मंगलवार, 16 जून 2026

33.कामेश्वर-प्रेमरत्न-मणि-प्रतिपण-स्तनी - कामेश्वरप्रेमरत्नमणिप्रतिपणस्तन्यै नमः

कामेश्वरप्रेमरत्नमणिप्रतिपणस्तनी - Goddess Lalitha Tripura Sundari

प्रार्थना

शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
      तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
      सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥

कामेश्वर-प्रेमरत्न-मणि-प्रतिपण-स्तनी
नाभ्यालवाल-रोमालि-लता-फल-कुचद्वयी॥१४॥

श्री ललिता सहस्रनाम के बत्तीसवें नाम में माँ के हृदय पर सुशोभित 'चिन्तामणि' और 'गज-मुक्ता' के हारों का वर्णन करने के बाद, वाग्देवियाँ अब उस आध्यात्मिक रहस्य की ओर बढ़ती हैं जो माँ के विग्रह और भगवान कामेश्वर के बीच के 'अनन्य प्रेम' को दर्शाता है। तैंतीसवाँ नाम है 'कामेश्वर-प्रेम-रत्न-मणि-प्रतिपण-स्तनी'। यह नाम सौंदर्य वर्णन की पराकाष्ठा है, जहाँ माँ की शारीरिक शोभा सीधे उनके और शिव के अटूट प्रेम-सम्बन्ध (अद्वैत) से जुड़ जाती है।

इस नाम का अर्थ अत्यंत गूढ़ और दार्शनिक है। कामेश्वर (परम शिव, जो इच्छाओं के स्वामी हैं) + प्रेम (निस्वार्थ और दिव्य अनुराग) + रत्न-मणि (बहुमूल्य रत्न या माणिक्य) + प्रतिपण (विनिमय, बदले में दी गई वस्तु) + स्तनी (उन्नत वक्षस्थल या हृदय प्रदेश)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिन्होंने भगवान कामेश्वर के 'प्रेम-रूपी रत्न' को प्राप्त करने के लिए अपने वक्षस्थल (सौंदर्य) को अर्पण (विनिमय) कर दिया है"। इसका दार्शनिक अर्थ यह है कि माँ ने अपनी पूर्ण सत्ता शिव के प्रेम में समर्पित कर दी है और बदले में शिव का अनन्य प्रेम प्राप्त किया है।

आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' के 73वें श्लोक में माँ के इस स्वरूप का वर्णन किया है:
अमू ते वक्षोजौ अमृत-रस-माणिक्य-कुतपौ 
    न सन्देह-स्पन्दो कनक-कलशौ दत्तमणयौ।

भावार्थ: "हे माता! आपके ये वक्षस्थल अमृत रूपी रस से भरे हुए माणिक्य के पात्रों के समान हैं। ये स्वर्ण कलशों की भांति हैं जिनमें (शिव के प्रेम की) मणियाँ जड़ी हुई हैं।" यह श्लोक स्पष्ट करता है कि माँ का सौंदर्य केवल आकर्षण नहीं, बल्कि 'अमृत' (मोक्ष) और 'प्रेम' का स्रोत है।

'देवी भागवत पुराण' के अनुसार, मणिद्वीप के केंद्र में भगवती 'चिन्तामणि गृह' में विराजमान हैं। वहाँ वे भगवान कामेश्वर के वामांग (बाईं गोद) में बैठी हैं। पुराणों में उल्लेख है कि माँ का यह स्वरूप इतना तेजस्वी है कि उनके वक्षस्थल की आभा करोड़ों सूर्यों को फीका कर देती है। यहाँ माँ को 'सर्व-सौभाग्य-दायिनी' कहा गया है, क्योंकि शिव और शक्ति का यह मिलन ही सृष्टि के आनंद का मूल आधार है।

'मूक पंचशती' के अनुसार, माँ कामाक्षी का प्रत्येक अंग साधक को यह सिखाता है कि 'समर्पण' ही ईश्वर को प्राप्त करने का एकमात्र मार्ग है।

श्री विद्या साधना में, यह नाम 'अनहद नाद' और 'अनाहत चक्र' (हृदय केंद्र) की उच्च अवस्था को दर्शाता है। तंत्र में इसका अर्थ है "अहंकार का त्याग कर प्रेम की प्राप्ति। साधक जब अपना 'स्व' माँ को समर्पित करता है, तभी उसे माँ का 'प्रेम-रत्न' प्राप्त होता है"।

शिव 'प्रकाशा' हैं और शक्ति 'विमर्शा' हैं। यह नाम इन दोनों के 'सामरस्य' को दर्शाता है, जहाँ दोनों एक-दूसरे में पूर्णतः विलीन हैं। यह नाम माँ की ममता को भी दर्शाता है। उनके स्तन 'ज्ञान' और 'भक्ति' के दूध से भरे हुए हैं, जो कार्तिकेय और गणेश (ज्ञान और क्रिया) को पोषण देते हैं।

'कामेश्वर-प्रेम-रत्न-मणि-प्रतिपण-स्तनी' नाम का ध्यान करने से साधक के भीतर 'द्वैत' का भाव समाप्त होता है। यह नाम हमें सिखाता है कि प्रेम का अर्थ केवल पाना नहीं, बल्कि स्वयं को समर्पित करना है। जब हम माँ के इस स्वरूप का चिन्तन करते हैं, तो हमारा हृदय शिव-शक्ति के उस महा-मिलन का केंद्र बन जाता है, जहाँ केवल परमानंद शेष रहता है।

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...