प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
श्री ललिता सहस्रनाम के अट्ठारहवें नाम में माँ के चंचल और करुणामयी नेत्रों का वर्णन करने के बाद, अब स्तोत्र उनके मुख-सौंदर्य के एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग 'नासिका' (नाक) की ओर बढ़ता है। उन्नीसवाँ नाम है 'नवा-चम्पक-पुष्पाभ-नासा-दण्ड-विराजिता'।
यह नाम भगवती की नासिका की तुलना एक ताज़ा खिले हुए चम्पक पुष्प की कली से करता है। आइए इस नाम के सौंदर्य, पौराणिक संदर्भ और तांत्रिक रहस्यों को समझते हैं:
नव (नवीन या ताज़ा) + चम्पक-पुष्प (चम्पा का फूल, जो अपनी सुगन्ध और सुनहरे-पीले वर्ण के लिए प्रसिद्ध है) + आभ (के समान चमक वाली) + नासा-दण्ड (नासिका का बाँस या डण्डी) + विराजिता (सुशोभित)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिनकी नासिका का उन्नत भाग ताज़ा खिले हुए चम्पक पुष्प की कली के समान सुंदर और देदीप्यमान है"।
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| नव चम्पक-पुष्प |
आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के श्लोक 61 में माँ की नासिका का अद्भुत वर्णन किया है:
असौ नासावंशस्तुहिनगिरिवंशध्वजपटि त्वदीयो नेदीयः फलतु फलमस्माकमुचितम्।
वहत्यन्तर्मुक्ताः शिशिरकरनिश्वसविगलितं समृद्ध्या यत्तासां बहिरपि च मुक्तामणिरुचिः॥
भावार्थ: "हे हिमालय के वंश की ध्वजा रूपी माता! आपकी यह नासिका रूपी बाँस हमें वांछित फल प्रदान करे। आपकी नासिका के भीतर जो मोती (मुक्ता) है, वह आपके शीतल श्वासों के कारण बाहर भी अपनी चमक बिखेर रहा है"। यहाँ 'बाँस' शब्द का प्रयोग इसलिए किया गया है क्योंकि श्रेष्ठ बाँस के भीतर से ही 'ग़ज-मुक्ता' (मोती) की उत्पत्ति मानी जाती है।
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| ग़ज-मुक्ता |
'देवी भागवत पुराण' के अनुसार, माँ की नासिका इतनी सुंदर है कि वह ताज़ा चम्पक पुष्पों की शोभा को चुनौती देती है। पुराणों में उल्लेख है कि उनकी नासिका पर सुशोभित नासाभरण 'शुक्र ग्रह' या 'ध्रुव तारे' के समान चमकता है, जो साधक को सही दिशा दिखाने वाला प्रकाश पुंज है।
'मूक पंचशती' में मूक कवि भगवती के मुखमंडल के वर्णन में उनकी नासिका को 'प्राण' का आधार मानते हैं। जिस प्रकार नासिका श्वास का केंद्र है, उसी प्रकार माँ ललिता संपूर्ण ब्रह्मांड की 'मुख्य प्राण-शक्ति' हैं।
श्री विद्या साधना में, यह नाम केवल शारीरिक सुंदरता तक सीमित नहीं है। नासिका वह मार्ग है जिससे 'प्राण' शरीर में प्रवेश करता है। तंत्र में, नासिका का अग्रभाग एकाग्रता का मुख्य बिंदु है। नासिका के दो छिद्र इड़ा (चन्द्र) और पिङ्गला (सूर्य) नाड़ियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। माँ की 'नासा-दण्ड' (नासिका की डण्डी) इन दोनों के बीच संतुलन का प्रतीक है, जो सुषुम्ना नाड़ी के जागरण की ओर संकेत करती है।
माँ जो मोती या रत्न अपनी नाक में पहनती हैं, उसे तंत्र में 'विशुद्ध बुद्धि' का प्रतीक माना गया है। यह रत्न उनकी करुणा की शीतल वायु (श्वास) से निरंतर चमकता रहता है।
'नवा-चम्पक-पुष्पाभ-नासा-दण्ड-विराजिता' नाम का ध्यान करने से साधक के भीतर सात्विक ऊर्जा का संचार होता है। यह नाम हमें सिखाता है कि जिस प्रकार एक सुंदर पुष्प अपनी सुगंध से वातावरण को शुद्ध कर देता है, उसी प्रकार माँ की प्राण-रूपी कृपा हमारे जीवन के हर विकार को दूर कर हमें आध्यात्मिक पूर्णता प्रदान करती है।

