भण्डसैन्यवधोद्युक्तशक्तिविक्रमहर्षिता ।
नित्यापराक्रमाटोपनिरीक्षणसमुत्सुका ॥ २८ ॥
श्रीललितासहस्रनाम के युद्धवर्णन में भगवती श्रीललिताम्बिका की शक्ति-सेना के अनेक दिव्य स्वरूपों और उनके पराक्रम का क्रमशः वर्णन किया गया है। पूर्ववर्ती नाम में ज्वालामालिनी नित्या द्वारा निर्मित वह्निमय प्राकार के मध्य भगवती की स्थिति कही गई है। अब इस नाम में उस प्रसन्नता का वर्णन है, जो भण्डासुर की सेना के विनाश के लिए उद्यत अपनी शक्तियों का विक्रम देखकर श्रीमाता के हृदय में प्रकट होती है।
यह नाम केवल युद्धभूमि की उग्रता का चित्रण नहीं करता। इसका प्रधान भाव भगवती और उनकी शक्तियों की अभिन्नता तथा धर्मसंस्थापनरूपी देवीकार्य में उन शक्तियों के पराक्रम से श्रीमाता के हर्षित होने का है।
पदच्छेद और प्रत्यक्ष अर्थ
शुद्ध नाम: भण्डसैन्यवधोद्युक्तशक्तिविक्रमहर्षिता
पदच्छेद: भण्ड-सैन्य-वध-उद्युक्त-शक्ति-विक्रम-हर्षिता
अर्चना-मन्त्र: ॐ भण्डसैन्यवधोद्युक्तशक्तिविक्रमहर्षितायै नमः।
इस प्रकार नाम का प्रत्यक्ष अर्थ है, “भण्डासुर की सेना के वध के लिए उद्यत अपनी शक्तियों के पराक्रम से हर्षित होने वाली भगवती।”
भास्कररायीय अर्थ
भास्करराय मखिन् अपने सौभाग्यभास्कर में इस नाम का अत्यन्त सीधा और प्रसंगानुकूल अर्थ करते हैं। उनकी व्याख्या का सार निम्नलिखित है:
यहाँ शक्तीनाम् बहुवचन है। अतः नाम का केन्द्र किसी एक देवी के पृथक् चरित्र पर नहीं, अपितु श्रीमाता की उस सम्पूर्ण शक्ति-सेना पर है, जो उनके संकल्प से देवीकार्य में प्रवृत्त है। उन शक्तियों का पराक्रम वास्तव में श्रीललिताम्बिका की ही शक्ति का बहुविध प्रकाश है।
हर्षिता पद से भगवती की निर्लिप्तता का अभाव नहीं माना जाना चाहिए। यहाँ हर्ष सामान्य सांसारिक आसक्ति से उत्पन्न मनोविकार नहीं है। यह धर्ममय देवीकार्य की सिद्धि और अपनी शक्तियों के समुचित पराक्रम पर प्रकट हुआ दिव्य संतोष है।
ललितोपाख्यान का प्रसंग
इस नाम की प्रत्यक्ष पृष्ठभूमि ब्रह्माण्डपुराणान्तर्गत ललितोपाख्यान में वर्णित भण्डासुर-वध की कथा है। श्रीललिताम्बिका देवकार्य की पूर्ति के लिए प्रकट होकर अपनी विशाल शक्ति-सेना सहित भण्डासुर के विरुद्ध अभियान करती हैं। सम्पत्करी, अश्वारूढा, मन्त्रिणी, दण्डनाथा, नित्या देवियाँ और अन्य अनेक शक्तियाँ उसी देवी-संकल्प के अन्तर्गत युद्ध में प्रवृत्त होती हैं।
प्रस्तुत नाम इस विस्तृत युद्धवृत्तान्त के किसी एक प्रसंग का स्वतंत्र विवरण देने के स्थान पर उसका संक्षिप्त भाव प्रकट करता है। भण्डासुर की सेना के विनाश के लिए उद्यत शक्तियों के शौर्य को देखकर श्रीमाता हर्षित होती हैं। अगले नाम में नित्या देवियों के पराक्रम के निरीक्षण की उनकी उत्कण्ठा का वर्णन इसी भाव को आगे बढ़ाता है।
शक्ति और शक्तिमती की अभिन्नता
श्रीविद्या-दृष्टि से श्रीललिताम्बिका और उनकी शक्तियाँ परस्पर सर्वथा पृथक् सत्ताएँ नहीं हैं। एक ही पराशक्ति कार्यभेद के अनुसार अनेक रूपों में प्रकाशित होती है। इसलिए शक्ति-सेना का विक्रम श्रीमाता के स्वकीय ऐश्वर्य का ही विस्तार है।
