प्रार्थना
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥
भण्डासुर और उसकी राजधानी शून्यक के विनाश के साथ देवकार्य की एक महत्त्वपूर्ण अवस्था पूर्ण होती है। अब युद्धभूमि में शस्त्रों का संघर्ष शांत हो चुका है। जिन देवताओं की शक्तियाँ भण्डासुर के अत्याचार से बाधित थीं, वे भगवती की विजय और उनके अद्वितीय पराक्रम का साक्षात्कार करते हैं। ब्रह्मा, उपेन्द्र, महेन्द्र तथा अन्य देवगण उनके वैभव की सम्यक् स्तुति करते हैं। इसी विजय-अभिनन्दन और उसके गम्भीर तात्त्विक आशय को यह नाम प्रकट करता है।
पदच्छेद एवं प्रत्यक्ष अर्थ
ब्रह्म-उपेन्द्र-महेन्द्र-आदि-देव-संस्तुत-वैभवा
ब्रह्म से यहाँ सृष्टिकर्ता ब्रह्मा अभिप्रेत हैं। उपेन्द्र भगवान् विष्णु का प्रसिद्ध नाम है। वामनरूप में अदिति के पुत्र और इन्द्र के अनुज होने के कारण विष्णु उपेन्द्र कहलाते हैं। महेन्द्र का अर्थ देवराज इन्द्र है। आदि पद से अन्य देवताओं का ग्रहण होता है। देव पद उन प्रकाशस्वरूप दिव्य शक्तियों का द्योतक है जो जगत्-व्यवस्था के विविध कार्यों का निर्वाह करती हैं।
संस्तुत में ‘सम्’ उपसर्ग स्तुति की पूर्णता, सम्यकता और आदरपूर्ण अभिव्यक्ति सूचित करता है। अतः इसका अर्थ है ‘भली प्रकार स्तुत’ अथवा ‘सम्यक् रूप से प्रशंसित’। वैभव का अर्थ प्रभाव, महिमा, ऐश्वर्य, व्यापक शक्ति और असाधारण पराक्रम है। ‘वैभवा’ स्त्रीलिङ्ग पद है और उस भगवती का बोध कराता है जिनका वैभव देवताओं द्वारा स्तुत है।
सम्पूर्ण नाम का प्रत्यक्ष अर्थ है: “जिनके महिमामय पराक्रम की ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र तथा अन्य देवताओं ने सम्यक् स्तुति की है, वे श्रीललिताम्बिका।”
भास्कररायीय अर्थ
भास्करराय मखिन् इस नाम को पूर्ववर्ती युद्ध-प्रसंग की स्वाभाविक परिणति के रूप में ग्रहण करते हैं। श्रीललिताम्बिका ने देवताओं का कार्य सम्पन्न किया और भण्डासुर का संहार किया। उस विजय से सन्तुष्ट देवताओं ने पुनः उनकी स्तुति की। इस प्रकार ‘वैभव’ का प्रथम अर्थ देवी का वह प्रकट पराक्रम है जिसके द्वारा दैवी व्यवस्था को बाधित करने वाली आसुरी सत्ता का अन्त हुआ। ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र जैसे उच्च पदस्थ देवता भी उस पराक्रम के स्तोता हैं, क्योंकि भगवती का सामर्थ्य उनकी पृथक-पृथक शक्तियों का मूलाधार है।
सौभाग्यभास्कर में उद्धृत ललितोपाख्यान के प्रसंगानुसार, भण्डासुर के संहार से हर्षित देवगण ब्रह्मा और विष्णु को आगे करके देवी की सेवा तथा स्तुति के लिए उपस्थित हुए। अतः यह नाम किसी सामान्य प्रशंसा का सूचक नहीं है। देवताओं ने उस प्रत्यक्ष घटना का दर्शन किया था जिसमें पराम्बा ने देवकार्य को पूर्ण करके उनकी शक्तियों को पुनः निर्बाध बनाया। उनकी स्तुति कृतज्ञता, विस्मय और देवी के सर्वोच्च आधिपत्य की स्वीकृति है।
