प्रार्थना
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥
श्रीमद्वाग्भवकूटैकस्वरूपमुखपङ्कजा ॥३४॥
भण्डासुर और उसकी नगरी शून्यका के विनाश के पश्चात् ब्रह्मा, उपेन्द्र, महेन्द्र तथा अन्य देवताओं ने श्रीललिताम्बिका के अतुलनीय वैभव की स्तुति की। उसी विजय-प्रसंग के अनन्तर सहस्रनाम एक प्राचीन घटना का स्मरण कराता है। भगवान् शिव के तृतीय नेत्र से प्रकट अग्नि द्वारा भस्म किए गए कामदेव को देवी ने पुनर्जीवन प्रदान किया। इसीलिए वे हर-नेत्राग्नि-संदग्ध-काम-सञ्जीवनौषधिः कहलाती हैं।
पूर्ववर्ती नाम में देवी का संहारकारी और देवताओं द्वारा स्तुत पराक्रम प्रकट हुआ था। वर्तमान नाम उसी परमेश्वरी की जीवनदायिनी करुणा को सामने लाता है। वे अधर्म और आसुरी अहंकार का उन्मूलन करती हैं, किन्तु जगत् की व्यवस्था के लिए आवश्यक शक्ति को पुनः प्रतिष्ठित भी करती हैं। उनका सामर्थ्य केवल विनाश में नहीं, उचित समय पर जीवन, गति और प्रयोजन लौटाने में भी व्यक्त होता है।
पदच्छेद एवं प्रत्यक्ष अर्थ
हर-नेत्र-अग्नि-सन्दग्ध-काम-सञ्जीवन-औषधिः
हर से भगवान् शिव अभिप्रेत हैं। नेत्र यहाँ उनके तृतीय नेत्र का द्योतक है। अग्नि उस नेत्र से प्रकट दाहक तेज है। सन्दग्ध का अर्थ है पूर्णतः दग्ध अथवा भस्मीकृत। काम इस प्रसंग में कामदेव या मन्मथ का नाम है। सञ्जीवन का अर्थ है पुनः जीवित करना, और औषधि जीवन लौटाने वाली दिव्य औषधि है।
समस्त पद का सीधा अर्थ है: जो भगवान् शिव के तृतीय नेत्र की अग्नि से पूर्णतः दग्ध कामदेव के लिए पुनर्जीवन प्रदान करने वाली औषधि हैं।
व्याकरण की दृष्टि से पहले “हरस्य नेत्राग्निः” अर्थात् हर के नेत्र की अग्नि, फिर “हरनेत्राग्निना सन्दग्धः कामः” अर्थात् उस अग्नि द्वारा दग्ध कामदेव, और अन्त में “तस्य सञ्जीवनौषधिः” अर्थात् उसके पुनर्जीवन की औषधि, यह सम्बन्ध बनता है। “औषधि” शब्द यहाँ किसी सामान्य वनौषधि का बोधक नहीं है। स्वयं देवी का अनुग्रह ही मृतप्राय काम को जीवन देने वाली संजीवनी के रूप में कहा गया है।
भास्कररायीय अर्थ
आचार्य भास्करराय मखिन् सौभाग्यभास्कर में पहले इस नाम का प्रत्यक्ष अर्थ स्पष्ट करते हैं। भगवान् हर के तृतीय नेत्र में स्थित अग्नि से मन्मथ पूर्णतः भस्म हो गया था। उस कामदेव की जीवनदायिनी शक्ति स्वयं श्रीललिताम्बिका बनीं। अतः वे उसके लिए “जीवातु”, अर्थात् जीवन का आधार, और “सञ्जीवनौषधि”, अर्थात् पुनर्जीवन देने वाली औषधि हैं।
भास्करराय इस पुनर्जीवन को देवी के उस प्रभाव से सम्बद्ध करते हैं जिसके द्वारा अत्यन्त विरक्त भगवान् कामेश्वर भी उनकी ओर अभिमुख होते हैं। यहाँ देवी और कामेश्वर को परस्पर पृथक् या विरोधी शक्तियों के रूप में नहीं देखा गया है। परम शिव का निष्क्रिय प्रकाश और देवी की स्पन्दनमयी शक्ति अभिन्न हैं। जगत् की पुनः प्रवृत्ति देवी की इच्छा से और कामेश्वर की सम्मति से सम्पन्न होती है।
व्याख्याकार ब्रह्माण्डपुराण-परम्परा में स्मृत उस कथा का भी संकेत करते हैं जिसमें भण्डासुर-वध के पश्चात् ब्रह्मादि देवताओं की प्रार्थना पर ललिताम्बिका ने मन्मथ को पुनर्जीवित किया। इसके द्वारा देवी के मातृस्वरूप को समझाने के लिए वे एक सुन्दर न्याय प्रस्तुत करते हैं: पिता से तिरस्कृत अथवा दण्डित बालक को माता ही आश्वासन देती है। इस उपमा का प्रयोजन शिव और देवी में विरोध स्थापित करना नहीं, बल्कि देवी की आश्वासक मातृकरुणा को व्यक्त करना है। न्यायाधिष्ठित दाह के बाद भी उन्हीं की कृपा जीवन के उचित प्रयोजन को पुनः प्रतिष्ठित करती है।
