बुधवार, 29 जुलाई 2026

76.विशुक्र-प्राणहरण-वाराही-वीर्य-नन्दिता - विशुक्रप्राणहरणवाराहीवीर्यनन्दितायै नमः

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

विशुक्रप्राणहरणवाराहीवीर्यनन्दिता
कामेश्वरमुखालोककल्पितश्रीगणेश्वरा ॥ ३०॥

श्रीललितासहस्रनाम के इस अंश में भण्डासुर के विरुद्ध चल रहे देवी-सेना के महायुद्ध का वर्णन है। भगवती के सम्मुख उनकी प्रधान शक्तियाँ अपने-अपने विशिष्ट सामर्थ्य का प्रकाश करती हैं। बाला त्रिपुरसुन्दरी भण्डासुर के पुत्रों का वध करती हैं, मन्त्रिणी अम्बा विषङ्ग का संहार करती हैं और दण्डिनी वाराही विशुक्र के प्राणों का हरण करती हैं। इन शक्तियों का पराक्रम देखकर श्रीललिताम्बिका क्रमशः नन्दित, तोषित और हर्षित होती हैं।

छिहत्तरवाँ नाम “विशुक्रप्राणहरणवाराहीवीर्यनन्दिता” इसी युद्ध-प्रसंग को प्रत्यक्ष रूप से अभिव्यक्त करता है। इसका प्रधान अर्थ किसी कल्पित मनोवैज्ञानिक प्रतीक पर आधारित नहीं है। सर्वप्रथम यह नाम उस शास्त्रीय घटना का स्मरण कराता है जिसमें वाराही देवी ने विशुक्र नामक दैत्य का वध किया और उनके शौर्य से पराम्बा प्रसन्न हुईं।

पदच्छेद और प्रत्यक्ष अर्थ

मूल नाम: विशुक्रप्राणहरणवाराहीवीर्यनन्दिता

पदच्छेद: विशुक्र-प्राण-हरण-वाराही-वीर्य-नन्दिता।

समास-विग्रह: विशुक्रस्य प्राणानां हरणं यया कृतम्, तस्याः वाराह्याः वीर्येण नन्दिता।

अर्थात् जो विशुक्र नामक दैत्य के प्राणों का हरण करने वाली वाराही देवी के वीर्य अर्थात् शौर्य से आनन्दित हुईं, वे श्रीललिताम्बिका विशुक्रप्राणहरणवाराहीवीर्यनन्दिता हैं।

विशुक्र अर्थात् विशुक्र नामक दैत्य।
प्राणहरण अर्थात् प्राणों का हरण अथवा वध।
वाराही अर्थात् दण्डिनी अथवा दण्डनाथा नाम से प्रसिद्ध देवी वाराही।
वीर्य अर्थात् शौर्य, पराक्रम और युद्ध-सामर्थ्य।
नन्दिता अर्थात् आनन्दित अथवा प्रसन्न हुईं।
सम्पूर्ण प्रत्यक्ष अर्थ: विशुक्र का वध करने वाली वाराही देवी के पराक्रम से आनन्दित श्रीललिताम्बिका।

भास्कररायीय अर्थ

भास्करराय मखिन् इस नाम का सरल और प्रसंगानुकूल निर्वचन करते हैं। उनके अनुसार विशुक्र नामक दैत्य के प्राणों का हरण करने वाली दण्डिनी देवी वाराही के वीर्य अर्थात् शौर्य से भगवती नन्दित हुईं। इस व्याख्या में “हरण” का सम्बन्ध विशुक्र के प्राणहरण से, “वाराही” का सम्बन्ध दण्डिनी देवी से और “वीर्य” का अर्थ शौर्य से है।

अतः इस नाम का केन्द्र वाराही देवी की उपासना का स्वतन्त्र वर्णन नहीं, बल्कि श्रीललिताम्बिका की वह प्रसन्नता है जो अपनी ही दण्डनायिका शक्ति का विजयी पराक्रम देखकर प्रकट होती है। नाम का प्रधान विशेष्य “नन्दिता” है। भगवती किस कारण नन्दित हुईं, इसका उत्तर शेष समस्त पद देता है। वे विशुक्र के प्राणहरण में प्रकट वाराही के शौर्य से नन्दित हुईं।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि भगवती की शक्तियाँ उनसे सर्वथा पृथक् और स्वतन्त्र सत्ता नहीं हैं। श्रीललिताम्बिका की आज्ञा, ज्ञान, क्रिया और सामर्थ्य ही विविध देवी-रूपों में अभिव्यक्त होते हैं। इसलिए वाराही की विजय वस्तुतः पराशक्ति की ही विजय है, यद्यपि सहस्रनाम युद्ध-लीला की रमणीयता के लिए प्रत्येक शक्ति के विशिष्ट कार्य और पराक्रम को पृथक् रूप से सम्मानित करता है।

