श्रीललितासहस्रनाम के इस भाग में श्रीललिताम्बिका की दिव्य शक्तिसेना और उसके सुव्यवस्थित प्रस्थान का वर्णन है। पूर्वनाम में भगवती को चक्रराजरथ पर आरूढ़ और समस्त आयुधों से सम्पन्न कहा गया है। प्रस्तुत नाम में उनके पार्श्व में स्थित मन्त्रिणी श्यामला देवी का उल्लेख होता है। मन्त्रिणी स्वयं गेयचक्र नामक रथ पर आरूढ़ होकर श्रीमाता की सेवा करती हैं।
यह नाम मुख्यतः एक प्रत्यक्ष पौराणिक दृश्य का उद्घाटन करता है। श्रीललिताम्बिका परम साम्राज्ञी हैं और मन्त्रिणी उनकी विश्वस्त सहायिका, परामर्शशक्ति तथा सेविका हैं। अतः इस नाम का प्राथमिक अर्थ युद्धयात्रा में मन्त्रिणी देवी द्वारा की जा रही श्रीमाता की परिचर्या है। नाद, मन्त्र और प्रज्ञा से जुड़े अर्थ इसके उपासनात्मक विस्तार हैं; वे प्रत्यक्ष अर्थ का स्थान नहीं लेते।
पदच्छेद और प्रत्यक्ष अर्थ
पदच्छेद:
गेयचक्र-रथ-आरूढ-मन्त्रिणी-परिसेविता।
गेयचक्र अर्थात् गेयचक्र नामक दिव्य रथ। यहाँ “गेय” को गानयोग्य, स्तुत्य अथवा प्रसिद्ध अर्थ में ग्रहण किया जा सकता है और “चक्र” उस रथ के विशिष्ट नाम का अंश है।
रथारूढ अर्थात् रथ पर आरूढ़। यह पद मन्त्रिणी देवी का विशेषण है।
मन्त्रिणी अर्थात् श्रीललिताम्बिका की मन्त्रिणी शक्ति, जिन्हें इस प्रसंग में श्यामला देवी कहा गया है।
परिसेविता अर्थात् सब ओर से सेवित, परिचरित अथवा आदरपूर्वक उपासित।
अतः नाम का प्रत्यक्ष अर्थ है: “वे श्रीललिताम्बिका, जिनकी सेवा गेयचक्र नामक रथ पर आरूढ़ मन्त्रिणी श्यामला देवी करती हैं।”
भास्कररायीय अर्थ
भास्करराय सबसे पहले नाम का यही सरल और प्रत्यक्ष अर्थ देते हैं। उनके अनुसार गेयचक्र रथ पर आरूढ़ देवी कोई अनिर्दिष्ट परिचारिका नहीं, अपितु मन्त्रिणी श्यामला हैं। “परितः सेविता” पद उनकी निकटस्थ, आदरपूर्ण और सर्वांगपूर्ण सेवा को व्यक्त करता है।
टीका में इसके पश्चात् एक वैकल्पिक अर्थ भी दिया गया है। “गेय” का अर्थ प्रसिद्ध मानकर गेयचक्र को सूर्य-मण्डल से सम्बद्ध किया गया है। उस मण्डल में स्थित मन्त्रिणीस्वरूप विद्योपासिकाएँ और योगिनियाँ भगवती की सेवा करती हैं। इस अर्थ में एक मन्त्रिणी देवी के साथ मन्त्रिणीस्वरूप उपासक-समूह का भी संकेत प्राप्त होता है।
भास्करराय एक और अन्तरङ्ग उपासनात्मक अर्थ प्रस्तुत करते हैं। इसमें “आरोहण” बाह्य रथारोहण के साथ-साथ बुद्धि में भगवती का अनुसन्धान, अर्थात् उनके स्वरूप को अन्तःकरण में दृढ़तापूर्वक धारण करना भी है। मन्त्रिणी का सम्बन्ध मन्त्रतत्त्व के अनुभव से जोड़ा गया है। यह विषय श्रीविद्या के रहस्यात्मक साधनाक्षेत्र से सम्बन्धित है; इसलिए इसका विवेचन परम्परागत गुरु-उपदेश की मर्यादा में ही ग्रहण करना उचित है।
ललितोपाख्यान का प्रसंग
ललितोपाख्यान के युद्धवर्णन में श्रीललिताम्बिका चक्रराजरथ पर आरूढ़ होकर भण्डासुर के विरुद्ध प्रस्थान करती हैं। उनके साथ प्रमुख शक्तियाँ अपने-अपने रथों पर चलती हैं। मन्त्रिणी का रथ गेयचक्र और दण्डनाथा वाराही का रथ किरिचक्र कहा गया है। इस प्रकार प्रस्तुत नाम अगले नाम “किरिचक्ररथारूढदण्डनाथापुरस्कृता” से भी स्वाभाविक रूप से जुड़ता है।
इस वर्णन का केन्द्र श्रीमाता का साम्राज्ञीभाव है। उनकी शक्तियाँ स्वतन्त्र प्रतिस्पर्धी सत्ताएँ नहीं हैं, अपितु उन्हीं की आज्ञा, ज्ञान और क्रियाशक्ति के विशिष्ट प्रकाश हैं। मन्त्रिणी का गेयचक्र पर आरूढ़ होना श्रीमाता के शासन में ज्ञान, मन्त्रणा, वाणी और सुव्यवस्थित अभिव्यक्ति के महत्त्व को प्रकट करता है।
