सोमवार, 20 जुलाई 2026

67.अश्वारूढाधिष्ठिताश्व-कोटि-कोटिभिरावृता - अश्वारूढाधिष्ठिताश्वकोटिकोटिभिरावृतायै नमः

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

सम्पत्करी-समारूढ-सिन्धुर-व्रज-सेविता ।
अश्वारूढाधिष्ठिताश्व-कोटि-कोटिभिरावृता ॥२५॥

श्रीललितासहस्रनाम के युद्धवर्णन में भगवती श्रीललिताम्बिका की दिव्य शक्तिसेना का क्रमशः परिचय कराया गया है। पिछले नाम “सम्पत्करी-समारूढ-सिन्धुर-व्रज-सेविता” में सम्पत्करी द्वारा संचालित गजसेना का वर्णन है। प्रस्तुत नाम में अश्वारूढा के अधीन स्थित विशाल अश्वसेना का उल्लेख किया गया है। इस प्रकार दोनों नाम भगवती की सेना के गजबल और अश्वबलरूपी दो महत्त्वपूर्ण विभागों को प्रकट करते हैं।

नाम का प्रथम और प्रधान अर्थ युद्धभूमि से सम्बन्धित है। श्रीललिताम्बिका को अश्वारूढा देवी द्वारा अधिष्ठित कोटि-कोटि अश्वों ने चारों ओर से घेर रखा है। यहाँ अश्वारूढा भगवती की अश्वसेना की अधिष्ठात्री शक्ति हैं और समस्त सेना श्रीललिताम्बिका की आज्ञा, संरक्षण तथा सार्वभौम अधिपत्य में प्रवृत्त होती है।

पदच्छेद और प्रत्यक्ष अर्थ

अश्वारूढा-अधिष्ठित-अश्व-कोटि-कोटिभिः-आवृता
अश्वारूढा द्वारा अधिष्ठित कोटि-कोटि अश्वों से परिवृता।

अश्वारूढा उस देवी का नाम है जो भगवती की अश्वसेना का सञ्चालन करती हैं। अधिष्ठित का अर्थ है अधीन रखे गए, संचालित अथवा नेतृत्व किए गए। अश्व-कोटि-कोटिभिः का अर्थ है कोटियों की भी कोटियों के समान असंख्य अश्वों द्वारा। आवृता का अर्थ है चारों ओर से घिरी हुई अथवा परिवृता।

अतः नाम का सीधा अर्थ है, “जो अश्वारूढा देवी द्वारा अधिष्ठित कोटि-कोटि अश्वों से चारों ओर परिवृता हैं।” यहाँ आवृता पद श्रीललिताम्बिका के लिए आया है। इसका अर्थ यह नहीं कि श्रीललिताम्बिका स्वयं असंख्य अश्वों पर आरूढ़ हैं, अपितु वे अश्वारूढा के नेतृत्व में स्थित विशाल अश्वसेना से सेवित और परिवृता हैं।

भास्कररायीय अर्थ

भास्करराय के सौभाग्यभास्कर में इस नाम का अर्थ मूलतः उसके प्रत्यक्ष सैन्य-वर्णन के अनुसार किया गया है। अश्वारूढा नामक शक्ति द्वारा अधिष्ठित अश्वों की कोटियों की भी कोटियाँ श्रीदेवी को चारों ओर से घेरे हुए हैं। अधिष्ठित पद से अश्वारूढा का नेतृत्व तथा अश्वसेना पर उनका नियामक अधिकार प्रकट होता है।

इस अर्थ में श्रीललिताम्बिका परम अधीश्वरी हैं, अश्वारूढा उनकी आज्ञाकारिणी शक्तिरूप सेनानायिका हैं और असंख्य अश्व भगवती के अभियान में नियोजित दिव्य सैन्यबल हैं। अतः नाम का केन्द्र अश्वारूढा की स्वतन्त्र प्रधानता नहीं, अपितु श्रीललिताम्बिका का वह सार्वभौम ऐश्वर्य है जिसके अन्तर्गत असंख्य शक्तियाँ सुव्यवस्थित रूप से कार्य करती हैं।

अश्वारूढा देवी का शास्त्रीय सन्दर्भ

श्रीललिताम्बिका की अश्वसेना की अधिष्ठात्री अश्वारूढा देवी
अश्वसेना की अधिष्ठात्री अश्वारूढा देवी

ललितोपाख्यान के युद्धप्रसंग में अश्वारूढा देवी श्रीललिताम्बिका की अश्वसेना की प्रमुख शक्ति के रूप में प्रकट होती हैं। वे अपराजिता नामक अश्व पर आरूढ़ होकर देवी की विशाल वाहिनी का नेतृत्व करती हैं। आगे के युद्धवर्णन में उनका कुरुण्ड नामक असुर के साथ संग्राम भी आता है। प्रस्तुत सहस्रनाम में उस विस्तृत आख्यान का संक्षिप्त संकेत मात्र है।

अश्वारूढा का परिचय देते समय यह स्मरण रखना आवश्यक है कि सहस्रनाम का यह पद उनके सम्पूर्ण ध्यान, आयुधों या मन्त्रविधान का निरूपण नहीं करता। वह केवल इतना प्रत्यक्षतः कहता है कि उनके द्वारा अधिष्ठित असंख्य अश्व श्रीललिताम्बिका को परिवृत किए हुए हैं। अतः उनके स्वरूप से सम्बन्धित विस्तृत विवरणों को पृथक् उपासना-ग्रन्थों और परम्परागत विधान के आधार पर ही ग्रहण करना चाहिए।

