बुधवार, 12 अगस्त 2026

90.कुलामृतैक-रसिका - कुलामृतैकरसिकायै नमः

कुलामृतैक-रसिका

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

मूलमन्त्रात्मिका मूलकूटत्रयकलेरा ।
कुलामृतैकरसिका कुलसंकेतपालिनी ॥३६॥

श्रीललितासहस्रनाम के पूर्ववर्ती नामों में भगवती के मन्त्रात्मक सूक्ष्म स्वरूप का निरूपण हुआ है। अब कुलामृतैक-रसिका नाम से वर्णन साधक के पिण्ड में स्थित देवी के कुण्डलिनी-स्वरूप की ओर मुड़ता है। यहाँ ‘कुल’, ‘अमृत’ और ‘रसिका’ तीनों पद विशिष्ट श्रीविद्यात्मक अर्थ रखते हैं। अतः इस नाम को साधारणतः किसी दिव्य पेय के आस्वादन का वर्णन मानना पर्याप्त नहीं है। सौभाग्यभास्कर में इसके पीछे ज्ञान की त्रिपुटी, आधारचक्र, सुषुम्णा और सहस्रार से प्रवहमान अमृत की परस्पर सम्बद्ध व्याख्या दी गई है।

पदच्छेद एवं प्रत्यक्ष अर्थ

कुल + अमृत + एक + रसिका = कुलामृतैक-रसिका

कुल का सामान्य अर्थ सजातीय समूह है, किन्तु इस नाम के प्रसंग में यह एक तान्त्रिक पारिभाषिक शब्द भी है। अमृत का अर्थ अमरत्वदायक सुधा अथवा दिव्य रस है। एक यहाँ विशिष्टता और प्रधानता का बोध कराता है। रसिका अर्थात् जो किसी रस के आस्वादन में अनुरक्त अथवा विशेषतः अभिरुचि रखने वाली हों।

समस्त पद का सीधा अर्थ है: जो कुलामृत के आस्वादन में विशेष अनुरक्त हैं, वे भगवती श्रीललिता कुलामृतैक-रसिका हैं। किन्तु ‘कुलामृत’ का वास्तविक आशय समझे बिना यह अर्थ अधूरा रहता है। स्वयं भास्करराय इस पद को कुण्डलिनी और सहस्रार से सम्बन्धित सूक्ष्म प्रक्रिया के सन्दर्भ में खोलते हैं।

भास्कररायीय अर्थ

सौभाग्यभास्कर में भास्करराय पहले ‘कुल’ को सजातीय समूह बताते हुए उसे ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान की त्रिपुटी से सम्बद्ध करते हैं (trinity of the knower, knowledge and the known)। किसी वस्तु के ज्ञान में जानने वाला, जानी जाने वाली वस्तु और उसे प्रकाशित करने वाला ज्ञान एक ही अनुभूति में सम्बद्ध होते हैं। इस त्रिपुटी का समूह ‘कुल’ कहलाता है। इस अर्थ से ‘कुल’ केवल वंश अथवा परिवार का पर्याय नहीं रहता, बल्कि अनुभव के उस क्षेत्र का द्योतक बनता है जिसमें ज्ञाता और जगत् का सम्बन्ध प्रकट होता है।

इसके बाद भाष्य एक अधिक प्रत्यक्ष योगिक अर्थ देता है। ‘कु’ को पृथ्वी-तत्त्व से सम्बद्ध करके जिस आधार में पृथ्वी-तत्त्व लीन होता है, उस आधारचक्र को ‘कुल’ कहा जाता है। उसके सम्बन्ध से सुषुम्णा-मार्ग भी लक्षणा से ‘कुल’ कहलाता है। इस आधार पर सहस्रार से प्रवाहित होने वाला अमृत कुलामृत है। भगवती उस अमृत-रस की मुख्य आस्वादिका हैं, इसलिए वे कुलामृतैक-रसिका कही जाती हैं।

भास्करराय इस नाम से ठीक पहले प्रसंग को और स्पष्ट करते हैं। वे देवी के कुण्डलिनी-स्वरूप का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि वे मूलाधार में स्थित होकर क्रमशः सूक्ष्म मार्ग से ऊपर सहस्रार तक पहुँचती हैं और वहाँ चन्द्रमण्डल से सम्बद्ध अमृत का स्राव होता है। वर्तमान नाम इसी आन्तरिक आध्यात्मिक प्रक्रिया के प्रारम्भिक संकेतों में से है। भाष्य में इसके आगे अधिक गूढ़ कौलार्थ भी आते हैं; यहाँ दीक्षा और सम्प्रदाय की मर्यादा के कारण केवल उस प्रकाशित तात्त्विक अर्थ तक सीमित रहना उचित है जो नाम के प्रत्यक्ष बोध के लिए आवश्यक है।