कामदहन और पुनर्जीवन का प्रसंग
कामदेव समस्त प्राणियों में आकर्षण, मिलन और सृष्टि की प्रवृत्ति उत्पन्न करने वाले देवता माने जाते हैं। देवकार्य की सिद्धि के लिए उन्होंने समाधिस्थ भगवान् शिव के चित्त में पार्वती के प्रति अनुराग जगाने का प्रयास किया। शिव की तपःसमाधि में इस असमय हस्तक्षेप से उनका तृतीय नेत्र खुला और उसके प्रचण्ड तेज से कामदेव भस्म हो गए।
इस घटना का प्रथम और प्रत्यक्ष आशय मर्यादा का है। इच्छा चाहे जगत् के संचालन में आवश्यक क्यों न हो, वह परम ज्ञान और तप के ऊपर स्वेच्छाचारी अधिकार नहीं रखती। जब इच्छा विवेक के अधीन न रहकर उसे विचलित करने का प्रयास करती है, तब शिव का ज्ञानाग्नि-स्वरूप तेज उसे दग्ध कर देता है। इसलिए कामदहन को केवल क्रोध की घटना मानना पर्याप्त नहीं है। यह अनियन्त्रित प्रेरणा पर दिव्य ज्ञान की निर्णायक प्रभुता का उद्घोष भी है।
परन्तु काम का सर्वथा अभाव भी प्रकट जगत् की गति को रोक देता। सृष्टि, परिवार, उत्तरदायित्व और लोकव्यवस्था में उचित इच्छा का अपना स्थान है। अतः देवी काम को उसी अपरिष्कृत स्थिति में वापस नहीं लातीं जिसमें वह शिव की समाधि भंग करने चला था। उनका अनुग्रह दग्ध और अनुशासित काम को पुनः जगत् के कल्याणकारी प्रयोजन से जोड़ता है। इस प्रकार पुनर्जीवन दण्ड का निषेध नहीं, दण्ड द्वारा हुए शोधन की पूर्णता है।
भण्डासुर-वध के बाद कामदेव का पुनरुद्धार
सहस्रनाम में इस नाम का स्थान अत्यन्त अर्थपूर्ण है। पहले देवी कामेश्वरास्त्र से भण्डासुर और शून्यका का विनाश करती हैं। फिर ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र और अन्य देवता उनके वैभव की स्तुति करते हैं। इसके तुरन्त बाद कामदेव के पुनर्जीवन का नाम आता है। अतः यहाँ घटनाक्रम संहार से पुनर्स्थापन की ओर बढ़ता है।
भण्डासुर का उदय कामदेव के दग्ध अवशेषों से सम्बद्ध पुराण-कथा में वर्णित है। इस दृष्टि से भण्डासुर उस विकृत अवशेष का प्रतिनिधि है जिसमें जीवनदायी प्रेम, मर्यादा और सौन्दर्य का अभाव है, पर अधिकार और दुराग्रह विद्यमान हैं। देवी पहले उस आसुरी विकृति का नाश करती हैं। उसके बाद वे काम की शुद्ध, सृष्टिसहायक शक्ति को पुनः जीवन देती हैं। यह क्रम बताता है कि श्रीललिता केवल निषेध नहीं करतीं; वे विकृति हटाकर तत्त्व की शुद्ध व्यवस्था पुनर्स्थापित करती हैं।
यही कारण है कि कामदेव का पुनर्जीवन भण्डासुर-वध के बाद स्मृत होता है। जब तक काम का आसुरी परिणाम भण्डासुर के रूप में विद्यमान है, तब तक उसका शुद्ध पुनर्संस्थापन पूर्ण नहीं माना जा सकता। देवी पहले अनधिकार, जड़ अहंकार और देवविरोधी प्रवृत्ति को समाप्त करती हैं; तत्पश्चात् प्रेम, आकर्षण और सृजन की मर्यादित शक्ति को पुनः लोकहित में प्रवृत्त करती हैं।
“सञ्जीवनौषधि” का विशिष्ट भाव
इस नाम में देवी को केवल “जीवन देने वाली” न कहकर “सञ्जीवनौषधि” कहा गया है। औषधि रोग की प्रकृति के अनुसार कार्य करती है। वह न तो रोग को पुष्ट करती है, न शरीर की स्वाभाविक शक्ति का नाश करती है। वह विकार का शमन करके जीवन को उसके स्वस्थ क्रम में लौटाती है। उसी प्रकार श्रीललिताम्बिका की कृपा इच्छा को उच्छृंखल वासना के रूप में नहीं जगाती; वह उसे धर्म, प्रेम, सृजन और कल्याण की दिशा में पुनः प्रतिष्ठित करती है।
