रविवार, 19 जुलाई 2026

66.सम्पत्करी-समारूढ-सिन्धुर-व्रज-सेविता - सम्पत्करीसमारूढसिन्दुरव्रजसेवितायै नमः

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

सम्पत्करी-समारूढ-सिन्धुर-व्रज-सेविता ।
अश्वारूढाधिष्ठिताश्व-कोटि-कोटिभिरावृता ॥२५॥

श्रीललितासहस्रनाम के इस भाग में श्रीललिताम्बिका की दिव्य शक्तिसेना का क्रमशः वर्णन किया गया है। पूर्वनाम भण्डासुर-वधोद्युक्त-शक्तिसेना-समन्विता में भगवती को भण्डासुर-वध के लिए उद्यत शक्तिसेना से समन्वित कहा गया। अब प्रस्तुत नाम में उसी सेना के गजदल तथा उसकी अधिष्ठात्री शक्ति सम्पत्करी का निर्देश है।

अतः इस नाम का प्रधान अर्थ किसी सामान्य लौकिक सम्पत्ति की प्राप्ति नहीं, अपितु श्रीललिताम्बिका की युद्ध-सज्जा और उनकी आज्ञा में स्थित दिव्य गजसेना का वर्णन है। सम्पत्ति, ऐश्वर्य अथवा अन्तःकरण-संयम से सम्बन्धित अर्थ इसके पश्चात् उपासना-दृष्टि से ग्रहण किए जा सकते हैं, किन्तु वे प्रत्यक्ष शब्दार्थ का स्थान नहीं लेते।

पदच्छेद और प्रत्यक्ष अर्थ

सम्पत्करी + समारूढ + सिन्धुर + व्रज + सेविता

सम्पत्करी भगवती की गजसेना की अधिष्ठात्री देवी का नाम है। समारूढ का अर्थ है भलीभाँति आरूढ़ अथवा सवार। सिन्धुर यहाँ गज अथवा हाथी का वाचक है। व्रज का अर्थ समूह, समुदाय अथवा सैन्यदल है। सेविता का अर्थ है सेवित, उपासित अथवा परिचर्या से युक्त।

इस प्रकार नाम का प्रत्यक्ष अर्थ है, वे श्रीललिताम्बिका, जो सम्पत्करी से अधिष्ठित अथवा उसके नेतृत्व में स्थित गजसमूह द्वारा सेवित हैं।

समास का भाव यह है कि सम्पत्करी दिव्य गजदल की नायिका हैं और वह सम्पूर्ण गजदल श्रीललिताम्बिका की सेवा तथा युद्धकार्य के लिए उपस्थित है। यहाँ स्तुति का केन्द्र सम्पत्करी नहीं, अपितु उन सम्पत्करी और उनके समस्त गजबल की भी अधीश्वरी श्रीललिताम्बिका हैं।

भास्कररायीय अर्थ

भास्करराय मखिन् की सौभाग्यभास्कर टीका में इस नाम का अर्थ ललितोपाख्यान में वर्णित श्रीललिताम्बिका की युद्धयात्रा के प्रसङ्ग से ग्रहण किया गया है। सम्पत्करी भगवती के गजदल की प्रमुख शक्ति हैं। उनके अधीन असंख्य दिव्य गज श्रीदेवी की सेवा में उपस्थित रहते हैं।

टीकाकार की दृष्टि में इस नाम का प्रयोजन भगवती की सार्वभौम सेनाधिपत्य-शक्ति प्रकट करना है। गजसेना की नायिका सम्पत्करी स्वयं स्वतंत्र अधिष्ठात्री नहीं, श्रीललिताम्बिका की आज्ञा का पालन करने वाली शक्ति हैं। अतः गजदल का सामर्थ्य, उसकी व्यवस्था, उसका पराक्रम और उसका सम्पूर्ण ऐश्वर्य अन्ततः श्रीललिताम्बिका की ही विभूति है।

