, वह केवल बाह्य सौंदर्य-वर्णन नहीं है; वह यह भी दिखाता है कि माँ का संपूर्ण दिव्य विग्रह मंगल, माधुर्य और तत्त्व-ज्ञान का मूर्त रूप है।
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में कूर्म स्थिरता, धारण-शक्ति और अंतर्मुखता का भी प्रतीक है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं कि जैसे कछुआ अपने अंगों को भीतर समेट लेता है, वैसे ही साधक जब इन्द्रियों को विषयों से लौटा लेता है, तब उसकी प्रज्ञा स्थिर होती है। इस दृष्टि से माँ का कूर्म-पृष्ठ-जयिष्णु प्रपद साधक को यह संकेत देता है कि दिव्य चरणों की शरण में ही मन को स्थैर्य और इन्द्रियों को सही दिशा मिलती है।
श्रीविद्या और तांत्रिक भाव में माँ के चरण केवल सौंदर्य का विषय नहीं हैं; वे आधार, शरण और अनुग्रह के प्रतीक हैं। साधक जब माँ के चरणों का ध्यान करता है, तो वह अपने चंचल मन को एक स्थिर आधार देता है। प्रपद का उठाव मानो यह बताता है कि देवी की कृपा पृथ्वी-तत्त्व तक उतरकर साधक के जीवन में स्थिरता, संतुलन और आध्यात्मिक दिशा प्रदान करती है।
कूर्म अपने कवच में स्थित होकर सुरक्षित रहता है। उसी प्रकार जो साधक माँ के चरणों में आश्रय लेता है, वह बाहरी विक्षेपों से धीरे-धीरे बचने लगता है। उसके भीतर धैर्य आता है, साधना में दृढ़ता आती है और मन में यह विश्वास जागता है कि जगत की अस्थिरता के बीच भी एक दिव्य आधार माँ के चरण है।
कूर्मपृष्ठ-जयिष्णु-प्रपदान्विता नाम का ध्यान हमें माँ के चरणों की अलौकिक सुडौलता के साथ-साथ उनकी कोमल करुणा का भी स्मरण कराता है। यह नाम बताता है कि देवी के चरण सौंदर्य में अनुपम, स्पर्श में करुणामय और साधक के लिए परम आश्रय हैं। जब भक्त उन चरणों का चिंतन करता है, तो अहंकार की कठोरता गलने लगती है, मन भीतर की ओर मुड़ता है और जीवन को वह स्थिर आधार मिलता है जहाँ भक्ति, शांति और आनंद एक हो जाते हैं।
