शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

71.ज्वाला-मालिनिकाक्षिप्त-वह्निप्राकार-मध्यगा - ज्वालामालिनिकाक्षिप्तवह्निप्राकारमध्यगायै नमः

प्रार्थना
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

किरिचक्ररथारूढदण्डनाथापुरस्कृता ।
ज्वालामालिनिकाक्षिप्तवह्निप्राकारमध्यगा ॥२७॥

श्रीललितासहस्रनाम के युद्धवर्णन में श्रीललिताम्बिका की दिव्य सेना, उसके प्रमुख विभागों और उसकी सुरक्षाव्यवस्था का क्रमशः निरूपण होता है। श्रीमाता चक्रराजरथ पर आरूढ़ हैं, मन्त्रिणी श्यामला गेयचक्र से उनकी सेवा करती हैं और दण्डनाथा वाराही किरिचक्र पर आरूढ़ होकर उनके अग्रभाग में चलती हैं। प्रस्तुत नाम में उस अग्निमय प्राकार का वर्णन है जिसके मध्य में श्रीललिताम्बिका अपनी शक्तिसेना सहित स्थित हैं।

इस अग्निप्राकार की रचना ज्वालामालिनी नित्या देवी ने की है। अतः नाम का प्रत्यक्ष अर्थ किसी सामान्य तेजोवलय अथवा काल्पनिक आध्यात्मिक कवच से नहीं, बल्कि ललितोपाख्यान में वर्णित एक विशिष्ट युद्धघटना से सम्बन्धित है। तात्त्विक और साधनात्मक अर्थ इसी प्रत्यक्ष अर्थ के पश्चात् ग्रहण किए जाने चाहिए।

पदच्छेद और प्रत्यक्ष अर्थ

पदच्छेद:
ज्वालामालिनिका-आक्षिप्त-वह्नि-प्राकार-मध्यगा।

सन्धि के कारण “ज्वालामालिनिका” और “आक्षिप्त” के संयोग से “ज्वालामालिनिकाक्षिप्त” रूप बनता है।

ज्वालामालिनिका अर्थात् ज्वालामालिनी नामक नित्या देवी। “ज्वालामालिनी” का सामान्य अर्थ ज्वालाओं की माला से युक्त अथवा ज्वालाओं से परिवेष्टित देवी है।

आक्षिप्त का अर्थ यहाँ रचित, विस्तारित, स्थापित अथवा चारों ओर निर्मित है।

वह्निप्राकार अर्थात् अग्नि से निर्मित प्राकार। “प्राकार” किसी नगर, दुर्ग अथवा सैन्य-निवेश के चारों ओर स्थित परिधि, परकोटे या सुरक्षात्मक घेरे को कहते हैं।

मध्यगा अर्थात् उसके मध्य में स्थित अथवा उसके भीतर विराजमान।

अतः नाम का प्रत्यक्ष अर्थ है: “वे श्रीललिताम्बिका, जो ज्वालामालिनी नित्या देवी द्वारा रचित अग्निमय प्राकार के मध्य में स्थित हैं।”

भास्कररायीय अर्थ

भास्करराय नाम का सीधा अर्थ करते हुए ज्वालामालिनिका को नित्या देवी के रूप में पहचानते हैं। उनके द्वारा निर्मित अथवा विस्तारित अग्निमय प्राकार के मध्य में श्रीललिताम्बिका स्थित हैं। इस प्रकार टीका का प्रथम और मुख्य अर्थ ललितोपाख्यान की प्रत्यक्ष युद्धघटना पर आधारित है।

यहाँ “आक्षिप्त” का आशय असावधानी से फेंकी गई अग्नि नहीं है। यह देवी की आज्ञा से चारों ओर सुव्यवस्थित रूप से स्थापित अग्निमय परिधि का द्योतक है। इसी प्रकार “मध्यगा” का अर्थ यह नहीं कि भगवती अग्नि से पीड़ित अथवा उससे आबद्ध हैं। वे उस अग्निशक्ति की अधिष्ठात्री हैं और उसी से सुरक्षित सैन्य-क्षेत्र के मध्य विराजमान हैं।

भास्कररायीय पद्धति में नाम के पौराणिक अर्थ के साथ अन्तरङ्ग तात्त्विक संकेतों की सम्भावना भी रहती है। तथापि ऐसे संकेत प्रत्यक्ष कथानक को निरस्त नहीं करते। ज्वालामालिनी देवी, अग्निप्राकार और उसके मध्य स्थित श्रीमाता इस नाम के मूल अर्थ के अभिन्न अंश हैं।