भास्करराय एक गूढ़ वैकल्पिक अर्थ की ओर भी संकेत करते हैं। ‘वैभव’ को भगवती का विभुत्व, अर्थात् सर्वव्यापकता; अपरिच्छिन्नत्व, अर्थात् देश, काल और वस्तु की सीमाओं से रहित होना; तथा सर्वात्मत्व, अर्थात् सबके अन्तरात्मा के रूप में विद्यमान होना माना जा सकता है। इस पक्ष में देवी का वैभव युद्ध में व्यक्त किसी एक शक्ति तक सीमित नहीं रहता। वह समस्त देवताओं और सम्पूर्ण विश्व में अनुस्यूत परम चैतन्य का अनन्त विस्तार है। देवता उनकी स्तुति करते हुए उसी मूल सत्ता को स्वीकार करते हैं जिससे उन्हें स्वयं अपना अस्तित्व और कार्यशक्ति प्राप्त है।
विजय के उपरान्त देवताओं की स्तुति
इस नाम का शास्त्रीय प्रसंग भण्डासुर-वध के तुरन्त बाद का है। भण्डासुर ने देवताओं की सामर्थ्य और जगत् की धर्मसम्मत व्यवस्था को बाधित कर दिया था। उसके विरुद्ध युद्ध में शक्तिसेना की विभिन्न देवियों ने अपने-अपने उत्तरदायित्व पूरे किए, किन्तु निर्णायक संहार श्रीललिताम्बिका के कामेश्वरास्त्र से सम्पन्न हुआ। भण्डासुर के साथ शून्यक नगरी के नष्ट हो जाने पर देवताओं के सामने देवी का देवकार्यसमुद्यता-स्वरूप पूर्णतः प्रकट हुआ।
ब्रह्मा सृष्टि के अधिष्ठाता, विष्णु स्थिति के अधिष्ठाता और इन्द्र देवसमुदाय के नायक माने जाते हैं। फिर भी इस प्रसंग में वे विजेता नहीं, स्तोता हैं। यह व्यवस्था श्रीललिताम्बिका की सार्वभौम अधिष्ठात्री सत्ता को स्पष्ट करती है। देवताओं के विशिष्ट कार्य, पद और शक्तियाँ स्वतन्त्र परम सत्ताएँ नहीं हैं। वे पराशक्ति द्वारा समर्थित विश्वव्यवस्था के अंग हैं। जब उस व्यवस्था पर संकट आता है, तब वही पराशक्ति उसके संरक्षण के लिए प्रत्यक्ष होती हैं।
देवताओं की स्तुति का एक भाव कृतज्ञता है। वे उस अवरोध से मुक्त हुए जिसके कारण उनका स्वधर्म बाधित था। दूसरा भाव देवी के पराक्रम का अभिनन्दन है। तीसरा और अधिक गम्भीर भाव पहचान का है: युद्ध में व्यक्त हुई शक्ति वही मूल शक्ति है जो सृष्टि, स्थिति और देवताओं की समस्त क्रियाशीलता में पहले से विद्यमान थी। इसलिए स्तुति बाहरी विजयोत्सव होते हुए भी अन्ततः अपने ही परम आधार की वन्दना बन जाती है।
‘वैभव’ का व्यापक अभिप्राय
सामान्य भाषा में वैभव का सम्बन्ध सम्पत्ति, राजसी शोभा अथवा बाहरी ऐश्वर्य से जोड़ा जाता है। इस नाम में उसका अर्थ अधिक व्यापक है। देवी का वैभव उनके सिंहासन, आभूषण या दिव्य आयुधों तक सीमित नहीं है। यहाँ वैभव उस समर्थ सत्ता का नाम है जो आवश्यकता के अनुसार सृष्टि की रक्षा करती है, अधर्मजनित अवरोध का अन्त करती है और प्रत्येक देवशक्ति को उसका उचित कार्य करने की क्षमता देती है।
पराक्रम इस वैभव का दृश्य पक्ष है। विभुत्व इसका तात्त्विक पक्ष है। पराक्रम विशेष घटना में व्यक्त होता है, जबकि विभुत्व सर्वत्र और सदैव विद्यमान रहता है। भण्डासुर-वध में वही अनन्त शक्ति एक निश्चित कार्य के रूप में दिखाई दी। देवताओं ने घटना के रूप में उसके पराक्रम को देखा और स्तुति के द्वारा उसके अपरिमित स्रोत को प्रणाम किया। इसीलिए प्रत्यक्ष नामार्थ और भास्करराय द्वारा निर्दिष्ट गूढ़ अर्थ परस्पर विरोधी नहीं हैं। दृश्य विजय अदृश्य सर्वव्यापकता की अभिव्यक्ति है।
श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत
