गुरुवार, 30 जुलाई 2026

77.कामेश्वर-मुखालोक-कल्पित-श्रीगणेश्वरा - कामेश्वरमुखालोककल्पितश्रीगणेश्वरायै नमः

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
    तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं बिभ्रतीं
    सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

विशुक्र-प्राणहरण-वाराही-वीर्य-नन्दिता ।
कामेश्वर-मुखालोक-कल्पित-श्रीगणेश्वरा ॥ ३०॥

श्रीललितासहस्रनाम के युद्ध-वर्णन में छिहत्तरवें नाम में वाराही देवी द्वारा विशुक्र के प्राणहरण से भगवती की प्रसन्नता कही गई। उसके पश्चात् सतहत्तरवाँ नाम “कामेश्वर-मुखालोक-कल्पित-श्रीगणेश्वरा” आता है। इस नाम में भगवती ललिता की वह दिव्य लीला प्रकट होती है, जिसमें उनके कामेश्वर-मुखावलोकन से श्रीगणेश्वर का आविर्भाव होता है।

इस नाम का पदच्छेद इस प्रकार है। कामेश्वर, मुखालोक, कल्पित और श्रीगणेश्वरा। “कामेश्वर” यहाँ परमशिव हैं, जो भगवती ललिता के दिव्य सहचर और प्रकाश-स्वरूप हैं। “मुखालोक” का अर्थ है उनके मुख का अवलोकन। “कल्पित” का अर्थ यहाँ कल्पना-मात्र नहीं, अपितु भगवती के संकल्प से आविर्भाव है। “श्रीगणेश्वरा” का अर्थ है श्रीगणेश्वर का प्राकट्य कराने वाली। अतः इस नाम का भाव है कि भगवती ललिता ने कामेश्वर के मुख का अवलोकन कर अपने दिव्य संकल्प से श्रीगणेश्वर को प्रकट किया।

ललितोपाख्यान का प्रसंग

भण्डासुर-युद्ध में विशुक्र ने देवी-सेना की गति रोकने के लिए जयविघ्न नामक विघ्नयन्त्र का प्रयोग किया। उसके प्रभाव से शक्ति-सेना में उत्साह-क्षय, जड़ता और विघ्न का वातावरण उत्पन्न हुआ। यह देखकर भगवती ललिता ने कामेश्वर के मुख का अवलोकन किया। उसी दिव्य मुखावलोकन से श्रीगणेश्वर का आविर्भाव हुआ।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस नाम में श्रीगणेश्वर के प्राकट्य का वर्णन है, जबकि अगले नाम “महागणेश-निर्भिन्न-विघ्नयन्त्र-प्रहर्षिता” में महागणेश द्वारा विघ्नयन्त्र-भेदन से भगवती की प्रसन्नता कही गई है। अतः 77वें नाम का मुख्य विषय श्रीगणेश्वर का उदय है, और 78वें नाम का मुख्य विषय उनके द्वारा विघ्नयन्त्र का भेदन है।

कामेश्वर-मुखालोक का रहस्य

भास्करराय की व्याख्या का मूल भाव यह है कि भगवती ने कामेश्वर के मुखावलोकन से श्रीगणेश्वर को प्रकट किया। श्रीविद्या-दृष्टि से कामेश्वर प्रकाश-तत्त्व हैं और ललिता विमर्श-शक्ति हैं। जब प्रकाश और विमर्श का सामरस्य प्रकट होता है, तब साधना-पथ के विघ्नों को दूर करने वाली बुद्धि, स्थिरता और मंगलशक्ति का उदय होता है। श्रीगणेश्वर उसी मंगल-विघ्ननाशक शक्ति के देवस्वरूप हैं।

“मुखालोक” शब्द भी अत्यन्त सुन्दर है। मुख से प्रसन्नता, अनुग्रह और संकल्प व्यक्त होते हैं। भगवती का कामेश्वर के मुख की ओर देखना केवल लौकिक दृष्टि नहीं है, अपितु शिव और शक्ति के परस्पर सामरस्य का सूचक है। इसी सामरस्य से गणेश-तत्त्व प्रकट होता है, जो विघ्नों को पहचानता है और साधना की गति को पुनः सुचारु करता है।