सम्पत्करी नाम में “सम्पत्” शब्द का सम्बन्ध ऐश्वर्य अथवा समृद्धि से जोड़ा जा सकता है, किन्तु इस सहस्रनाम में उनका प्रथम परिचय गजसेना की नायिका के रूप में है। इसलिए केवल धनप्रदायिनी अर्थ ग्रहण करना नाम के युद्ध-वृत्तान्तगत आशय को अपूर्ण कर देगा।

ललितोपाख्यान में सम्पत्करी

ब्रह्माण्डपुराणान्तर्गत ललितोपाख्यान में भण्डासुर के विरुद्ध श्रीललिताम्बिका की विशाल शक्तिसेना का विस्तृत निरूपण मिलता है। इसी युद्ध-वर्णन में गजदल की नायिका सम्पत्करी का उल्लेख आता है। वे भगवती की आज्ञा से संचालित उस सुव्यवस्थित सैन्यशक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिसके द्वारा असुरसेना के मद और प्रचण्डता का प्रतिरोध किया जाता है।

युद्धकथा में सम्पत्करी का सम्बन्ध भगवती के अङ्कुश से बताया जाता है। इस विवरण का प्रत्यक्ष आशय यह है कि श्रीललिताम्बिका के आयुधों में स्थित शक्तियाँ भी चेतन देवतारूप हैं और आवश्यकता के अनुसार पृथक् सैन्यशक्तियों के रूप में कार्य करती हैं। सम्पत्करी का प्राकट्य तथा उनका गजदल भगवती की अङ्कुशशक्ति का विस्तार माना जाता है।

ललितोपाख्यान में सम्पत्करी का युद्ध असुरसेनापति दुर्मद से भी सम्बद्ध है। इस प्रसङ्ग में उनका पराक्रम श्रीललिताम्बिका की सेना के एक विशिष्ट अङ्ग के रूप में प्रकट होता है। यह कथानक देवी की उस शासनशक्ति को उद्घाटित करता है, जिसके अधीन उग्रतम सैन्यबल भी मर्यादा, व्यवस्था और देवीकार्य में नियोजित रहता है।

“सिन्धुर-व्रज” का अभिप्राय

संस्कृत में सिन्धुर शब्द गज के लिए प्रयुक्त होता है। व्रज शब्द यहाँ झुण्ड, समुदाय अथवा दल का बोध कराता है। अतः सिन्धुर-व्रज का अर्थ गजसमूह अथवा गजसेना है।

प्राचीन युद्धव्यवस्था में गजदल केवल शारीरिक बल का सूचक नहीं था। वह सैन्यगौरव, स्थैर्य, दुर्गभेदन-शक्ति और राजकीय ऐश्वर्य का भी चिह्न था। सहस्रनाम में ऐसे गजदल को श्रीललिताम्बिका की सेवा में उपस्थित बताकर उनके परमेश्वरत्व तथा सर्वशक्ति-समन्वित साम्राज्य का चित्र प्रस्तुत किया गया है।

यहाँ “सेवा” केवल नमस्कार अथवा स्तवन नहीं है। भगवती की आज्ञा में युद्ध करना, उनके कार्य को पूर्ण करना और उनके धर्ममय शासन की रक्षा करना भी सेवा का ही रूप है। सम्पत्करी और उनका गजदल अपने सम्पूर्ण सामर्थ्य को भगवती के संकल्प में समर्पित करते हैं।

“सम्पत्करी” नाम का भाव

सम्पत्करी का सामान्य व्युत्पत्तिगत भाव “सम्पत्ति करने वाली” अथवा “समृद्धि प्रदान करने वाली” हो सकता है। श्रीविद्या-परम्परा में सम्पत्ति का अर्थ केवल धन अथवा बाह्य उपभोग नहीं माना जाता। धर्म, ज्ञान, विवेक, साधन-सामग्री, आन्तरिक स्थैर्य, गुरु-कृपा और भगवती की सेवा का अवसर भी श्रेष्ठ सम्पदा हैं।

तथापि इस सहस्रनाम के प्रसङ्ग में व्युत्पत्तिगत भाव को ऐतिहासिक युद्ध-वर्णन से पृथक् नहीं करना चाहिए। सम्पत्करी पहले श्रीललिताम्बिका की गजसेना की नायिका हैं। उनकी सम्पत्प्रदायिनी भावना इस प्रत्यक्ष परिचय के आधार पर ही सावधानीपूर्वक ग्रहण की जानी चाहिए।