ललितोपाख्यान का युद्ध-प्रसंग

भण्डासुर के साथ युद्ध में श्रीललिताम्बिका के पक्ष की शक्ति-सेना सुव्यवस्थित रूप से कार्य करती है। मन्त्रिणी श्यामला और दण्डिनी वाराही इस दिव्य शासन-व्यवस्था की प्रमुख शक्तियाँ हैं। विषङ्ग और विशुक्र भण्डासुर-पक्ष के महत्त्वपूर्ण योद्धा हैं। मन्त्रिणी अम्बा विषङ्ग का संहार करती हैं, जबकि वाराही देवी विशुक्र का वध करती हैं।

सहस्रनाम में इन दोनों घटनाओं का क्रम भी अर्थपूर्ण है। पहले कहा गया है कि श्रीललिताम्बिका मन्त्रिणी अम्बा द्वारा किए गए विषङ्ग-वध से तोषित हुईं। उसके तुरन्त पश्चात् वर्तमान नाम में कहा गया है कि वे वाराही के उस वीर्य से नन्दित हुईं जिसके द्वारा विशुक्र के प्राणों का हरण हुआ। इस प्रकार युद्ध में ज्ञानशक्ति और दण्डशक्ति दोनों अपनी-अपनी भूमिका पूर्ण करती हैं।

यहाँ “प्राणहरण” शब्द युद्ध की निर्णायक परिणति को प्रकट करता है। वाराही ने विशुक्र को केवल पराजित अथवा पीछे नहीं हटाया, बल्कि उसके प्राणों का हरण कर भण्डासुर की सैन्यशक्ति के एक प्रमुख आधार को समाप्त कर दिया। इसीलिए उनके पराक्रम के लिए “वीर्य” शब्द प्रयुक्त हुआ है।

दण्डिनी वाराही का स्थान

इसी युद्ध-वर्णन में पूर्वतः श्रीललिताम्बिका को “किरिचक्ररथारूढदण्डनाथापुरस्कृता” कहा गया है। वहाँ दण्डनाथा अपने किरिचक्र-रथ पर आरूढ़ होकर भगवती की सेना का नेतृत्व करती हैं। दण्डनाथा अथवा दण्डिनी ही वाराही देवी हैं। उनका पद देवी-साम्राज्य की दण्डशक्ति, सैन्यव्यवस्था और आज्ञापालन से सम्बन्धित है।

“दण्ड” को केवल दण्ड देने के सामान्य अर्थ तक सीमित नहीं करना चाहिए। शास्त्रीय शासन में दण्ड का प्रयोजन धर्म और मर्यादा की रक्षा, अव्यवस्था का निरोध तथा प्रजा का संरक्षण है। इसी प्रकार देवी वाराही का उग्र पराक्रम भी स्वेच्छाचारी क्रोध नहीं है। वह श्रीललिताम्बिका की आज्ञा के अधीन धर्मरक्षण और दुष्टनिग्रह के लिए प्रवृत्त शक्ति है।

वाराही के लिए सहस्रनाम में प्रयुक्त “वीर्य” शब्द उनके शारीरिक बल मात्र का बोधक नहीं है। यहाँ वह शत्रु के सम्मुख निर्भयता, कार्यसिद्धि की क्षमता, युद्धकौशल और भगवती की आज्ञा को पूर्ण करने वाले तेजस्वी शौर्य का द्योतक है। पराम्बा उसी आज्ञापालक पराक्रम से नन्दित होती हैं।

श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत

इस नाम का प्रत्यक्ष अर्थ विशुक्र-वध की शास्त्रीय घटना ही है। तथापि उपासना-दृष्टि से बाह्य देवासुर-संग्राम में अन्तःकरण के संघर्ष का संकेत भी ग्रहण किया जा सकता है। ऐसा संकेत प्रत्यक्ष नामार्थ का स्थान नहीं लेता, बल्कि साधक को उस अर्थ का अपने जीवन में स्मरण करने में सहायता देता है।

भास्करराय युद्ध से सम्बन्धित इन नामों के पक्षान्तर में आणव आदि मलों, विरुद्ध सङ्ग तथा विषयाभिलाष जैसी बन्धनकारी प्रवृत्तियों का संकेत भी करते हैं। इस दृष्टि से देवी की विविध शक्तियों द्वारा दैत्यों का वध अन्तःकरण में विद्यमान उन वृत्तियों के निरसन का द्योतक माना जा सकता है जो साधक को उसके चैतन्यस्वरूप से विमुख करती हैं।

