प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
श्री ललिता सहस्रनाम में माँ के चरणों के ऊपरी भाग, अर्थात प्रपद, की सुंदरता का वर्णन करने के बाद अब वाग्देवियाँ उनके चरणों के अत्यंत उज्ज्वल भाग नखों की महिमा का गान करती हैं। चवालीसवाँ नाम है नख-दीधिति-संछन्न-नमज्जन-तमोगुणा। यह नाम केवल शारीरिक सौंदर्य का वर्णन नहीं करता, बल्कि चरण शरण, भक्ति और अज्ञान-निवारण के गहरे आध्यात्मिक भाव को प्रकट करता है।
इस नाम का पदच्छेद है नख + दीधिति + संछन्न + नमज्जन + तमोगुणा। नख का अर्थ है चरणों के नाखून; दीधिति का अर्थ है तेज, चमक या किरण; संछन्न का अर्थ है ढक देना, आच्छादित कर देना या ओझल कर देना; नमज्जन वे भक्त हैं जो देवी के चरणों में झुकते हैं; और तमोगुण यहाँ अज्ञान, मोह, जड़ता और भीतरी अंधकार का सूचक है। इस प्रकार इस नाम का सरल अर्थ है "वे देवी जिनके चरण-नखों की दिव्य प्रभा उनके चरणों में प्रणाम करने वाले भक्तों के अज्ञान-अंधकार को ढककर दूर कर देती है।"
यहाँ संछन्न शब्द बहुत सुंदर है। सामान्य दीपक अंधकार से लड़ता नहीं; वह केवल प्रकाशित होता है, और अंधकार अपने-आप ओझल हो जाता है। उसी प्रकार माँ के चरण-नखों की दीप्ति भक्त के भीतर ज्ञान का प्रकाश जगाती है, जिससे तमस, मोह और अहंकार की कठोरता स्वतः क्षीण होने लगती है।
सौन्दर्य लहरी के 89वें श्लोक में आदि शंकराचार्य माँ के चरणों और नखों की इसी करुणामयी महिमा को अत्यंत मधुर काव्य-रूप में व्यक्त करते हैं
नखैर्नाकस्त्रीणां करकमलसङ्कोचशशिभिः
तरूणां दिव्यानां हसत इव ते चण्डि चरणौ।
फलानि स्वःस्थेभ्यः किसलयकराग्रेण ददतां
दरिद्रेभ्यो भद्रां श्रियमनिशमह्नाय ददतौ॥
भावार्थ: हे चण्डि! आपके चरणों के नख चन्द्रमा के समान शीतल और उज्ज्वल हैं। उनकी चन्द्र-ज्योति स्वर्ग की देवांगनाओं के कमल-समान हाथों को भी संकुचित कर देने वाली प्रतीत होती है। आपके चरण मानो उन दिव्य कल्पवृक्षों का भी उपहास करते हैं, जो अपने कोमल पल्लव-सदृश अग्रभागों से केवल स्वर्गवासियों को फल देते हैं; क्योंकि आपके चरण तो दरिद्र और शरणागत भक्तों को भी तत्काल मंगलमयी श्री प्रदान करते हैं।
इस श्लोक में “दरिद्र” शब्द का अर्थ केवल धनहीन व्यक्ति नहीं है। आध्यात्मिक दृष्टि से वह जीव भी दरिद्र है जिसके पास आत्मज्ञान, शांति और भगवद्-कृपा का अनुभव नहीं है। माँ के चरण उस दरिद्रता को दूर करते हैं। वे भक्त को केवल बाह्य संपदा ही नहीं, बल्कि विवेक, भक्ति, आंतरिक शांति और मोक्षमार्ग की संपदा भी प्रदान करते हैं।
मूक पंचशती में भी माँ कामाक्षी के चरणों और चरण-नखों की उज्ज्वलता का बार-बार स्तवन मिलता है। वहाँ चरण-नखों की श्वेत प्रभा को कभी चन्द्र-ज्योति, कभी ज्ञान-दीप, और कभी अज्ञान-नाशिनी आभा के रूप में अनुभव किया गया है। इस भाव से देखने पर ललिता सहस्रनाम का यह नाम और भी स्पष्ट हो जाता है। माँ के चरण-नख केवल अलंकार नहीं हैं; वे साधक के मन में ज्ञान का दीप जलाने वाली दिव्य किरणें हैं।
चरणों में झुकना भारतीय भक्ति-परंपरा में केवल बाहरी क्रिया नहीं है। यह अहंकार के विनम्र होने का संकेत है। जब भक्त माँ के चरणों में नमज्जन करता है, तब वह अपने “मैं” को छोटा करता है और देवी की कृपा को स्वीकार करता है। यही समर्पण भीतर के तमस को हटाने की पहली अवस्था है।
तमोगुण का अर्थ केवल अंधकार नहीं है; यह आलस्य, प्रमाद, भ्रम, अविद्या और जड़ता का भी प्रतीक है। जब मन तमस से ढका होता है, तब सत्य सामने होते हुए भी स्पष्ट नहीं दिखता। देवी के चरण-नखों की दीधिति इस तमस को आच्छादित कर देती है। अर्थात अज्ञान का प्रभाव घटने लगता है और साधक के भीतर ज्ञान, श्रद्धा और जागृति का उदय होता है।
श्रीविद्या साधना में माँ के चरणों का ध्यान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि चरण ही साधक के लिए सबसे सरल और सुरक्षित आश्रय हैं। उच्च तांत्रिक तत्त्वों को समझने से पहले साधक को विनय, श्रद्धा और शरणागति में स्थिर होना पड़ता है। माँ के नखों की दिव्य प्रभा इसी शरणागति में प्रकट होने वाले ज्ञान-प्रकाश का प्रतीक है।
दस चरण-नखों का ध्यान भावात्मक रूप से दस दिशाओं में फैलती हुई देवी-कृपा के रूप में भी किया जा सकता है। जिस प्रकार प्रकाश फैलकर सभी ओर अंधकार को ओझल कर देता है, उसी प्रकार माँ के चरण-नखों की प्रभा साधक के जीवन के बाहरी और भीतरी अंधकार को शांत करती है। यह ध्यान मन को शीतल भी करता है और भीतर विवेक की ज्योति भी जगाता है।
त्रिपुरा रहस्य के अद्वैत भाव के अनुसार परम देवी चैतन्य-स्वरूपा हैं। अज्ञान कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं, बल्कि चैतन्य के विस्मरण से उत्पन्न प्रतीत होने वाला अंधकार है। जब साधक देवी की कृपा से अपने भीतर की चेतना को पहचानता है, तब तमस का आवरण हटने लगता है। इस दृष्टि से माँ के नखों की दीप्ति आत्म-जागरण की ओर ले जाने वाली कृपा-किरण है।
नख-दीधिति-संछन्न-नमज्जन-तमोगुणा नाम का ध्यान हमें यह सिखाता है कि देवी के चरणों में झुकना अंधविश्वास नहीं, बल्कि अहंकार से प्रकाश की ओर जाने की साधना है। माँ के चरण-नखों की प्रभा भक्त के भीतर छिपे अज्ञान, आलस्य, मोह और निराशा को ओझल कर देती है। जब साधक उन चरणों का स्मरण करता है, तो उसका मन धीरे-धीरे निर्मल होता है, बुद्धि प्रकाशमान होती है और जीवन में भक्ति, ज्ञान तथा शांति का उदय होता है।