गणेश-तत्त्व और विघ्ननाश

गणपति अथर्वशीर्ष में गणपति को प्रत्यक्ष तत्त्व, ब्रह्म, आत्मा और जगत् के कर्ता, धर्ता तथा हर्ता के रूप में प्रणाम किया गया है। उसी ग्रन्थ में उन्हें विघ्ननाशक भी कहा गया है। इससे स्पष्ट होता है कि गणेश-तत्त्व केवल बाह्य विघ्नों को हटाने वाला देवतारूप नहीं, अपितु अन्तःकरण को स्थिर करने वाली ब्रह्मविद्या-संबद्ध शक्ति भी है।

गणपति अथर्वशीर्ष का संकेत
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि । त्वमेव केवलं कर्ताऽसि ।
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि । त्वमेव केवलं हर्ताऽसि ।
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि । त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम् ॥

इसी कारण श्रीविद्या-साधना में गणपति-पूजन को प्रारम्भिक मंगल के रूप में विशेष स्थान प्राप्त है। साधक के भीतर जब विक्षेप, आलस्य, संशय, असंयम और भय उत्पन्न होते हैं, तब वे विघ्नयन्त्र के समान साधना की गति को रोकते हैं। श्रीगणेश्वर का स्मरण इन विघ्नों को देखने और उनसे ऊपर उठने की शक्ति देता है।

सौन्दर्यलहरी और मातृभाव

सौन्दर्यलहरी के बहत्तरवें श्लोक में गणेश और स्कन्द को देवी के पुत्ररूप में स्मरण किया गया है। वहाँ गणेश का बाल-सुलभ भाव देवी के वात्सल्य और शिव-शक्ति-परिवार की आनन्दमयी लीला को प्रकट करता है। इस दृष्टि से “कामेश्वर-मुखालोक-कल्पित-श्रीगणेश्वरा” नाम भी भगवती की मातृशक्ति और शिव-शक्ति-सामरस्य से उत्पन्न मंगलशक्ति को सूचित करता है।

त्रिपुरारहस्य की तात्त्विक दृष्टि

त्रिपुरारहस्य में त्रिपुरा को जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति से परे स्थित शुद्ध चैतन्य के रूप में समझाया गया है। इस तात्त्विक दृष्टि से देवी की युद्ध-लीला केवल बाह्य कथा नहीं रहती। वह साधक के अन्तःकरण में चैतन्य की विजय का संकेत बन जाती है। जब चैतन्य अपने ही प्रकाश को पहचानता है, तब विघ्नरूपी जड़ता का आधार टूटने लगता है।

इस नाम में कामेश्वर और ललिता का मुखावलोकन इसी चैतन्य-सामरस्य का सूचक है। उस सामरस्य से श्रीगणेश्वर का प्राकट्य होता है। साधनात्मक अर्थ में यह बताता है कि जब साधक अपने भीतर शिवरूप प्रकाश और शक्तिरूप जागरूकता को एक करता है, तब विवेक, स्थिरता और विघ्ननाशक बुद्धि का जन्म होता है।

साधक के लिए संदेश

“कामेश्वर-मुखालोक-कल्पित-श्रीगणेश्वरा” नाम साधक को सिखाता है कि विघ्नों का निवारण केवल बाहरी प्रयास से नहीं होता। जब साधक का चित्त भगवती की कृपा, शिव-शक्ति-सामरस्य और गणेश-तत्त्व से जुड़ता है, तब भीतर से समाधान की शक्ति प्रकट होती है। इसी शक्ति से आलस्य, भ्रम, भय, संशय और अस्थिरता दूर होते हैं।

अर्चना में यह नाम “कामेश्वर-मुखालोक-कल्पित-श्रीगणेश्वरायै नमः” रूप से उच्चरित होता है। इसके जप में साधक भगवती से प्रार्थना करता है कि उसके जीवन और साधना में उपस्थित विघ्नरूपी जड़ता, संशय, प्रमाद और भय श्रीगणेश्वर के मंगलप्रकाश से दूर हों।

इस प्रकार “कामेश्वर-मुखालोक-कल्पित-श्रीगणेश्वरा” नाम भगवती ललिता की शिव-सामरस्यपूर्ण सृजन-लीला का अद्भुत उद्घोष है। इसमें मातृशक्ति, मंगल, बुद्धि, स्थिरता और विघ्ननाशक कृपा एक साथ प्रकट होते हैं। जब साधक इस नाम का श्रद्धा से स्मरण करता है, तब वह अपनी साधना को श्रीगणेश्वर की मंगलमयी आराधना और श्रीललिताम्बिका की करुणा के अधीन करता है।

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...