कामदेव का जीवन देवी से प्राप्त होता है, अतः काम की शक्ति स्वतन्त्र और परम नहीं है। उसका अस्तित्व पराशक्ति के शासन में है। जब वह मर्यादा से विचलित होता है, शिवतेज उसे दग्ध करता है; जब वह जगत् की व्यवस्था के लिए आवश्यक होता है, देवी उसे जीवन प्रदान करती हैं। ज्ञान और इच्छा का यह सम्बन्ध विरोध का नहीं, परस्पर नियमन का है। ज्ञान दिशा देता है और शुद्ध इच्छा उस दिशा में गति प्रदान करती है।
श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत
तात्त्विक दृष्टि से शिव शुद्ध प्रकाश, अचल साक्षित्व और परम ज्ञान के द्योतक हैं; शक्ति उसी चेतना की विमर्शमयी, इच्छामयी और क्रियामयी अभिव्यक्ति हैं। केवल इच्छा, जब अपने मूल ज्ञान से विच्छिन्न प्रतीत होती है, बन्धन का कारण बनती है। वही इच्छा जब देवी के अधीन होकर अपने दिव्य स्रोत से पुनः जुड़ती है, जगत् की सुव्यवस्थित अभिव्यक्ति का साधन बनती है।
अतः इस नाम का संकेत इच्छा के पूर्ण उन्मूलन की ओर नहीं, उसके दिव्य संस्कार की ओर है। साधना का लक्ष्य मनुष्य को जड़, उदासीन अथवा कर्तव्यविमुख बनाना नहीं है। लक्ष्य यह है कि उसकी इच्छाएँ विवेक से प्रकाशित हों, धर्म के भीतर रहें और अन्ततः भगवती को समर्पित हो जाएँ। देवी की कृपा से इच्छा स्वामिनी न रहकर साधन बनती है।
यहाँ “काम” को केवल लौकिक आकर्षण तक सीमित करना भी नाम की व्यापकता को घटा देगा। इच्छा का सूक्ष्म रूप किसी श्रेष्ठ कार्य की आकांक्षा, ज्ञान की खोज, सेवा की प्रेरणा और भगवद्प्राप्ति की अभिलाषा में भी उपस्थित होता है। परन्तु इनका शोधन आवश्यक है। अहंकार, अधैर्य और स्वार्थ से दग्ध या विकृत संकल्प को देवी पुनः प्राणवान् कर सकती हैं, किन्तु उनका अनुग्रह उसे शुद्ध प्रयोजन से जोड़ता है। यह साधनात्मक संकेत है; इसे नाम के प्रत्यक्ष पुराणार्थ का विकल्प नहीं समझना चाहिए।
साधक के लिए संदेश
साधक के जीवन में कभी-कभी किसी उचित संकल्प की शक्ति क्षीण हो जाती है। असफलता, अपराधबोध, कठोर आत्मनिर्णय अथवा अनुशासनहीन इच्छा के परिणामस्वरूप मन उत्साहहीन हो सकता है। यह नाम स्मरण कराता है कि भगवती की करुणा केवल दोषों को क्षमा करने तक सीमित नहीं है। वे शुद्ध संकल्प को पुनर्जीवन देने वाली माता हैं।
उनकी उपासना में साधक अपनी प्रत्येक इच्छा की सिद्धि का आग्रह न रखे। वह यह प्रार्थना करे कि जो कामना अहंकार और अविवेक से उत्पन्न हुई है, वह ज्ञानाग्नि में शुद्ध हो; और जो संकल्प धर्म, सेवा तथा आत्मोन्नति के लिए आवश्यक है, उसे देवी जीवन, स्थिरता और उचित दिशा प्रदान करें। इस प्रकार नाम का जप इच्छा-वृद्धि का साधन नहीं, इच्छा-परिष्कार की प्रार्थना बनता है।
श्रीललिताम्बिका माता के समान दण्ड के बाद आश्वासन, विराम के बाद गति और दाह के बाद नवजीवन प्रदान करती हैं। उनका अनुग्रह यह सिखाता है कि जीवन में अनुशासन और करुणा दोनों आवश्यक हैं। केवल दमन से अन्तःकरण स्वस्थ नहीं होता और केवल अनियन्त्रित स्वीकृति से उसका कल्याण नहीं होता। देवी का मार्ग शोधन, संरक्षण और पुनर्स्थापन का समन्वित मार्ग है।
श्रीललिता हर-नेत्राग्नि-संदग्ध-काम-सञ्जीवनौषधिः हैं। वे शिव के ज्ञानाग्नि से भस्म हुए कामदेव को देवताओं की प्रार्थना पर पुनर्जीवन प्रदान करती हैं। इस नाम में उनकी मातृकरुणा, कामेश्वर पर उनका सहज प्रभाव और जगत् की व्यवस्था को पुनः गति देने वाला सामर्थ्य प्रकट होता है। वे विकृत इच्छा को संरक्षण नहीं देतीं; पहले उसका शोधन करती हैं और फिर शुद्ध प्रेम, धर्मानुकूल कामना तथा सृजनशील संकल्प को जीवन प्रदान करती हैं।
