प्रार्थना
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥
श्रीललितासहस्रनाम के युद्ध-वर्णन में अब संग्राम का एक नया चरण सामने आता है। महागणेश द्वारा विघ्नयन्त्र का भेदन हो जाने के बाद भण्डासुर स्वयं श्रीललिताम्बिका का सामना करता है और उन पर अपने शस्त्रास्त्र छोड़ता है। भगवती प्रत्येक आक्रमण के अनुरूप उसका प्रतिकार करती हैं। प्रस्तुत नाम देवी की इसी सजग, समर्थ और अचूक प्रत्युत्तर-शक्ति का वर्णन करता है।
पदच्छेद एवं प्रत्यक्ष अर्थ
भण्डासुरेन्द्र-निर्मुक्त-शस्त्र-प्रत्यस्त्र-वर्षिणी
भण्डासुरेन्द्र का अर्थ है असुरों का अधिपति भण्डासुर। यहाँ ‘इन्द्र’ पद श्रेष्ठता अथवा अधिपत्य का बोध कराता है। निर्मुक्त का अर्थ है छोड़ा हुआ, चलाया हुआ अथवा प्रक्षेपित किया हुआ। शस्त्र यहाँ युद्ध में प्रयुक्त आक्रमणकारी आयुध का द्योतक है। प्रत्यस्त्र वह अस्त्र है जो शत्रु द्वारा चलाए गए अस्त्र का प्रतिरोध, निष्प्रभावीकरण अथवा प्रत्युत्तर करता है। वर्षिणी का अर्थ है वर्षा करनेवाली अथवा प्रचुरता से बरसानेवाली।
समस्त पद का सम्बन्ध इस प्रकार ग्रहण किया जा सकता है: भण्डासुरेन्द्र द्वारा छोड़े गए शस्त्रों के विरुद्ध प्रत्यस्त्रों की वर्षा करनेवाली देवी। इसका प्रत्यक्ष अर्थ है कि युद्ध में भण्डासुर ने श्रीललिताम्बिका पर जो-जो शस्त्रास्त्र चलाए, भगवती ने उनके अनुरूप प्रभावशाली प्रत्यस्त्र छोड़कर प्रत्येक आक्रमण का प्रतिकार किया।
भास्कररायीय अर्थ
भास्करराय मखिन् की व्याख्या का मूल अभिप्राय युद्ध में देवी की प्रत्यस्त्र-वर्षा को स्पष्ट करना है। भण्डासुर श्रीललिताम्बिका के सम्मुख अनेक प्रकार के प्रहार करता है। पराम्बा प्रत्येक शत्रु-अस्त्र के अनुकूल उसका निवारण करनेवाला प्रत्यस्त्र प्रयुक्त करती हैं। यहाँ देवी का सामर्थ्य किसी एक प्रबल अस्त्र तक सीमित नहीं है। वे विरोधी की प्रत्येक चाल को जानती हैं और उसके स्वभाव के अनुसार उपयुक्त प्रतिकार प्रस्तुत करती हैं।
‘प्रत्यस्त्र’ शब्द इस नाम का विशेष बिन्दु है। यह सामान्य प्रत्याक्रमण मात्र नहीं, अपितु शत्रु-अस्त्र के प्रभाव को रोकने वाला समुचित उत्तर है। भण्डासुर के पास विविध मायिक और संहारक आयुध हैं, किन्तु उनमें से कोई भी भगवती के लिए अप्रत्याशित नहीं है। जिस प्रकार का अस्त्र सामने आता है, उसी के प्रतिरोध की शक्ति देवी से प्रकट होती है। अतः यह नाम उनके सर्वास्त्रविद्या-नैपुण्य, युद्ध-सजगता तथा अपराजेय प्रभुत्व को एक साथ अभिव्यक्त करता है।
ललितोपाख्यान में युद्ध-प्रसंग
इस प्रसंग से पहले भण्डासुर-पक्ष द्वारा निर्मित विघ्नयन्त्र ने शक्तिसेना के उत्साह और सक्रियता को अवरुद्ध करने का प्रयत्न किया था। श्रीललिताम्बिका की दृष्टि से प्रकट महागणेश ने उस यन्त्र का भेदन कर दिया। विघ्न दूर होने पर देवी की सेना पुनः संगठित होकर आगे बढ़ती है और संघर्ष सीधे भण्डासुर की ओर केन्द्रित हो जाता है।