ज्वालामालिनी नित्या देवी

ज्वालामालिनी श्रीविद्या-परम्परा की नित्या देवियों में परिगणित हैं। “नित्या” शब्द उन देवशक्तियों की ओर संकेत करता है जो काल की कलाओं से सम्बद्ध होते हुए भी भगवती के नित्य चैतन्य की अभिव्यक्तियाँ मानी जाती हैं। ज्वालामालिनी का नाम विशेष रूप से अग्नि, ज्वाला और प्रखर तेज से सम्बन्धित है।

प्रस्तुत सहस्रनाम में उनके आयुधों, मुखों, भुजाओं अथवा स्वतन्त्र ध्यानरूप का वर्णन नहीं किया गया है। इसलिए इस नाम की व्याख्या में विभिन्न तन्त्रों में उपलब्ध विस्तृत ध्यानभेदों को अनिवार्य रूप से जोड़ना उचित नहीं है। यहाँ उनका परिचय इतना ही पर्याप्त है कि वे श्रीललिताम्बिका की नित्या शक्ति हैं और उनकी आज्ञा से अग्निप्राकार की रचना करती हैं।

ज्वालामालिनी का कार्य उनकी स्वतन्त्र सत्ता का प्रदर्शन नहीं, श्रीमाता की आज्ञा का पालन है। इस दृष्टि से प्रस्तुत नाम भगवती के शक्तिसाम्राज्य की सुव्यवस्था को पुनः प्रकट करता है। श्रीमाता का संकल्प उनकी शक्तियों द्वारा यथायोग्य कार्यरूप में परिणत होता है।

ललितोपाख्यान का युद्धप्रसंग

ललितोपाख्यान के अनुसार भण्डासुर के विरुद्ध युद्ध के समय श्रीललिताम्बिका ने अपनी सेना की रक्षा के लिए अग्निमय प्राकार की व्यवस्था की। उनकी आज्ञा पाकर ज्वालामालिनी देवी ने देवी-सेना के चारों ओर वह्निप्राकार स्थापित किया। श्रीमाता अपनी शक्तियों और सैन्य-विभागों सहित उसके मध्य में स्थित हुईं।

यह प्राकार केवल निष्क्रिय आवरण नहीं था। उसका प्रयोजन देवी-सेना की सुव्यवस्थित रक्षा करना और शत्रुपक्ष के अनधिकृत प्रवेश को रोकना था। युद्ध के लिए आवश्यक आवागमन की व्यवस्था भी रखी गई थी। इस प्रकार अग्निप्राकार रक्षा और सक्रिय युद्धनीति दोनों का अंग था।

विभिन्न आधुनिक वर्णनों में इस प्राकार के विस्तार, ऊँचाई और प्रवेशमार्ग के माप दिए जाते हैं। ये विवरण ललितोपाख्यान की विस्तृत कथा से सम्बन्धित हो सकते हैं, किन्तु प्रस्तुत नाम का अर्थ समझने के लिए उनका निर्धारण आवश्यक नहीं है। सहस्रनाम का मूल कथन यही है कि ज्वालामालिनी द्वारा रचित वह्निप्राकार के मध्य में श्रीमाता स्थित हैं।

अग्नि का शास्त्रीय संकेत

वैदिक और आगमिक परम्पराओं में अग्नि प्रकाश, शुद्धि, यज्ञ, रूपान्तरण और देवोपासना से सम्बद्ध है। अग्नि अपवित्रता को दग्ध करती है, आहुति को देवताओं तक पहुँचाने का माध्यम बनती है और अन्धकार का निवारण करती है। इस सामान्य शास्त्रीय पृष्ठभूमि में वह्निप्राकार को शुद्धि और संरक्षण का संकेत माना जा सकता है।

फिर भी इस नाम में अग्नि का प्राथमिक कार्य सैन्यरक्षा है। अतः इसे केवल ज्ञानाग्नि, कुण्डलिनी अथवा योगाग्नि कहकर प्रत्यक्ष युद्धप्रसंग को विस्मृत नहीं करना चाहिए। आध्यात्मिक व्याख्या मुख्य अर्थ का साधनात्मक विस्तार है, उसका प्रतिस्थापन नहीं।

अग्नि का एक स्वरूप सौम्य यज्ञाग्नि है और दूसरा स्वरूप शत्रु के लिए दुर्गम प्रखर ज्वाला। इसी प्रकार भगवती की शक्ति शरणागत के लिए संरक्षणमयी और अधर्म के लिए प्रतिरोधमयी है। करुणा तथा तेज परस्पर विरोधी नहीं, अपितु देवी के पूर्ण स्वरूप के परस्पर पूरक पक्ष हैं।

श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत

उपासना-दृष्टि से अग्निप्राकार साधक के चारों ओर खींची गई किसी काल्पनिक अभेद्य सीमा मात्र नहीं है। वह विवेक, शास्त्रीय मर्यादा, गुरु-निष्ठा और नियमित साधना से उत्पन्न अन्तःकरण की रक्षणशीलता का संकेत दे सकता है। जिस चित्त में भगवती का स्मरण दृढ़ होता है, वह अनुचित विषयों और विक्षेपों को सहज प्रवेश नहीं देता।