ललितोपाख्यान की युद्धभूमि में इस नाम का स्थान

भण्डासुर-वध के लिए प्रवृत्त भगवती की सेना केवल संख्या में विशाल नहीं है। वह अनेक शक्तियों, वाहनों और सैन्यविभागों से सुव्यवस्थित है। सम्पत्करी गजसेना का नेतृत्व करती हैं और अश्वारूढा अश्वसेना का। इसके पश्चात् सहस्रनाम में श्रीचक्रराजरथ, मन्त्रिणी का गेयचक्ररथ तथा दण्डनाथा का किरिचक्ररथ वर्णित होते हैं। इस क्रम से भगवती की दिव्य सेना का संगठन और उनका सर्वशक्तिमय राजराजेश्वरीत्व प्रकट होता है।

कोटि-कोटि अश्वों का उल्लेख केवल संख्यात्मक विपुलता का संकेत नहीं देता, अपितु भगवती के अपरिमेय ऐश्वर्य को भी व्यक्त करता है। उनकी एक अधीनस्थ शक्ति के नियन्त्रण में भी साधारण गणना से परे वाहिनी स्थित है। ऐसी समस्त वाहिनियों की परम अधीश्वरी स्वयं श्रीललिताम्बिका हैं।

श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत

प्रस्तुत नाम का मूल अर्थ ऐतिहासिक-पौराणिक युद्धवर्णन ही है। तथापि उपासना-दृष्टि से अश्व की तीव्र गति साधक के भीतर कार्यरत अनेक गतिशील प्रवृत्तियों का स्मरण करा सकती है। मन, इन्द्रियाँ, प्राण तथा संकल्प अनेक दिशाओं में अत्यन्त वेग से प्रवृत्त होते हैं। नियामक अधिष्ठान के अभाव में यही गति विक्षेप का कारण बनती है, किन्तु भगवती की आज्ञा में स्थित होकर वही गति साधना की सहायिका बन सकती है।

इस उपासना-दृष्टि में अश्वारूढा उस दैवी नियामक शक्ति का संकेत देती हैं जो वेग का नाश नहीं करती, अपितु उसे उचित दिशा प्रदान करती है। साधना का प्रयोजन इन्द्रियों को हिंसापूर्वक दबाना नहीं, बल्कि उन्हें धर्म, उपासना और आत्मपरिष्कार के अनुकूल संयमित करना है। जिस प्रकार असंख्य अश्व एक अधिष्ठात्री शक्ति की व्यवस्था में भगवती की सेवा करते हैं, उसी प्रकार साधक की विविध अन्तःकरण-वृत्तियाँ भी श्रीचरणों में समर्पित होकर एकाग्र दिशा प्राप्त कर सकती हैं।

यह प्रतीकात्मक विवेचन नाम के प्रत्यक्ष अर्थ का स्थान नहीं लेता। इसे केवल साधनात्मक चिन्तन के रूप में ग्रहण करना उचित है। शास्त्रीय आख्यान में अश्व वास्तविक दिव्य सेना के अश्व हैं और अश्वारूढा उस सेना की अधिष्ठात्री देवी हैं।

साधक के लिए संदेश

मनुष्य के भीतर अनेक इच्छाएँ, स्मृतियाँ, इन्द्रियवृत्तियाँ और संकल्प निरन्तर गतिशील रहते हैं। केवल वेग का होना दोष नहीं है। प्रश्न यह है कि वह वेग किसके अधीन है और किस दिशा में प्रवृत्त हो रहा है। भगवती की शरणागति साधक को अपनी चित्तवृत्तियों को पहचानने, संयमित करने और उन्हें साधना के अनुकूल नियोजित करने की प्रेरणा देती है।

इस नाम के जप में साधक श्रीललिताम्बिका से प्रार्थना करता है कि उसकी चञ्चल वृत्तियाँ भगवती के अनुशासन में स्थित हों, उसका संकल्प धर्ममय बने और उसके प्राण, इन्द्रियाँ तथा कर्म श्रीचरणों की सेवा में समन्वित हों। ऐसी प्रार्थना में दमन की कठोरता नहीं, अपितु मातृशक्ति के प्रति श्रद्धा, समर्पण और सुव्यवस्था का भाव है।

भाव-सार
अश्वारूढाधिष्ठिताश्व-कोटि-कोटिभिरावृता नाम श्रीललिताम्बिका के अपरिमेय सैन्यवैभव का वर्णन करता है। अश्वारूढा देवी के नेतृत्व में कोटि-कोटि अश्व उनकी सेवा में उपस्थित हैं। उपासना-दृष्टि से यह नाम स्मरण कराता है कि जीवन की समस्त गतिशील शक्तियाँ भगवती के अधीन होकर सुव्यवस्थित, शुद्ध और साधनोपयोगी बनें। साधक विनयपूर्वक प्रार्थना करता है, “हे राजराजेश्वरि, मेरे मन, प्राण, इन्द्रियों और कर्मों को अपने दिव्य शासन में रखकर उन्हें अपने श्रीचरणों की ओर प्रवृत्त कीजिए।”

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...