अब युद्ध केवल सेनाओं के पारस्परिक प्रहार का रूप नहीं रहता। भण्डासुर स्वयं अपने विशिष्ट अस्त्रों के साथ सामने आता है। श्रीललिताम्बिका भी चक्रराजरथ पर आरूढ़ होकर युद्ध का संचालन करती हैं। भण्डासुर द्वारा छोड़े गए शस्त्रों के उत्तर में देवी प्रत्यस्त्रों की वर्षा करती हैं। इस पारस्परिक प्रयोग में दोनों पक्षों की अस्त्रविद्या दिखाई देती है, किन्तु भगवती की विशेषता यह है कि उनका कोई प्रत्युत्तर असंगत अथवा निष्फल नहीं होता।
युद्ध-कथा की दृष्टि से यह नाम देवी की प्रत्यक्ष क्रिया का वर्णन करता है। पूर्ववर्ती अनेक नामों में मन्त्रिणी, वाराही अथवा महागणेश जैसे देवी-सम्बद्ध पात्र प्रमुख कार्य करते हैं और श्रीललिताम्बिका उनके पराक्रम से प्रसन्न होती हैं। यहाँ प्रत्यस्त्र-वर्षा की कर्त्री स्वयं श्रीललिताम्बिका हैं। अतः दृश्य और अर्थ, दोनों में देवी को युद्ध की सक्रिय केन्द्रशक्ति के रूप में समझना आवश्यक है।
शस्त्र और प्रत्यस्त्र का भेद
भारतीय युद्ध-वाङ्मय में ‘शस्त्र’ और ‘अस्त्र’ शब्द कभी-कभी व्यापक अर्थ में परस्पर निकट प्रयुक्त होते हैं, फिर भी सामान्यतः हाथ में धारण करके चलाए जानेवाले आयुध को शस्त्र और मन्त्रित अथवा दूर तक प्रक्षेपित किए जानेवाले आयुध को अस्त्र कहा जाता है। प्रस्तुत समास में ‘प्रत्यस्त्र’ विशेषतः उस प्रतिरोधी आयुध का संकेत करता है जो सामने आए अस्त्र के प्रभाव को काटता या निष्फल करता है।
इसलिए नाम में वर्णित ‘वर्षा’ को साधारण बाणों की निरुद्देश्य बहुलता नहीं समझना चाहिए। भगवती का प्रत्येक प्रत्यस्त्र किसी विशिष्ट आक्रमण का सटीक उत्तर है। जहाँ भण्डासुर का प्रयत्न आघात पहुँचाना, भ्रम उत्पन्न करना अथवा युद्ध की दिशा बदलना है, वहाँ देवी का प्रत्युत्तर व्यवस्था, रक्षा और धर्मसम्मत विजय की पुनःस्थापना करता है। उनकी शक्ति वेगवान होने के साथ विवेकपूर्ण भी है।
श्रीललिताम्बिका की युद्धमूर्ति
इस नाम में भगवती का स्वरूप उग्र क्रोध से विकृत योद्धा का नहीं, अपितु पूर्ण नियन्त्रण से युक्त सार्वभौम सेनानायिका का है। वे शत्रु के प्रहारों से विचलित होकर उत्तर नहीं देतीं। उनका प्रत्युत्तर पूर्वज्ञान, समर्थता और अचूक निर्णय से उद्भूत है। युद्धभूमि की तीव्रता के मध्य भी उनका चित्त स्वाधीन और स्थिर रहता है।
‘वर्षिणी’ पद देवी की शक्ति की प्रचुरता भी प्रकट करता है। भण्डासुर चाहे जितने आयुध छोड़े, भगवती के पास उनका प्रतिकार करनेवाली शक्ति का अभाव नहीं होता। उनकी आयुध-सम्पदा बाहरी संग्रह पर निर्भर नहीं है। वे स्वयं समस्त शक्तियों की अधिष्ठात्री हैं। इसलिए आवश्यक प्रत्यस्त्र उनके संकल्प से यथासमय प्रकट होता है और विरोधी अस्त्र का प्रभाव समाप्त कर देता है।
श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत
उपासना-दृष्टि से यह युद्ध साधक के अन्तःकरण में उपस्थित विरोधी वृत्तियों का एक संयत संकेत बन सकता है, किन्तु यह अर्थ प्रत्यक्ष युद्ध-कथा का स्थान नहीं लेता। भण्डासुर द्वारा छोड़े गए विविध शस्त्र उन अनेक प्रकार के आवरणों की स्मृति करा सकते हैं जो सत्यबोध को बाधित करते हैं। कभी वे संशय के रूप में आते हैं, कभी अहंकार, प्रमाद, भय अथवा विपरीत धारणा के रूप में। प्रत्येक बाधा का उपचार एक ही प्रकार से नहीं होता।
प्रत्यस्त्र का तात्त्विक संकेत यही है कि उचित प्रतिकार वस्तु के वास्तविक स्वरूप को पहचानकर किया जाता है। अज्ञान का प्रत्युत्तर ज्ञान है, असंयम का प्रत्युत्तर मर्यादा, चित्त-विक्षेप का प्रत्युत्तर एकाग्रता और अहंता का प्रत्युत्तर समर्पण। इन साधनात्मक समतुल्यताओं को किसी गुप्त मन्त्र-विधान के रूप में नहीं, बल्कि उपासना से प्राप्त विवेक के सामान्य संकेत के रूप में ग्रहण करना चाहिए।
श्रीललिताम्बिका समस्त ज्ञान और क्रियाशक्ति की मूल अधिष्ठात्री हैं। उनकी शरण में साधक यह विश्वास रखता है कि जीवन में उठनेवाली प्रत्येक बाधा के लिए यथोचित धर्मसम्मत उत्तर सम्भव है। देवी का अनुग्रह केवल संकट के लोप में नहीं, उचित प्रत्युत्तर पहचानने की बुद्धि और उसे धारण करने की सामर्थ्य में भी अनुभव किया जाता है।
साधक के लिए संदेश
इस नाम का स्मरण साधक को प्रतिक्रिया और प्रत्युत्तर के अन्तर पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है। आवेशजनित प्रतिक्रिया प्रायः नये संघर्ष उत्पन्न करती है, जबकि विवेकपूर्ण प्रत्युत्तर परिस्थिति के स्वरूप को देखकर दिया जाता है। श्रीललिताम्बिका की प्रत्यस्त्र-वर्षा अनियन्त्रित आक्रामकता नहीं, धर्मरक्षा के लिए प्रयुक्त सन्तुलित सामर्थ्य है।
साधक पराम्बा से प्रार्थना कर सकता है कि विपरीत परिस्थितियों में उसका चित्त भय अथवा क्रोध से आच्छन्न न हो। उसे ऐसा विवेक प्राप्त हो जिससे वह असत्य का उत्तर सत्य से, कठोरता का उत्तर धैर्य से और भ्रम का उत्तर स्पष्ट बोध से दे सके। जहाँ दृढ़ता आवश्यक हो, वहाँ वह दुर्बल न पड़े; जहाँ संयम अपेक्षित हो, वहाँ उसका अहंकार उसे असंगत प्रतिकार की ओर न ले जाए।
देवी की शरणागति का अर्थ कर्म से पलायन नहीं है। वह उचित समय पर उचित साधन चुनने, धर्मसम्मत सीमा में रहने और परिणाम को भगवती को समर्पित करने का भाव है। भण्डासुर के शस्त्रों के सामने स्थिर श्रीललिताम्बिका साधक के लिए ऐसी ही निर्भय, विवेकसम्पन्न और मर्यादित शक्ति की आराध्य मूर्ति हैं।
भण्डासुरेन्द्र-निर्मुक्त-शस्त्र-प्रत्यस्त्र-वर्षिणी वह श्रीललिताम्बिका हैं जो भण्डासुर द्वारा छोड़े गए प्रत्येक शस्त्र का समुचित प्रत्यस्त्र द्वारा प्रतिकार करती हैं। वे युद्धभूमि में असीम आयुधशक्ति के साथ-साथ पूर्ण सजगता, स्थिरता और विवेक की अधिष्ठात्री हैं। उनका स्मरण साधक को यह प्रार्थना सिखाता है कि प्रत्येक विघ्न के सामने उसे आवेशपूर्ण प्रतिक्रिया नहीं, सत्य, मर्यादा और विवेक से युक्त उचित प्रत्युत्तर प्राप्त हो।
