गुरुवार, 23 जुलाई 2026

70.किरिचक्र-रथारूढ-दण्डनाथा-पुरस्कृता - किरिचक्ररथारूढदण्डनाथापुरस्कृतायै नमः

प्रार्थना
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

किरिचक्ररथारूढदण्डनाथापुरस्कृता
ज्वालामालिनिकाक्षिप्तवह्निप्राकारमध्यगा ॥२७॥

श्रीललितासहस्रनाम के इस युद्धवर्णन में श्रीललिताम्बिका के दिव्य सैन्य-सङ्घटन का क्रमशः परिचय प्राप्त होता है। सम्पत्करी गजसेना का और अश्वारूढा अश्वसेना का संचालन करती हैं। श्रीमाता स्वयं चक्रराजरथ पर विराजमान हैं। मन्त्रिणी श्यामला गेयचक्र पर आरूढ़ होकर उनकी सेवा करती हैं। अब प्रस्तुत नाम में दण्डनाथा वाराही का उल्लेख है, जो किरिचक्र नामक रथ पर आरूढ़ होकर भगवती के अग्रभाग में स्थित हैं।

यह नाम सर्वप्रथम एक प्रत्यक्ष पौराणिक दृश्य का वर्णन करता है। परम साम्राज्ञी श्रीललिताम्बिका के आगे उनकी दण्डनायिका और सेनापति दण्डनाथा चल रही हैं। इससे भगवती के सुव्यवस्थित शासन, उनकी शक्तिसेना और उनकी आज्ञा के अधीन कार्य करने वाली दण्डशक्ति का प्रकाश होता है।

पदच्छेद और प्रत्यक्ष अर्थ

पदच्छेद:
किरिचक्र-रथ-आरूढ-दण्डनाथा-पुरस्कृता।

किरि शब्द का अर्थ वाराह अथवा शूकर है।

किरिचक्र उस विशिष्ट दिव्य रथ का नाम है जिसके चक्र वाराह-सदृश बताए गए हैं।

रथारूढा अर्थात् रथ पर आरूढ़ हुई। समस्त पदों के संयुक्त होने पर अन्तिम आकार का लोप होकर “रथारूढदण्डनाथा” रूप प्राप्त होता है।

दण्डनाथा अर्थात् दण्डशक्ति की अधिष्ठात्री, भगवती की सेनानायिका तथा उनकी आज्ञा का पालन कराने वाली वाराही देवी।

पुरस्कृता का अर्थ है आगे रखी हुई, अग्रभाग में प्रतिष्ठित अथवा जिसे अग्रगामिनी शक्ति प्राप्त हो। यहाँ श्रीललिताम्बिका ने दण्डनाथा को अपने आगे रखा है।

अतः नाम का प्रत्यक्ष अर्थ है: “वे श्रीललिताम्बिका, जिन्होंने वाराह-सदृश चक्रों वाले किरिचक्र रथ पर आरूढ़ दण्डनाथा देवी को अपने आगे प्रतिष्ठित किया है।”

सरल भाव में कहा जाए तो श्रीमाता के आगे किरिचक्र पर आरूढ़ उनकी सेनानायिका दण्डनाथा वाराही चलती हैं।

भास्कररायीय अर्थ

किरिवच्चक्राणि यस्य तं रथमारूढया दण्डनाथया पुरस्कृता।
अर्थात् जिन श्रीललिताम्बिका के आगे वाराह-सदृश चक्रों वाले रथ पर आरूढ़ दण्डनाथा देवी स्थित हैं।

भास्करराय नाम की व्याख्या अत्यन्त स्पष्ट रूप से करते हैं। “किरि” का अर्थ वाराह है और “किरिवच्चक्राणि” से ऐसे रथ का बोध होता है जिसके चक्र वाराहों के सदृश हैं। उस रथ पर दण्डनाथा आरूढ़ हैं और श्रीललिताम्बिका ने उन्हें अपने आगे रखा है।

इस व्याख्या में “पुरस्कृता” पद विशेष महत्त्व रखता है। श्रीमाता स्वयं किसी अन्य शक्ति के अधीन होकर उसके पीछे नहीं चलतीं। वे सर्वाधिष्ठात्री साम्राज्ञी हैं। दण्डनाथा को आगे रखना उनकी अपनी राजाज्ञा और युद्धव्यवस्था का अंश है। अतः दण्डनाथा की समस्त शक्ति भी श्रीमाता से प्राप्त और उन्हीं की सेवा में नियोजित है।

