प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
श्री ललिता सहस्रनाम के उन्नीसवें नाम में माँ की चम्पक कली के समान सुंदर नासिका का वर्णन करने के बाद, वाग्देवियाँ अब उस नासिका पर सुशोभित दिव्य आभूषण का गुणगान करती हैं। बीसवाँ नाम है 'ताराकान्ति-तिरस्कारि-नासाभरण-भासुरा'। यह नाम भगवती के मुख-मंडल की उस दीप्ति का वर्णन करता है जिसके सामने आकाश के सितारे भी फीके पड़ जाते हैं।
तारा-कान्ति (नक्षत्रों या तारों की चमक) + तिरस्कारि (तिरस्कृत करने वाली या फीका कर देने वाली) + नासाभरण (नासिका का आभूषण) + भासुरा (अत्यंत देदीप्यमान या चमकने वाली)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिनका नासिका आभूषण (नथ या लौंग) इतना चमकदार है कि वह अपनी कान्ति से नक्षत्रों (तारों) के प्रकाश को भी मात दे देता है"।
तन्त्र शास्त्र में माना जाता है कि माँ की नासिका से निकलने वाली वायु (प्राण) इतनी पवित्र है कि वह साधारण आभूषण को भी अलौकिक तेज प्रदान करती है।
'देवी भागवत पुराण' के अनुसार, भगवती के मुख की आभा करोड़ों सूर्यों और चंद्रमाओं के समान है। पुराणों में उनके 'नासाभरण' का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि वह शुक्र ग्रह के समान तेजस्वी है, जो अज्ञान के अंधकार में भटकते साधकों के लिए 'ध्रुव तारे' के समान मार्गदर्शक है।
'मूक पंचशती' के अनुसार, माँ के मुख का प्रत्येक आभूषण उनके भीतर बहने वाले 'करुणा रस' का प्रतिबिम्ब है। उनका नासा-भूषण केवल सौंदर्य का प्रतीक नहीं, बल्कि उस 'बिंदु' का प्रतीक है जहाँ साधक की दृष्टि स्थिर होती है।
श्री विद्या साधना में, यह नाम साधक के 'ऊर्ध्वगमन' से जुड़ा है: प्रकाश का केंद्र: श्री चक्र के विन्यास में माँ की नासिका का आभूषण वह ज्योति पुंज है जो 'आज्ञा चक्र' और 'सहस्रार' के बीच की यात्रा को प्रकाशित करता है। प्राण और बुद्धि: नासिका श्वसन (प्राण) का केंद्र है और इसमें सुशोभित रत्न 'विशुद्ध बुद्धि' का प्रतीक है। जिस प्रकार तारा आकाश में स्थिर रहकर दिशा दिखाता है, माँ का यह आभूषण साधक के चित्त को स्थिर कर उसे परम तत्व की ओर ले जाता है।
ललितोपाख्यान के अनुसार माँ के नासिका के पास के आभूषणों से ही ग्रहों और नक्षत्रों की उत्पत्ति हुई है। अतः यह नाम उनके ब्रह्मांडीय नियंत्रण को भी दर्शाता है।
'ताराकान्ति-तिरस्कारि-नासाभरण-भासुरा' नाम का ध्यान करने से साधक के जीवन में स्पष्टता और दैवीय मार्गदर्शन का उदय होता है। यह नाम हमें यह सिखाता है कि जब हम माँ की इस अलौकिक कान्ति का चिंतन करते हैं, तो संसार के भौतिक आकर्षण (जो तारों की तरह क्षणभंगुर हैं) स्वतः ही अपना महत्व खो देते हैं और हम उस शाश्वत ज्योति में लीन हो जाते हैं।