इस प्रतीक में अग्नि साधक की जागरूकता है, प्राकार उसकी मर्यादा है और मध्य में स्थित श्रीमाता उसका उपास्य केन्द्र हैं। जब साधना का केन्द्र भगवती हों, तब नियम और संयम बाहरी बन्धन नहीं रहते। वे उपासना की रक्षा करने वाले साधन बनते हैं।

श्रीचक्र की रेखाओं, त्रिकोणों अथवा आवरणों से इस नाम के गूढ़ सम्बन्ध कुछ परम्परागत व्याख्याओं में ग्रहण किए जा सकते हैं। ऐसे रहस्यात्मक अर्थ गुरु-परम्परा और विशिष्ट उपासना-पद्धति के अधीन हैं। सामान्य सहस्रनाम-व्याख्या में उन्हें निश्चित प्रत्यक्ष अर्थ के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है।

संरक्षण और शरणागति

अग्निप्राकार के मध्य स्थित होने का अर्थ यह नहीं कि सर्वशक्तिमयी श्रीललिताम्बिका को अपनी रक्षा के लिए किसी अन्य सत्ता की आवश्यकता है। अग्निप्राकार उनकी अपनी शक्ति और आज्ञा से प्रकट हुआ है। इसके माध्यम से वे अपनी सेना का संरक्षण करती हैं और ज्वालामालिनी की शक्ति को युद्धकार्य में नियोजित करती हैं।

भक्तिपरक दृष्टि से यह प्रसंग साधक को भगवती की शरण में सुरक्षा का भाव देता है। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि भक्त के जीवन में कोई प्रतिकूलता कभी नहीं आएगी अथवा प्रत्येक बाहरी संकट स्वतः समाप्त हो जाएगा। देवी की शरण साधक को धर्म, धैर्य, विवेक और आन्तरिक स्थिरता प्रदान करने की प्रार्थना है।

भगवती का संरक्षण कभी बाहरी अनुकूलता के रूप में और कभी कठिन परिस्थिति में उचित मार्ग पहचानने की बुद्धि के रूप में प्रकट हो सकता है। इसलिए इस नाम का भाव भय से पलायन नहीं, अपितु श्रीमाता के स्मरण में स्थित होकर अधर्म और विक्षेप का सामना करना है।

साधक के लिए संदेश

साधक के जीवन में भी उपासना की रक्षा के लिए एक मर्यादामय प्राकार आवश्यक है। नियमित जप, सात्त्विक आहार-विहार, सत्यवचन, उचित सङ्गति, इन्द्रियसंयम और गुरु-विहित आचार उस प्राकार के समान हैं। इनके अभाव में बाहरी विक्षेप सहज ही अन्तःकरण को विचलित कर सकते हैं।

ज्वालामालिनी द्वारा निर्मित प्राकार यह भी स्मरण कराता है कि संरक्षण निष्क्रियता से नहीं आता। साधक को स्वयं अपने समय, वाणी, विचार और सङ्गति की रक्षा करनी होती है। भगवती का अनुग्रह पुरुषार्थ को निष्फल नहीं करता, अपितु उसे धर्मानुकूल दिशा देता है।

इस नाम का जप करते हुए साधक श्रीललिताम्बिका से प्रार्थना कर सकता है कि वे उसके अन्तःकरण में विवेक का प्रकाश प्रज्वलित करें। ज्वालामालिनी की शक्ति उसके जप, श्रद्धा और सदाचार की रक्षा करे तथा अविद्या, प्रमाद और अनुचित आसक्तिरूपी वृत्तियों को उसके उपासना-केन्द्र पर अधिकार न करने दे।

भाव-सार
“ज्वालामालिनिकाक्षिप्तवह्निप्राकारमध्यगा” नाम में श्रीललिताम्बिका उस परम साम्राज्ञी के रूप में वन्दित हैं जो ज्वालामालिनी नित्या देवी द्वारा रचित अग्निमय प्राकार के मध्य स्थित हैं। प्रत्यक्ष रूप में यह भण्डासुर-वध के लिए प्रवृत्त देवी-सेना की दिव्य सुरक्षाव्यवस्था का वर्णन है। उपासना-दृष्टि से वह्निप्राकार विवेक, शुद्धि, मर्यादा और साधना की रक्षणशील शक्ति का संकेत देता है। इस नाम के जप में साधक प्रार्थना करता है कि भगवती उसके अन्तःकरण को अपने स्मरण में केन्द्रित रखें और उसकी उपासना को अविद्या, प्रमाद तथा विक्षेप से सुरक्षित करें।

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...