संदर्भ
सम्पत्करी देवी
सम्पत्करी देवी

शास्त्रों, विशेष रूप से ललितोपाख्यान और ब्रह्माण्ड पुराण के आधार पर, भगवती ललिता की गज-सेना की प्रधान अधिष्ठात्री सम्पत्करी देवी का विस्तृत चिह्नात्मक वर्णन निम्नलिखित है।

सम्पत्करी देवी का प्राकट्य भगवती ललिता त्रिपुर सुन्दरी के 'अंकुश' से हुआ है । वे देवी ललिता की सेना में हाथियों की विशाल सेना (गज-सेना) की सेनापति हैं। उनका स्वरूप मध्याह्न के सूर्य के समान लालिमायुक्त और अत्यंत तेजस्वी है। वे दिव्य आभा से युक्त हैं जो अज्ञान के अंधकार को नष्ट करती है। वे 'रणकोलाहल' (जिसे कनकौलाहल भी कहा गया है) नामक एक विशाल, पर्वत के समान ऊँचे और शक्तिशाली युद्ध-हाथी पर सवार हैं। यह हाथी सदैव युद्ध के लिए तत्पर और मदमत्त अवस्था में रहता है।

शास्त्रों के अनुसार सम्पत्करी देवी चतुर्भुजा हैं। उनके हाथों में...

  • अंकुश - स्वर्ण के समान चमकने वाला अंकुश, जो उनकी उत्पत्ति का स्रोत है और नियंत्रण का प्रतीक है।
  • तलवार - एक तीक्ष्ण और चमकती हुई तलवार, जो काल (मृत्यु) की भृकुटी के समान भयानक प्रतीत होती है।
  • धनुष - एक रत्नजड़ित दिव्य धनुष, जिसे वे युद्ध के समय कान तक खींचकर बाण छोड़ती हैं।
  • बाण - सूर्य की किरणों के समान चमकदार और तीखे बाण।

वे बहुमूल्य रत्नों के मुकुट से सुशोभित हैं। उनकी भुजाओं में बजने वाले कंगन हैं और वे दिव्य रेशमी वस्त्रों से सुसज्जित हैं।

उनके पीछे 'सिन्धुर-व्रज' यानी करोड़ों हाथियों की एक अटूट सेना चलती है। युद्ध के मैदान में उन्होंने असुर 'दुर्मद' का वध किया था। श्री विद्या साधना में सम्पत्करी देवी 'ज्ञान शक्ति' और 'योग' का प्रतिनिधित्व करती हैं।

हाथी मन की चंचलता का प्रतीक है; सम्पत्करी देवी द्वारा हाथियों की सेना का नेतृत्व करना यह दर्शाता है कि वे साधक को उसकी इन्द्रियों और चंचल मन पर पूर्ण नियंत्रण (इन्द्रिय निग्रह) प्रदान करती हैं। सम्पत्करी देवी का ध्यान करने से साधक को न केवल भौतिक सम्पत्ति, बल्कि आत्म-ज्ञान और मानसिक स्थिरता की प्राप्ति होती है।

श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत

उपासना-दृष्टि से गज महान् बल, गौरव, धैर्य और स्थूल सामर्थ्य का संकेत दे सकता है। ऐसा बल यदि अनियन्त्रित हो, तो मद और प्रमाद का कारण बनता है; यदि देवी की आज्ञा में स्थित हो, तो धर्मरक्षा का प्रभावशाली साधन बनता है। सम्पत्करी के नेतृत्व में स्थित गजदल इसी अनुशासित शक्ति का भाव प्रकट करता है।

अङ्कुश का कार्य महाबली गज को दिशा देना है। अतः साधनात्मक अर्थ में अङ्कुश विवेक, मर्यादा और नियमन का संकेत माना जा सकता है। मन, इन्द्रियाँ, वाणी, अधिकार और सम्पत्ति जैसी शक्तियाँ जब भगवती की ओर उन्मुख होती हैं, तब वे साधना की सहायिका बनती हैं। वही शक्तियाँ अहंकार के अधीन होने पर बन्धन का कारण हो सकती हैं।