इस तात्त्विक दृष्टि में वाराहीरूपी दण्डशक्ति साधक के भीतर मर्यादा, निग्रह और दृढ़ता का स्मरण कराती है। विषयों की ओर अनियन्त्रित प्रवृत्ति, गुरु-उपदेश की उपेक्षा, साधना में प्रमाद और नियमभङ्गरूपी वृत्तियाँ आध्यात्मिक बल को क्षीण करती हैं। इनके निरोध के लिए केवल बौद्धिक ज्ञान पर्याप्त नहीं होता। ज्ञान के साथ अनुशासन, सतत अभ्यास और आज्ञापालन भी आवश्यक होते हैं।

साधक के लिए यह स्मरणीय संकेत हो सकता है कि भगवती की कृपा कभी-कभी सौम्य आश्वासन के रूप में और कभी दण्डिनी शक्ति के रूप में कार्य करती है। दण्डिनी का कार्य साधक को भयभीत करना नहीं, बल्कि उसकी साधना को विघटित करने वाली वृत्तियों का निरोध करना है। उनका वीर्य अन्तःकरण को मर्यादा में स्थिर करने वाली भगवती की क्रियाशक्ति का प्रतीक समझा जा सकता है।

भगवती की नन्दिता अवस्था

इस नाम का अत्यन्त मधुर पक्ष “नन्दिता” पद में निहित है। पराशक्ति सर्वसमर्थ होने पर भी अपनी शक्तियों के पराक्रम को प्रेमपूर्वक स्वीकार करती हैं। बाला के विक्रम से वे नन्दित होती हैं, मन्त्रिणी के कार्य से तोषित होती हैं और वाराही के वीर्य से पुनः नन्दित होती हैं। देवी-सेना की प्रत्येक विजय उनके लिए अपनी ही शक्ति के सफल प्रकाश का उत्सव बन जाती है।

यह वर्णन श्रीललिताम्बिका के साम्राज्य में शक्ति और आज्ञा के अद्भुत सामञ्जस्य को दिखाता है। वाराही का पराक्रम भगवती की आज्ञा से उद्भूत है, किन्तु भगवती उस पराक्रम का गौरव वाराही को प्रदान करती हैं। इससे स्पष्ट होता है कि दिव्य व्यवस्था में प्रत्येक शक्ति का अपना मान, कार्य और स्थान है।

साधक के लिए संदेश

श्रीविद्या-साधना में श्रद्धा और भक्ति के साथ नियम तथा मर्यादा भी आवश्यक हैं। साधक जब गुरु-उपदिष्ट मार्ग में स्थिर रहता है, अपने आचरण को संयमित करता है और प्रमाद से सावधान रहता है, तब उसके भीतर भगवती की दण्डिनी शक्ति का अनुग्रह कार्य करता है। यह अनुशासन कठोर अहंकार नहीं, बल्कि देवी-चरणों में समर्पित जीवन की रक्षा करने वाली शक्ति है।

इस नाम के जप में साधक भगवती से प्रार्थना कर सकता है कि वाराही देवी का आज्ञापालक शौर्य उसके अन्तःकरण में भी दृढ़ता, संयम और धर्मनिष्ठा के रूप में प्रकट हो। वह ऐसी वृत्तियों से रक्षित रहे जो उसकी श्रद्धा को क्षीण करती हैं और साधना को विषयों की ओर बिखेर देती हैं।

साथ ही यह नाम साधक को स्मरण कराता है कि अन्तःकरण की किसी विजय को अपने अहंकार का फल न माने। जिस प्रकार वाराही का वीर्य अन्ततः श्रीललिताम्बिका की ही शक्ति का प्रकाश है, उसी प्रकार साधक में उत्पन्न संयम, विवेक और साधना-सामर्थ्य भी भगवती तथा गुरु के अनुग्रह से ही पुष्ट होते हैं। इस बोध से पराक्रम के साथ विनय और अनुशासन के साथ शरणागति बनी रहती है।

भाव-सार

“विशुक्रप्राणहरणवाराहीवीर्यनन्दिता” नाम का प्रत्यक्ष अर्थ है कि श्रीललिताम्बिका विशुक्र नामक दैत्य के प्राणों का हरण करने वाली दण्डिनी वाराही के शौर्य से आनन्दित हुईं। यह नाम देवी-साम्राज्य में वाराही की दण्डशक्ति, आज्ञापालन और निर्णायक पराक्रम का गौरव प्रकट करता है। उपासना-दृष्टि से यह साधक को स्मरण कराता है कि श्रद्धा की रक्षा के लिए संयम, मर्यादा और प्रमाद-विनाशक दृढ़ता आवश्यक हैं। साधक इस नाम में भगवती से प्रार्थना करता है कि उनका वाराहीरूपी अनुग्रह अन्तःकरण की बन्धनकारी वृत्तियों का निरोध करे और समस्त साधना देवी-चरणों में विनयपूर्वक समर्पित हो।

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...