प्रार्थना
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
श्री ललिता सहस्रनाम के इकतीसवें नाम में माँ की कोमल और स्वर्ण-जड़ित भुजाओं का वर्णन करने के बाद, अब वाग्देवियाँ उनके हृदय के निकट सुशोभित दिव्य आभूषणों की ओर ध्यान केंद्रित करती हैं। बत्तीसवाँ नाम है— 'रत्नग्रैवेय-चिन्ताक-लोल-मुक्ताफलान्विता'। यह नाम माँ ललिता के उस ऐश्वर्य का वर्णन करता है जो उनके 'विशुद्धि' और 'अनाहत' चक्र के मध्य स्थित है।
रत्न-ग्रैवेय (रत्नों से जड़ा हुआ गले का हार) + चिन्ताक (एक विशेष प्रकार का पदक जो गले के हार के बीच में होता है। श्री विद्या में इसे 'चिन्तामणि' का प्रतीक भी माना जाता है) + लोल (चंचल, हिलता हुआ या झूलता हुआ) + मुक्ताफल (मोती) + अन्विता (युक्त या सुशोभित)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जो रत्नों से जड़े हुए गले के हारों और उनमें झूलते हुए मोतियों वाले विशेष पदक (चिन्ताक) से सुशोभित हैं"।
आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के 74वें श्लोक में माँ के इन मोतियों के हार का अद्भुत वर्णन किया है:
वमस्तन्यं मन्ये धरणिधर-कन्ये हृदयतः
पयःपारावारः परिवहति सारस्वतमिव।
दयावत्या दत्तं द्रविड-शिशु-रास्वाद्य तव
यत् कवीनां प्रौढानामजनि कमनीयः कवयिता ॥
संदर्भ: यद्यपि यहाँ स्तन्य का वर्णन है, परन्तु माँ के हृदय पर सुशोभित मोतियों को 'गजासुर' के मस्तक से निकले हुए शुद्ध 'गज-मुक्ता' के रूप में देखा जाता है, जो उनके हृदय की करुणा की धवलता को दर्शाते हैं। इसके अतिरिक्त, माँ के हारों को 'हार-लतिका' कहा गया है, जो उनके कंठ की सुंदरता को द्विगुणित कर देते हैं।
'देवी भागवत पुराण' के मणिद्वीप वर्णन के अनुसार, भगवती के गले में ऐसे हार सुशोभित हैं जो स्वयं 'शुक्र ग्रह' की भांति चमकते हैं। उनके हृदय पर स्थित 'चिन्ताक' पदक वास्तव में चिन्तामणि रत्न है, जो भक्त की हर सूक्ष्म से सूक्ष्म चिंता को दूर कर उसे परमानंद प्रदान करता है। पुराणों में उल्लेख है कि माँ के ये आभूषण केवल सजावट नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय शक्तियों के केंद्र हैं।
'मूक पंचशती' में मूक कवि कहते हैं कि माँ के गले के मोतियों की माला साधक के अज्ञान रूपी अंधकार को वैसे ही हर लेती है जैसे चंद्रमा की चांदनी रात्रि के भय को समाप्त कर देती है।
श्री विद्या साधना में, यह नाम साधक के 'अनाहत चक्र' (हृदय) से गहराई से जुड़ा है। तंत्र में 'चिन्ताक' को चिन्तामणि गृह का सूक्ष्म रूप माना जाता है। यह पदक माँ के हृदय पर स्थित है, जिसका अर्थ है कि माँ अपने भक्तों की समस्त चिंताओं को अपने हृदय में धारण कर उन्हें शुभ संकल्पों में बदल देती हैं।
'लोल' शब्द माँ की सक्रिय करुणा को दर्शाता है। जिस प्रकार मोती का पदक निरंतर स्पंदित होता है, उसी प्रकार माँ की शक्ति सृष्टि के कण-कण में स्पंदन के रूप में व्याप्त है।
मोती (मुक्ताफल) को शुद्ध सात्विक बुद्धि का प्रतीक माना गया है। माँ का मोतियों से लदा होना यह दर्शाता है कि वे अपने भक्तों को 'विशुद्ध ज्ञान' प्रदान करती हैं।
'रत्नग्रैवेय-चिन्ताक-लोल-मुक्ताफलान्विता' नाम का ध्यान करने से हृदय में भक्ति और शांति का संचार होता है। यह नाम हमें सिखाता है कि वास्तविक सुंदरता हृदय की पवित्रता और ईश्वर के प्रति समर्पण में है। जब हम माँ के इस रत्न-जड़ित स्वरूप का स्मरण करते हैं, तो हमारे जीवन के मानसिक द्वंद्व समाप्त हो जाते हैं और हम उस 'चिन्तामणि' रूपी ईश्वर की प्राप्ति की ओर अग्रसर होते हैं जो समस्त दुखों का अंत है।

