बुधवार, 17 जून 2026

34.नाभ्यालवाल-रोमालि-लता-फल-कुचद्वयी - नाभ्यालवालरोमालिलताफलकुचद्वय्यै नमः

नाभ्यालवालरोमालिलताफलकुचद्वयी - Goddess Lalitha Tripura Sundari

प्रार्थना

शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
      तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
      सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥

कामेश्वर-प्रेमरत्न-मणि-प्रतिपण-स्तनी।
नाभ्यालवाल-रोमालि-लता-फल-कुचद्वयी॥१४॥

श्री ललिता सहस्रनाम के तैंतीसवें नाम में माँ के वक्षस्थल और कामेश्वर के प्रेम के विनिमय का वर्णन करने के बाद, वाग्देवियाँ अब उस शारीरिक और आध्यात्मिक संरचना का वर्णन करती हैं जो माँ के नाभि प्रदेश से हृदय तक व्याप्त है। चौंतीसवाँ नाम है  'नाभ्यालवाल-रोमालि-लता-फल-कुचद्वयी'। यह नाम भगवती के सौन्दर्य को एक 'दिव्य पौधा/लता' के रूप में चित्रित करता है, जहाँ उनकी नाभि आधार है और उनके स्तन फल के समान हैं।

यह नाम माँ के मध्य-भाग के सौन्दर्य को एक सुंदर रूपक के माध्यम से स्पष्ट करता है: नाभि (नाभि) + आलवाल (वृक्ष की जड़ के चारों ओर बना पानी का थाला या क्यारी) + रोमालि (पेट पर नाभि से ऊपर की ओर जाने वाली सूक्ष्म रोमों / बालों की रेखा + लता (बेल या लता) + फल (फल) + कुच-द्वयी (स्तनों की जोड़ी)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिनकी नाभि रूपी क्यारी से रोमों की जो सूक्ष्म रेखा ऊपर की ओर जा रही है, वह एक 'लता' के समान है, और उनके दोनों स्तन उस लता पर लगे हुए दो सुंदर 'फलों' के समान प्रतीत होते हैं"।

आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के 78वें श्लोक में इस नाम के भाव को अत्यंत सूक्ष्मता से उकेरा है:
स्थिरो गङ्गावर्तः स्तन-मुकुल-रोमावलि-लता 
    कलाव्यालं कुण्डं कुसुम-शर-तेजो-हुत-भुजः। 
रतेर्लीलागारं किमपि तव नाभिर्गिरिसुते 
    बिल-द्वारं सिद्धेर्गिरिश-नयनानां विजयते ॥

भावार्थ: "हे पर्वतपुत्री! आपकी नाभि क्या है? क्या यह गंगा का कोई स्थिर भंवर है? या यह उस रोमराजि रूपी लता की क्यारी है जिस पर स्तन रूपी कलियाँ खिली हैं? या यह कामदेव की अग्नि का कुण्ड है?"। यह श्लोक प्रमाणित करता है कि माँ की नाभि समस्त सृष्टि की ऊर्जा और आकर्षण का केंद्र है।

'ललितोपाख्यान' (ब्रह्माण्ड पुराण) के अनुसार, जब माँ ललिता प्रकट हुईं, तो उनके विग्रह से ही ब्रह्मांड की रचना हुई। पुराणों में उल्लेख है कि माँ के वक्षस्थल से ही पर्वतों का निर्माण हुआ है। उनकी नाभि को 'ब्रह्मांड का केंद्र' माना गया है, जहाँ से जीवन की धारा प्रवाहित होती है। 'ब्रह्माण्ड पुराण' में उन्हें 'विश्वमाता' कहा गया है, जो अपने स्तनों से ज्ञान और भक्ति का पोषण प्रदान करती हैं।

'देवी भागवत पुराण' के मणिद्वीप वर्णन में भगवती की नाभि को 'भागीरथी (गंगा) के भंवर' के समान सुंदर बताया गया है। 

'मूक पंचशती' के अनुसार, माँ के शरीर पर स्थित वह सूक्ष्म रोमराजि वास्तव में साधक की 'चित्त-वृत्ति' है, जो नाभि (संसार) से ऊपर उठकर माँ के हृदय (परम तत्व) की ओर जा रही है।

श्री विद्या साधना में, यह नाम ऊर्जा के 'ऊर्ध्वगमन' का प्रतीक है। नाभि 'मणिपूर चक्र' का स्थान है। यहाँ से रोमराजि रूपी लता का ऊपर जाना यह संकेत देता है कि कुण्डलिनी शक्ति अपनी यात्रा शुरू कर हृदय (अनाहत चक्र) तक पहुँच रही है। स्तन 'मातृ-भाव' के प्रतीक हैं। तन्त्र में माना जाता है कि माँ ललिता अपने भक्तों को 'ज्ञान-अमृत' से पोषित करती हैं। नाभि 'इच्छा' का, रोमराजि 'क्रिया' का और वक्षस्थल (हृदय) 'ज्ञान' का केंद्र माना जाता है। यह नाम इन तीनों शक्तियों के संतुलन को दर्शाता है।

'नाभ्यालवाल-रोमालि-लता-फल-कुचद्वयी' नाम का ध्यान करने से साधक के भीतर की सृजनात्मक ऊर्जा जागृत होती है। यह नाम हमें सिखाता है कि जिस प्रकार एक लता अपनी जड़ (नाभि) से जुड़कर ही फल (पूर्णता) देती है, वैसे ही साधक को अपनी मूल शक्ति से जुड़कर ही 'ब्रह्म-ज्ञान' रूपी फल की प्राप्ति होती है। माँ का यह स्वरूप वात्सल्य और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के प्रवाह का साक्षात दर्शन है।

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...