फिर भी सहस्रनाम की काव्यमयी युद्धलीला में भगवती को अधिष्ठात्री सम्राज्ञी और उनकी शक्तियों को उनकी आज्ञा में कार्यरत वीर देवियों के रूप में चित्रित किया गया है। इस प्रकार अभेदतत्त्व और लीलागत भेद, दोनों का समुचित निर्वाह होता है।
श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत
उपासना-दृष्टि से भण्डासुर और उसकी सेना को अविद्या, अहंता, आसक्ति तथा चैतन्य को आवृत करने वाली विविध वृत्तियों का संकेत माना जा सकता है। यह साधनात्मक अर्थ है, नाम का प्रत्यक्ष पौराणिक अर्थ नहीं।
श्रीमाता की शक्तियाँ साधक के भीतर प्रकट होने वाली श्रद्धा, विवेक, संयम, मन्त्रनिष्ठा, एकाग्रता और शरणागति जैसी देवी-अनुकूल वृत्तियों का संकेत दे सकती हैं। जब ये सात्त्विक शक्तियाँ अविद्यारूपी प्रवृत्तियों के प्रतिकार में जाग्रत होती हैं, तब साधक अपनी प्रगति को केवल व्यक्तिगत पुरुषार्थ का फल न मानकर भगवती के अनुग्रह और शक्ति का प्रकाश समझता है।
नाम में वर्णित श्रीमाता का हर्ष साधक को यह भाव प्रदान करता है कि धर्मनिष्ठ पुरुषार्थ, अन्तःकरण की शुद्धि और उपासना में स्थिरता भगवती को समर्पित कार्य हैं। इस भाव में अहंकार के लिए स्थान नहीं रहता, क्योंकि साधना की प्रेरणा, सामर्थ्य और सिद्धि, तीनों को देवीकृपा का ही अंश समझा जाता है।
साधक के लिए संदेश
इस नाम के जप में साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि उसके अन्तःकरण में स्थित देवी-अनुकूल शक्तियाँ जाग्रत हों और वे प्रमाद, असंयम तथा अविद्यारूपी प्रवृत्तियों पर विजय पाने के लिए तत्पर बनें।
साधना में आने वाला प्रत्येक आन्तरिक संघर्ष बाह्य युद्ध के समान नहीं होता। अनेक बार विजय का स्वरूप किसी दोष को पहचानना, अनुचित प्रवृत्ति से निवृत्त होना, नियमित जप में पुनः स्थिर होना अथवा मन को भगवती के चरणों में समर्पित करना होता है। ऐसे प्रत्येक शुद्ध प्रयत्न को साधक श्रीमाता की सेवा मान सकता है।
यह नाम यह भी स्मरण कराता है कि भगवती की शक्ति भय या क्रोधमात्र की शक्ति नहीं है। वह धर्मरक्षा में प्रवृत्त, सुव्यवस्थित, विवेकपूर्ण और अन्ततः आनन्दमयी शक्ति है। उसका पराक्रम विनाश के लिए विनाश नहीं, अपितु देवीकार्य की सिद्धि और मंगल की प्रतिष्ठा के लिए है।
भण्डसैन्यवधोद्युक्तशक्तिविक्रमहर्षिता वह श्रीललिताम्बिका हैं, जो भण्डासुर की सेना के वध के लिए उद्यत अपनी दिव्य शक्तियों के पराक्रम से हर्षित होती हैं।
प्रत्यक्षतः यह नाम देवी की युद्धलीला और उनकी शक्ति-सेना के शौर्य का वर्णन करता है। तात्त्विक दृष्टि से यह स्मरण कराता है कि समस्त देवी-अनुकूल सामर्थ्य उसी पराशक्ति का प्रकाश है।
इस नाम का जप करते हुए साधक प्रार्थना करता है कि श्रीमाता उसके अन्तःकरण में श्रद्धा, विवेक, संयम और साधनानिष्ठारूपी शक्तियों को जाग्रत करें तथा उनके प्रत्येक शुद्ध प्रयत्न को अपने चरणों में अर्पित सेवा के रूप में स्वीकार करें।