दण्डनाथा वाराही का स्थान

दण्डनाथा श्रीललिताम्बिका की प्रमुख शक्तियों में से एक हैं। श्रीविद्या-परम्परा में वे वाराही, दण्डिनी अथवा दण्डनाथा नामों से सम्बोधित होती हैं। “दण्ड” यहाँ केवल दण्ड देने का उपकरण नहीं है। यह शासन, मर्यादा, अनुशासन, संरक्षण और आज्ञापालन की शक्ति का द्योतक है।

राजा अथवा साम्राज्ञी की आज्ञा को व्यवहार में प्रतिष्ठित करने के लिए दण्डनीति आवश्यक मानी जाती है। इसी भाव से दण्डनाथा श्रीमाता की आज्ञाशक्ति का कार्यकारी स्वरूप हैं। वे भगवती की इच्छा से सेनाओं का नियमन करती हैं, विरोधी शक्तियों का प्रतिरोध करती हैं और श्रीमाता की युद्धयात्रा के अग्रभाग में स्थित रहती हैं।

उनका वाराही रूप पृथ्वी को ऊपर उठाने वाले वाराहतत्त्व की स्मृति भी कराता है। तथापि प्रस्तुत नाम का प्रधान विषय वाराहावतार का आख्यान नहीं, अपितु किरिचक्र पर आरूढ़ दण्डनाथा का श्रीललिताम्बिका के आगे स्थित होना है। दोनों प्रसंगों को अभिन्न मानकर अतिरिक्त कथाएँ जोड़ना उचित नहीं है।

ललितोपाख्यान का युद्धप्रसंग

ललितोपाख्यान में भण्डासुर के विरुद्ध श्रीललिताम्बिका की महायात्रा का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है। भगवती चक्रराजरथ पर चलती हैं। मन्त्रिणी का वाहन गेयचक्र और दण्डनाथा का वाहन किरिचक्र है। इस प्रकार तीनों रथ श्रीमाता के दिव्य शासन में ज्ञान, मन्त्रणा और दण्डशक्ति के सुव्यवस्थित समन्वय को प्रकट करते हैं।

सहस्रनाम के आगे आने वाले युद्धवर्णन में वाराही द्वारा विशुक्र के प्राणहरण पर श्रीललिताम्बिका के आनन्दित होने का पृथक् उल्लेख मिलता है। इससे दण्डनाथा के पराक्रम की पुष्टि होती है। किन्तु वह बाद का प्रसंग है। प्रस्तुत सत्तरवें नाम का प्रत्यक्ष अर्थ केवल इतना है कि किरिचक्र पर आरूढ़ दण्डनाथा भगवती के अग्रभाग में प्रतिष्ठित हैं।

इस भेद को बनाए रखना आवश्यक है। एक नाम में कही गई घटना को दूसरे नाम की व्याख्या में मिला देने पर सहस्रनाम की क्रमबद्ध रचना अस्पष्ट हो जाती है। यहाँ पहले सेना की व्यवस्था और प्रमुख शक्तियों की स्थिति बताई गई है; उनके विशिष्ट युद्धकर्मों का वर्णन इसके बाद आता है।

किरिचक्र का अभिप्राय

भास्करराय की संक्षिप्त व्याख्या के अनुसार किरिचक्र की पहचान उसके वाराह-सदृश चक्रों से होती है। अतः इसे केवल ऐसा रथ कहना जिसके पहियों पर वाराह का चिह्न अंकित हो, टीका के प्रत्यक्ष शब्दों से कुछ भिन्न होगा। “सदृश” का अर्थ आकार, स्वरूप अथवा विशिष्ट रचनात्मक साम्य हो सकता है; इसके आगे का विवरण बिना स्पष्ट ग्रन्थाधार के निश्चित नहीं करना चाहिए।

किरिचक्र की मंजिलों की संख्या, उसका माप, उसे खींचने वाले प्राणी, उसके चलने से पृथ्वी का कम्पित होना अथवा उस पर स्थित प्रत्येक शक्ति का क्रम जैसे विवरण प्रस्तुत नाम की भास्कररायीय व्याख्या में आवश्यक नहीं हैं। इसलिए नाम के अर्थ को ऐसे विस्तारों पर निर्भर नहीं किया गया है।

दण्डतत्त्व का साधनात्मक अर्थ

“दण्ड” का तात्त्विक अर्थ केवल कठोर दमन नहीं है। धर्मसम्मत दण्ड मर्यादा की रक्षा करता है, अनुचित प्रवृत्ति को रोकता है और व्यवस्था को स्थिर रखता है। इसी कारण दण्डनाथा का स्वरूप क्रूरता का नहीं, अपितु भगवती की न्यायपूर्ण, रक्षात्मक और अनुशासनमयी शक्ति का द्योतक है।