मन्त्रिणी श्यामला का स्वरूप
“मन्त्रिणी” पद का सामान्य अर्थ है मन्त्रणा देने वाली अथवा शासनकार्य में साम्राज्ञी की निकटस्थ सहायिका। श्रीविद्या-परम्परा में श्यामला देवी को वाणी, विद्या, मन्त्रणा और प्रज्ञा से सम्बद्ध शक्ति के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है। यहाँ उनका उल्लेख मुख्यतः श्रीललिताम्बिका की सेविका और मन्त्रिणी के रूप में हुआ है।
“सेवा” का अर्थ केवल बाह्य परिचर्या नहीं है। इसमें भगवती की आज्ञा का सम्मान, उनके संकल्प के अनुकूल कार्य और उनके साम्राज्य की व्यवस्था का पालन भी समाहित है। मन्त्रिणी की सामर्थ्य श्रीमाता से पृथक् स्वायत्त सत्ता नहीं, श्रीमाता के ही अनुग्रह और अधिकार का प्रकाश है।
गेयचक्र का संकेत
“गेय” शब्द गानयोग्य, स्तुत्य अथवा गेय रचना से सम्बन्धित है। इसलिए गेयचक्र का नाम सहज रूप से वाणी, स्वर, स्तुति और मन्त्रात्मक नाद की स्मृति कराता है। तथापि सहस्रनाम का प्रत्यक्ष कथन इतना ही है कि यह मन्त्रिणी देवी का विशिष्ट रथ है। उसकी बनावट, आयाम, वाद्यसमूह अथवा गति के समय होने वाली घटनाओं के विषय में बिना सुनिश्चित ग्रन्थाधार के अतिरिक्त विवरण जोड़ना उचित नहीं है।
उपासना-दृष्टि से गेयचक्र को ऐसी सुव्यवस्थित वाणी का प्रतीक माना जा सकता है जो भगवती की स्तुति, मन्त्रणा और सेवा में प्रवृत्त हो। जैसे रथ साधक को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाता है, वैसे ही शुद्ध वाणी और एकाग्र मन्त्रानुसन्धान अन्तःकरण को भगवती के स्मरण की ओर ले जाते हैं। यह साधनात्मक संकेत है, नाम का एकमात्र अथवा अनिवार्य शाब्दिक अर्थ नहीं।
श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत
श्रीललिताम्बिका परम चैतन्य और सर्वाधिष्ठात्री शक्ति हैं। मन्त्रिणी को उनकी ज्ञानमयी मन्त्रणा तथा सुव्यक्त वाणी का प्रकाश मानने पर इस नाम में चैतन्य, बुद्धि और अभिव्यक्ति का सुन्दर सम्बन्ध दिखाई देता है। मूल संकल्प श्रीमाता का है और मन्त्रिणी उस संकल्प को सुबोध, सुसंगत तथा कार्योन्मुख अभिव्यक्ति प्रदान करती हैं।
भास्करराय के अन्तरङ्ग अर्थ में साधक भगवती को अपने से सर्वथा दूर किसी बाह्य सत्ता के रूप में ही नहीं देखता। वह गुरु-उपदिष्ट पद्धति से उनके स्वरूप का अन्तःकरण में अनुसन्धान करता है। ऐसी साधना में मन्त्र केवल उच्चरित वर्णसमूह नहीं रहता, अपितु भगवती-स्मरण का चैतन्यमय साधन बनता है। इसके रहस्यात्मक पक्ष का अभ्यास योग्य गुरु की दीक्षा और निर्देशन के अधीन ही होना चाहिए।
साधक के लिए संदेश
मन्त्रिणी श्यामला की सेवा साधक को यह स्मरण कराती है कि ज्ञान और वाणी का परम सौन्दर्य भगवती की सेवा में है। बुद्धि यदि अहंकार की पोषिका बने तो वह बन्धन का कारण हो सकती है; वही बुद्धि श्रद्धा और शरणागति से युक्त होकर भगवती के संकल्प की सेविका बनती है।
इस नाम का जप करते हुए साधक श्रीललिताम्बिका से प्रार्थना कर सकता है कि उसकी वाणी सत्य, मधुर और हितकारी बने; उसकी बुद्धि धर्मानुकूल निर्णय करे; तथा उसका अध्ययन, चिन्तन और कथन देवी की आराधना के साधन बनें। यहाँ साधना का लक्ष्य सांसारिक प्रदर्शन नहीं, अपितु अन्तःकरण की परिशुद्धि और भगवती के प्रति अविचल सेवाभाव है।