कुण्डलिनी-स्वरूप की ओर संक्रमण

सहस्रनाम की रचना-क्रम में यह नाम एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन-बिन्दु पर आता है। इससे पूर्व देवी के मन्त्रात्मक सूक्ष्म शरीर का संकेत है; इसके पश्चात् आने वाले नामों में ‘कुल’ से सम्बद्ध शब्दावली क्रमशः विकसित होती है और आगे मूलाधार, ग्रन्थियों, चक्रों तथा सहस्रार से सम्बद्ध नाम प्रकट होते हैं। अतः कुलामृतैक-रसिका को उसके आसपास के नामों से पृथक करके पढ़ने पर उसका पूर्ण आशय स्पष्ट नहीं होता।

भास्करराय इसी क्रम को पिण्डाण्ड में विद्यमान कुण्डलिनी-स्वरूप की व्याख्या से जोड़ते हैं। भगवती बाहर उपास्य परमदेवी हैं और वही साधक के अन्तःस्थित सूक्ष्म स्वरूप में भी प्रतिष्ठित हैं। सहस्रार से अमृत का प्रवाह इसी अन्तर्मुखी वर्णन का अंग है। यहाँ ‘अमृत’ भौतिक पेय नहीं, साधना-परम्परा की पारिभाषिक सुधा है। इसलिए इस नाम की गरिमा किसी चमत्कारपूर्ण दृश्य में नहीं, देवी के उस अन्तर्यामी स्वरूप में है जो चेतना और पिण्ड दोनों के भीतर प्रतिष्ठित माना गया है।

श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत

उपासना-दृष्टि से इस नाम का एक संयत तात्त्विक संकेत ग्रहण किया जा सकता है। ‘कुल’ यदि ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय की त्रिपुटी है, तो देवी उस सम्पूर्ण अनुभूति-क्षेत्र से पृथक कोई बाहरी सत्ता मात्र नहीं हैं। अनुभव को प्रकाशित करने वाली चैतन्य-सत्ता भी उन्हीं की अभिव्यक्ति के रूप में चिन्तित की जाती है। इसीलिए यहाँ बाह्य जगत् और अन्तःसाधना के बीच कठोर विभाजन नहीं रहता।

‘अमृत’ का संकेत भी साधक को विषयजन्य क्षणिक सुख से भिन्न आनन्द की ओर उन्मुख करता है। सहस्रार से सम्बद्ध सुधा की शास्त्रीय भाषा उस आनन्द का संकेत देती है जो अन्तर्मुखता, चैतन्य और देवी-स्मरण के क्षेत्र से सम्बन्धित है। इसे किसी शारीरिक अनुभूति की अनिवार्य अपेक्षा या साधना की सफलता का परीक्षण नहीं बनाना चाहिए। श्रीविद्या की गूढ़ साधनाएँ गुरु और दीक्षा की मर्यादा में आती हैं; सहस्रनाम का भक्तिपूर्वक स्मरण उनके गोपनीय विधान को उद्घाटित किए बिना भी अपने आप में अर्थपूर्ण है।

साधक के लिए संदेश

कुलामृतैक-रसिका का स्मरण साधक को यह भाव दे सकता है कि श्रीललिताम्बिका का निवास केवल किसी दूरस्थ दिव्य लोक में नहीं है। वही पराम्बा चेतना के अन्तरतम में भी उपास्य हैं। जब मन निरन्तर बाह्य विषयों में रस खोजता है, तब यह नाम अन्तर्मुख होने और अपने भीतर स्थित देवी-सान्निध्य को स्मरण करने की प्रेरणा देता है।

इस नाम के सम्मुख साधक की प्रार्थना सरल हो सकती है: “हे पराम्बे, मेरी रुचि को क्षणभंगुर आसक्तियों से उठाकर उस पवित्र अन्तर्मुखता की ओर ले चलिए जिसमें आपका स्मरण स्वयं मधुर हो जाए। मेरे ज्ञान, मेरे ज्ञेय और जानने वाले मेरे अहंभाव, इन सबके भीतर आपकी ही चैतन्य-उपस्थिति का स्मरण बना रहे।” ऐसी प्रार्थना नाम के तात्त्विक आशय को साधना की विनम्र दिशा में परिणत करती है, बिना किसी गूढ़ विधि का अतिक्रमण किए।

भाव-सार

कुलामृतैक-रसिका वे श्रीललिताम्बिका हैं जो ‘कुल’ से सम्बद्ध अमृत के रस में विशेष अनुरक्त हैं। भास्करराय ‘कुल’ को एक ओर ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय की त्रिपुटी और दूसरी ओर आधारचक्र तथा उससे सम्बद्ध सुषुम्णा के अर्थ में ग्रहण करते हैं; सहस्रार से प्रवहमान सुधा इसी कारण ‘कुलामृत’ कही जाती है। यह नाम भगवती के कुण्डलिनी-स्वरूप और अन्तःस्थित चैतन्यमयी सत्ता की ओर संकेत करते हुए साधक को श्रद्धापूर्वक अन्तर्मुख होने का निमन्त्रण देता है।

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...