गुरुवार, 18 जून 2026

35.लक्ष्यरोम-लताधारता-समुन्नेय-मध्यमा - लक्ष्यरोमलताधारतासमुन्नेयमध्यमायै नमः

लक्ष्यरोम-लताधारता-समुन्नेय-मध्यमा - Goddess Lalitha Tripura Sundari

प्रार्थना

शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
      तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
      सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥

लक्ष्यरोम-लताधारता-समुन्नेय-मध्यमा
स्तनभार-दलन्मध्य-पट्टबन्ध-वलित्रया॥१५॥

श्री ललिता सहस्रनाम के चौंतीसवें नाम में माँ के नाभि प्रदेश और वक्षस्थल के सौंदर्य का वर्णन करने के बाद, वाग्देवियाँ उनके शरीर के सबसे सूक्ष्म भाग - कटि (कमर) की ओर बढ़ती हैं। पैंतीसवाँ नाम है  'लक्ष्मरोमलताधारतासमुन्नेयमध्यमा'। यह नाम भगवती के उस अलौकिक सौंदर्य को प्रकट करता है जहाँ स्थूलता समाप्त हो जाती है और केवल सूक्ष्मता शेष रहती है।

यह नाम देवी के 'अदृश्य' कटि प्रदेश का वर्णन करने के लिए अत्यंत दार्शनिक शब्दों का उपयोग करता है। लक्ष्य (जो केवल लक्षणों के आधार पर जाना जा सके) + रोम-लता (रोमराजि रूपी लता (क्रीपर के समान बारीक बालों की रेखा) + आधारता (आधार मानकर) + समुन्नेय (अनुमान लगाया जाने योग्य) + मध्यमा (मध्य भाग या कमर)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिनकी कमर इतनी सूक्ष्म (पतली) है कि उसका अस्तित्व केवल उनके शरीर पर स्थित 'रोमराजि रूपी लता' के आधार पर ही अनुमानित किया जा सकता है"। सरल शब्दों में, माँ की कमर इतनी पतली है कि वह दिखाई नहीं देती; बस वहाँ से गुजरने वाली रोमों की रेखा को देखकर यह अनुमान लगाया जाता है कि यहाँ कमर का स्थान होना चाहिए।

आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के 79वें श्लोक में माँ की इस सूक्ष्म कटि का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया है:
निसर्ग-क्षीणस्य स्तन-तट-भरेण क्लम-जुषो 
    नमन्-मूर्तेर् नारी-तिलक शनकैस् त्रुट्यत इव। 
चिरं ते मध्यस्य त्रुटित-तटिनी-तीर-तरुणा 
    समावस्था-स्थेम्नो भवतु कुशलं शैल-तनये॥

भावार्थ: "हे गिरिजा! आपकी कमर स्वाभाविक रूप से बहुत पतली है। ऊपर से भारी स्तनों के भार के कारण वह झुक गई है और ऐसा लगता है मानो वह टूटने वाली हो। आपकी वह कमर नदी के उस किनारे पर खड़े वृक्ष के समान है जिसका आधार नीचे की मिट्टी बह जाने से कमजोर हो गया हो। वह सदैव कुशल रहे"।

'मूक पंचशती' के 'आर्या शतकम्' में मूक कवि वर्णन करते हैं कि माँ कामाक्षी की कमर 'अस्ति-नास्ति' (है और नहीं है) के बीच का एक संदेह है। यह शून्यता का प्रतीक है।

'देवी भागवत पुराण' और 'ललितोपाख्यान' के अनुसार, माँ का मध्य भाग तीन वलियों (पेट की तीन रेखाओं) से सुशोभित है, जो उनकी कमर को और भी सूक्ष्म बनाती हैं। यह 'वलित्रय' ब्रह्मांड की तीन अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) के नियंत्रण का संकेत है।

श्री विद्या साधना और तन्त्र के अनुसार, यह नाम भौतिक सौंदर्य से कहीं अधिक गहरा संदेश देता है। माँ के इस स्वरूप को 'मध्यमा' कहा गया है, जो वाणी के चार स्तरों (परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी) में से एक है। यह वह मानसिक स्तर है जहाँ विचार शब्दों का रूप लेना शुरू करते हैं।

तंत्र में सूक्ष्म कमर 'शून्यता' का प्रतीक है, जिससे यह सिद्ध होता है कि शक्ति निराकार ब्रह्म से उत्पन्न होकर आकार लेती है। 'समुन्नेय' शब्द संकेत देता है कि जिस प्रकार कार्य को देखकर कारण का अनुमान लगाया जाता है, उसी प्रकार इस दृश्य जगत को देखकर अदृश्य शक्ति (माँ ललिता) का बोध होता है।

कमर वह केंद्र है जो शरीर के ऊपरी भाग (ज्ञान/हृदय) और निचले भाग (आधार/इच्छा) को जोड़ता है। माँ का सूक्ष्म कटि प्रदेश यह दर्शाता है कि वे इन दोनों के बीच पूर्ण संतुलन बनाए रखती हैं।

'लक्ष्मरोमलताधारतासमुन्नेयमध्यमा' नाम का ध्यान करने से साधक के भीतर सूक्ष्म दृष्टि का विकास होता है। यह नाम हमें सिखाता है कि सत्य अक्सर हमारी आँखों से ओझल होता है और उसे केवल सूक्ष्म लक्षणों के माध्यम से 'अनुमान' और 'अनुभव' किया जा सकता है। जब हम माँ की इस अति-सूक्ष्म कटि का चिंतन करते हैं, तो हमारे स्थूल अहंकार का क्षय होता है और हम आध्यात्मिक शून्यता की ओर बढ़ते हैं, जहाँ केवल परम चेतना शेष रहती है।

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...