यह अर्थ एक तात्त्विक संकेत है, नाम का प्रत्यक्ष पौराणिक अर्थ नहीं। प्रत्यक्ष अर्थ में श्रीललिताम्बिका सम्पत्करी के नेतृत्व वाले दिव्य गजसमूह से सेवित हैं। साधनात्मक अर्थ में साधक अपने समस्त सामर्थ्य को देवीचरणों में नियोजित करने की प्रेरणा ग्रहण करता है।

श्रीललिताम्बिका का सार्वभौम ऐश्वर्य

इस नाम में भगवती का ऐश्वर्य उनके आभूषणों अथवा राजसिंहासन तक सीमित नहीं है। उनका वास्तविक साम्राज्य यह है कि विविध शक्तियाँ अपनी-अपनी विशिष्ट सामर्थ्य सहित उनकी आज्ञा में स्थित हैं। सम्पत्करी गजदल का नेतृत्व करती हैं, अश्वारूढा अश्वदल का और अन्य शक्तियाँ सेना के अन्य अङ्गों का। इन सबका परम केन्द्र श्रीललिताम्बिका हैं।

इसलिए यह नाम भगवती के शक्तिसाम्राज्य का उद्घोष है। वे ऐसी परमेश्वरी हैं जिनकी सेवा में केवल देवता और योगिनियाँ ही नहीं, अपितु सुव्यवस्थित दिव्य सैन्यदल भी उपस्थित हैं। सम्पूर्ण शक्ति उनकी है, सम्पूर्ण व्यवस्था उनकी है और सम्पूर्ण विजय भी उनके संकल्प की सिद्धि है।

साधक के लिए संदेश

साधक के लिए यह नाम स्मरण कराता है कि सामर्थ्य का मूल्य उसके परिमाण में नहीं, उसके समर्पण में है। विशाल गजदल भी तभी मंगलकारी है, जब वह भगवती की आज्ञा में स्थित हो। उसी प्रकार विद्या, धन, पद, वाणी, बुद्धि और अधिकाररूपी सम्पदाएँ तभी पवित्र बनती हैं, जब उनका प्रयोग धर्म, सेवा और लोकमङ्गल के लिए किया जाए।

इस नाम के जप में साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि वे उसके अन्तःकरण में स्थित मद, प्रमाद और असंयम को अपने अङ्कुशरूपी अनुग्रह से मर्यादित करें। वे उसके सामर्थ्य को अहंकार की दिशा से हटाकर साधना, सेवा और सत्याचरण में नियोजित करें।

साधक यह भी स्मरण करता है कि वह जिन वस्तुओं को अपनी उपलब्धि मानता है, वे वस्तुतः भगवती की प्रदत्त शक्तियाँ हैं। उन्हें भगवती की सेवा में अर्पित करना ही सम्पत्ति की शुद्धि और जीवन की सार्थकता है।

नाम-सार

सम्पत्करी-समारूढ-सिन्धुर-व्रज-सेविता नाम में श्रीललिताम्बिका उस परम साम्राज्ञी के रूप में वन्दित हैं, जिनकी सेवा में सम्पत्करी के नेतृत्व वाला दिव्य गजदल उपस्थित है। प्रत्यक्ष अर्थ में यह भगवती की युद्ध-सज्जा, सेनाधिपत्य और सार्वभौम ऐश्वर्य का वर्णन है। उपासना-दृष्टि से यह नाम साधक को अपनी सम्पूर्ण शक्ति, सम्पत्ति और अधिकार भगवती की आज्ञा में समर्पित करने की प्रेरणा देता है।

हे श्रीललिताम्बिके, हमारे सामर्थ्य को अपने पवित्र कार्य में नियोजित कीजिए, हमारे मद को मर्यादित कीजिए और हमें ऐसी सम्पदा प्रदान कीजिए जो श्रद्धा, विवेक, सेवा और शरणागति को पुष्ट करे।

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122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...