प्रार्थना
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥
पूर्ववर्ती नामों में श्रीललिताम्बिका के मुख, कण्ठ से कटि तक के मध्यभाग और कटि के अधोभाग का तीन मन्त्र-कूटों के साथ क्रमशः सम्बन्ध बताया गया है। उसके पश्चात् मूलमन्त्रात्मिका नाम देवी को मूलमन्त्रस्वरूप घोषित करता है। प्रस्तुत नाम मूलकूटत्रय-कलेवरा इस विचार को समग्रता प्रदान करता है: भगवती का कलेवर मूलविद्या के तीनों कूटों से अभिन्न है। यहाँ देवी के दृश्य विग्रह और उनके मन्त्रस्वरूप को दो पृथक् वस्तुओं की तरह नहीं देखा गया; आराध्य स्वरूप स्वयं विद्यामय है।
पदच्छेद एवं प्रत्यक्ष अर्थ
मूल-कूट-त्रय-कलेवरा
मूल का सामान्य अर्थ है मूलभूत, आधारभूत अथवा प्रधान। इस प्रसंग में यह श्रीविद्यापरम्परा में प्रतिष्ठित मूलविद्या का सूचक है। कूट का अर्थ यहाँ समूह, विभाग अथवा सुव्यवस्थित खण्ड है। मन्त्र के अवयवों का विशिष्ट समूह कूट कहलाता है। त्रय का अर्थ है तीन का समूह। कलेवर शरीर, देह अथवा मूर्त स्वरूप का वाचक है।
समास का विग्रह इस प्रकार किया जा सकता है: मूलस्य कूटत्रयमेव कलेवरं यस्याः सा, अर्थात् जिनका कलेवर मूलविद्या के तीन कूटों से ही निर्मित अथवा अभिन्न माना गया है, वे श्रीललिता। यह बहुव्रीहि-प्रधान रचना देवी की उस विशेषता को प्रकट करती है जिसमें तीनों कूट उनके समग्र शरीर के रूप में प्रतिपादित हैं।
अतः नाम का प्रत्यक्ष अर्थ है: वे भगवती जिनका दिव्य कलेवर मूलविद्या के तीन कूटों का स्वरूप है।
भास्कररायीय अर्थ
भास्करराय मखिन् की व्याख्या में इस नाम का प्रथम आशय यही है कि मूलमन्त्र के तीन कूट देवी का कलेवर हैं। यहाँ कलेवर को स्थूल अथवा साकार रूप के अर्थ में भी ग्रहण किया जाता है। इस दृष्टि से उपासना में जिस दिव्य देह का ध्यान किया जाता है, उसके विभिन्न भाग मन्त्र के तीन विभागों से सम्बद्ध हैं। पूर्ववर्ती नामों में यह सम्बन्ध क्रमशः मुख, मध्यभाग और अधोभाग के द्वारा स्पष्ट किया गया था; प्रस्तुत नाम उन तीनों को एक अविभाज्य पूर्णता में समेटता है।
भाष्यपरम्परा इस अर्थ को केवल बाह्य विग्रह तक सीमित नहीं रखती। मूल शब्द से देवी के अधिक सूक्ष्म, कारणरूप स्वरूप का संकेत भी ग्रहण किया गया है। उस दशा में कूटत्रय उनके सूक्ष्म कलेवर के अवयव समझे जाते हैं। इससे स्थूल ध्यानमूर्ति और सूक्ष्म विद्यास्वरूप के मध्य सम्बन्ध स्थापित होता है। देवी का रूप मन्त्र का दृश्य प्रकाशन है और मन्त्र उनके रूप की शब्दमयी अभिव्यक्ति।
इस व्याख्या का महत्त्व इस बात में है कि यह मन्त्र को देवी से पृथक् कोई साधनमात्र नहीं मानती। साधन, साध्य और आराध्य के मध्य निकट अभेद का संकेत मिलता है। फिर भी यह विषय श्रीविद्या की दीक्षापरम्परा से सम्बद्ध है; अतः नाम का सार्वजनिक विवेचन उसके तत्त्वार्थ तक सीमित रहना चाहिए। मन्त्र के गोपनीय अक्षर-विन्यास, प्रयोग अथवा अनुष्ठान-विधि का उद्घाटन इस नाम को समझने के लिए आवश्यक नहीं है।
पूर्ववर्ती नामों से इसकी संगति
नाम ८५ श्रीमद्वाग्भवकूटैकस्वरूपमुखपङ्कजा में देवी का मुखपद्म प्रथम कूट के स्वरूप में वर्णित है। नाम ८६ कण्ठाधःकटिपर्यन्तमध्यकूटस्वरूपिणी कण्ठ के नीचे से कटि तक के भाग को मध्यकूट से सम्बद्ध करता है। नाम ८७ शक्तिकूटैकतापन्नकट्यधोभागधारिणी कटि के अधोभाग को शक्तिकूटस्वरूप बताता है। नाम ८८ मूलमन्त्रात्मिका घोषित करता है कि देवी मूलमन्त्र की आत्मा अथवा स्वयं उसका स्वरूप हैं।
इन सबके उपरान्त नाम ८९ एक समाहार-वाक्य के समान आता है। पहले तीन नामों में जो सम्बन्ध शरीर के पृथक् भागों द्वारा समझाया गया, वही यहाँ पूर्ण कलेवर के रूप में कहा गया है। इसका अभिप्राय यह नहीं कि देवी का दिव्य शरीर किसी भौतिक पदार्थ की भाँति अक्षरों से जोड़ा गया है। शास्त्रीय भाषा यहाँ रूप और मन्त्र की तात्त्विक एकता व्यक्त करती है। ध्यान में दर्शनगोचर भगवती और जप में श्रुतिगोचर विद्या, दोनों एक ही पराशक्ति के दो अनुभव-पक्ष हैं।