उपासना-दृष्टि से देवताओं को चैतन्य की विविध कार्यशक्तियों के रूप में समझा जा सकता है। ब्रह्मा में सृजन, विष्णु में धारण और इन्द्र में नियमन तथा नेतृत्व की शक्ति व्यक्त होती है। ये सभी शक्तियाँ जिस परम आधार से प्रकाशित होती हैं, श्रीललिताम्बिका उसी पराशक्ति की अधिष्ठात्री हैं। इसलिए देवताओं द्वारा उनकी स्तुति का भाव यह है कि प्रत्येक विशिष्ट सामर्थ्य अपने सार्वभौम स्रोत को पहचान रहा है।
‘संस्तुत’ का भाव वाणी से की गई प्रशंसा तक सीमित नहीं समझना चाहिए। सच्ची स्तुति में बुद्धि देवी की महिमा को स्वीकार करती है, हृदय उनके प्रति श्रद्धा से नम्र होता है और कर्म उनके द्वारा स्थापित धर्मसम्मत व्यवस्था के अनुकूल बनता है। जब साधक अपनी योग्यता, ज्ञान या उपलब्धि को स्वतन्त्र अहंकार की सम्पत्ति न मानकर भगवती के अनुग्रह का अंश समझता है, तब उसका जीवन भी मौन स्तुति का रूप ग्रहण करने लगता है।
यह एक तात्त्विक संकेत के रूप में ग्रहण किया जा सकता है कि देवी का वास्तविक वैभव किसी एक स्थान पर केन्द्रित बाहरी तेज नहीं, बल्कि समस्त सत्ता में व्याप्त चैतन्य है। वह देवताओं में देवशक्ति, साधक में चेतना, बुद्धि में प्रकाश और धर्ममय कर्म में सामर्थ्य बनकर उपस्थित है। श्रीविद्या की मर्यादा में इस सर्वात्मभाव का स्मरण साधक को भेदों के भीतर विद्यमान एक परम आधार की ओर उन्मुख करता है।
साधक के लिए संदेश
यह नाम साधक को कृतज्ञ दृष्टि प्रदान करता है। जीवन में जब कोई कठिन अवरोध दूर होता है, तब सफलता को केवल अपने पुरुषार्थ का परिणाम मान लेने के स्थान पर उस अदृश्य अनुग्रह का स्मरण करना उचित है जिसने बुद्धि, अवसर, साहस और सहायक शक्तियाँ प्रदान कीं। देवताओं के समान साधक भी अपनी सामर्थ्य के मूल में स्थित भगवती को प्रणाम कर सकता है।
इस नाम का स्मरण अहंकार को विनीत करता है। ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र जैसे देवता भी पराम्बा के वैभव के सम्मुख स्तोता बनकर उपस्थित होते हैं। तब सीमित मनुष्य के लिए अपनी उपलब्धियों पर गर्व करने का स्थान कहाँ रह जाता है? विनय का अर्थ अपनी शक्ति का निषेध नहीं, उसके स्रोत का सत्य ज्ञान है। भगवती की कृपा से प्राप्त सामर्थ्य का उपयोग धर्म, सेवा और लोकहित के लिए करना ही उस कृपा के प्रति सार्थक कृतज्ञता है।
साधक की प्रार्थना हो सकती है: हे श्रीललिताम्बिके, मेरे भीतर जो भी शुभ बुद्धि, सामर्थ्य और सद्भाव प्रकट हो, उसे मैं आपका प्रसाद समझूँ। सफलता मुझे अभिमानी न बनाए और संकट मुझे आपके आश्रय से विमुख न करे। मेरी वाणी आपकी स्तुति करे, मेरा अन्तःकरण आपके सर्वव्यापक वैभव का स्मरण रखे और मेरे कर्म आपकी धर्ममयी व्यवस्था के अनुकूल हों।
ब्रह्मोपेन्द्र-महेन्द्रादि-देव-संस्तुत-वैभवा वे श्रीललिताम्बिका हैं जिनके विजयी पराक्रम की ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र और अन्य देवताओं ने स्तुति की। उनका वैभव भण्डासुर-वध में प्रकट सामर्थ्य भी है और समस्त देवताओं तथा प्राणियों में व्याप्त अपरिच्छिन्न चैतन्य भी। यह नाम साधक को स्मरण कराता है कि प्रत्येक शुभ शक्ति का परम स्रोत पराम्बा हैं; अतः उपलब्धि का उचित उत्तर अहंकार नहीं, कृतज्ञता, विनय और स्तुति है।