श्रीमाता करुणामयी हैं, किन्तु उनकी करुणा अव्यवस्था की स्वीकृति नहीं है। दैवी करुणा साधक का संरक्षण करती है और दैवी दण्ड उसे अधर्म, प्रमाद तथा असंयम से लौटाता है। दोनों में विरोध नहीं है। माता का अनुशासन भी अन्ततः साधक के हित और परिशुद्धि के लिए होता है।

श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत

श्रीविद्या-दृष्टि से श्रीललिताम्बिका परम चैतन्य और सर्वशक्तिमयी अधिष्ठात्री हैं। मन्त्रिणी उनकी ज्ञान और मन्त्रणा से सम्बद्ध शक्ति का प्रकाश करती हैं, जबकि दण्डनाथा उनकी आज्ञा को क्रियात्मक व्यवस्था में प्रतिष्ठित करने वाली शक्ति का संकेत देती हैं। यह वर्गीकरण उपासनात्मक समझ के लिए है; इससे इन देवियों को श्रीमाता से पृथक् स्वतन्त्र परम तत्त्व नहीं माना जाता।

साधनात्मक अर्थ में किरिचक्र पर आरूढ़ दण्डनाथा उस दृढ़ शक्ति का बोध करा सकती हैं जो साधक के जीवन में नियम, संयम और गुरु-प्रदत्त अनुशासन को आगे रखती है। जिस प्रकार दण्डनाथा श्रीमाता के अग्रभाग में चलती हैं, उसी प्रकार भगवदुपासना में उचित आचार, वाणी-संयम और इन्द्रिय-निग्रह साधक के मार्ग में अग्रणी होने चाहिए।

कुछ श्रीविद्या-परम्पराओं में वाराही के मन्त्र, यन्त्र और अन्तरङ्ग उपासना-पद्धतियाँ अत्यन्त गोपनीय मानी जाती हैं। ऐसे विषयों का अभ्यास केवल विधिवत् दीक्षा और समर्थ गुरु के निर्देशन में किया जाना चाहिए। सहस्रनाम के सामान्य भक्तिपरक अर्थ के लिए उन रहस्यों का उद्घाटन आवश्यक नहीं है।

साधक के लिए संदेश

यह नाम साधक को स्मरण कराता है कि आध्यात्मिक जीवन केवल भावावेग पर नहीं टिकता। श्रद्धा के साथ मर्यादा, नियमितता और आत्मसंयम भी आवश्यक हैं। जप, अध्ययन, सेवा और आचरण में स्थिरता ही अन्तःकरण को भगवती के अनुग्रह के योग्य बनाती है।

दण्डनाथा को आगे रखने वाली श्रीललिताम्बिका का ध्यान करते हुए साधक प्रार्थना कर सकता है कि भगवती उसके भीतर विवेकपूर्ण अनुशासन स्थापित करें। वे प्रमाद, असत्य, असंयम और धर्मविरुद्ध प्रवृत्तियों से उसकी रक्षा करें तथा उसे गुरु और शास्त्र द्वारा निर्दिष्ट मार्ग पर स्थिर रखें।

इस नाम का जप सांसारिक विजय अथवा सभी विघ्नों के स्वतः नाश की प्रतिज्ञा नहीं है। जप में साधक भगवती के समक्ष शरणागत होकर प्रार्थना करता है कि उनकी दण्डशक्ति उसके दोषों का परिमार्जन करे, उसकी शक्ति को धर्मानुकूल दिशा दे और उसके संकल्प को सेवा, संयम तथा सत्य में प्रतिष्ठित करे।

भाव-सार
“किरिचक्ररथारूढदण्डनाथापुरस्कृता” नाम में श्रीललिताम्बिका उस परम साम्राज्ञी के रूप में वन्दित हैं जिन्होंने वाराह-सदृश चक्रों वाले किरिचक्र रथ पर आरूढ़ दण्डनाथा वाराही को अपने अग्रभाग में प्रतिष्ठित किया है। प्रत्यक्ष रूप में यह भगवती की दिव्य युद्धव्यवस्था का वर्णन है। तात्त्विक दृष्टि से दण्डनाथा श्रीमाता की मर्यादा, शासन, संरक्षण और धर्मसम्मत अनुशासनशक्ति का संकेत देती हैं। इस नाम के जप में साधक प्रार्थना करता है कि उसका जीवन भगवती की आज्ञा, शास्त्रीय मर्यादा, संयम और सेवाभाव से सुशोभित हो।

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...