मन्त्र और देवता का अभेद
सामान्य व्यवहार में नाम और नामी में भेद दिखाई देता है। किसी व्यक्ति का नाम उच्चरित करने पर ध्वनि एक वस्तु होती है और वह व्यक्ति दूसरी। मन्त्रशास्त्र की दृष्टि इससे अधिक गहन है। वहाँ सिद्ध मन्त्र को देवता की चैतन्यमयी शब्ददेह माना जाता है। उसका उद्देश्य किसी अनुपस्थित देवता को केवल स्मरण कराना नहीं, बल्कि अनुशासित उपासना में आराध्य सत्ता की उपस्थिति को शब्दरूप से उपलब्ध कराना है।
मूलकूटत्रय-कलेवरा इसी सिद्धान्त को श्रीललिताम्बिका पर केन्द्रित करता है। उनका दिव्य सौन्दर्य, उनकी चैतन्यसत्ता और उनकी विद्या परस्पर असम्बद्ध नहीं हैं। मूर्ति अथवा ध्यानरूप साधक की दृष्टि को आधार देता है; मन्त्र श्रवण, वाणी और अन्तःकरण को उसी सत्ता की ओर एकाग्र करता है। दोनों का लक्ष्य भगवती की अखण्ड उपस्थिति है।
इसलिए इस नाम में कलेवर शब्द अत्यन्त सार्थक है। शरीर किसी जीव की पहचान का केवल बाहरी आवरण नहीं होता; उसके द्वारा ही वह संसार में अभिव्यक्त और पहचाना जाता है। उसी उपमा से कूटत्रय देवी की मन्त्रात्मक अभिव्यक्ति का कलेवर है। तथापि भगवती उस अभिव्यक्ति से सीमित नहीं होतीं। वे उसकी अधिष्ठात्री, उसकी चेतना और उसका परम आश्रय भी हैं।
स्थूल ध्यान और सूक्ष्म विद्यास्वरूप
इस नाम की व्याख्या में स्थूल और सूक्ष्म, दोनों स्तरों का स्मरण आवश्यक है। स्थूल का अर्थ यहाँ जड़ अथवा निम्न नहीं, बल्कि ध्यान के लिए स्पष्ट रूप से ग्रहणीय स्वरूप है। मुकुट, मुखपद्म, नेत्र, आभूषण, चार भुजाएँ, पाश, अङ्कुश, इक्षुधनुष और पुष्पबाणों से सम्पन्न श्रीललिता का ध्यानमय विग्रह साधक के भाव को एक निश्चित पवित्र केन्द्र प्रदान करता है।
सूक्ष्म स्तर पर वही देवी मन्त्रविद्या के रूप में अनुभूत होती हैं। वहाँ दृश्य अंगों के स्थान पर चैतन्यमयी शब्दरचना की प्रधानता है। पूर्ववर्ती नाम दोनों स्तरों को परस्पर अनुरूप बताते हैं और प्रस्तुत नाम उस अनुरूपता को अभेद की सीमा तक ले जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि श्रीविद्या में विग्रह-ध्यान और मन्त्र-उपासना विरोधी पद्धतियाँ नहीं हैं। वे एक ही देवी की रूपमयी और शब्दमयी उपलब्धियाँ हैं।
यह विवेचन किसी गुप्त मन्त्ररचना को सार्वजनिक रूप से समझाने का निमन्त्रण नहीं देता। नाम का तात्पर्य जानने के लिए इतना समझना पर्याप्त है कि परम्परा मूलविद्या को तीन सुव्यवस्थित कूटों में देखती है और उन तीनों की समष्टि को भगवती का कलेवर कहती है। इसके आगे का प्रयोगात्मक ज्ञान अधिकृत गुरु और दीक्षा की मर्यादा में ही ग्राह्य है।
श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत
उपासना-दृष्टि से यह नाम एकता में व्यवस्थित विविधता का संकेत देता है। तीन कूट पृथक् विभाग हैं, किन्तु उनकी समष्टि एक ही मूलविद्या है; उसी प्रकार देवी के मुख, मध्य और अधोभाग का भेद उनके एक कलेवर की अखण्डता को नष्ट नहीं करता। भेद व्यवस्था के लिए है, अन्तिम सत्य विभाजनरहित पूर्णता है।
इसे साधक अपने अनुभव के लिए भी एक संयत तात्त्विक संकेत के रूप में ग्रहण कर सकता है। उसकी वाणी, भावना और कर्म अलग-अलग दिशाओं में बिखरे रहें तो जीवन में आन्तरिक असंगति उत्पन्न होती है। जब वाणी सत्य के प्रति, भावना भगवती के प्रति और कर्म धर्म के प्रति समर्पित होते हैं, तब व्यक्तित्व में एक प्रकार की अखण्डता आती है। यह आधुनिक मनोवैज्ञानिक अर्थ नाम का प्रत्यक्ष भाष्य नहीं है, बल्कि उसके समाहार-भाव से प्राप्त साधनात्मक प्रेरणा है।
साथ ही यह नाम साधक को स्मरण कराता है कि पवित्र शब्द का सम्मान उसके अर्थ, उच्चारण और परम्परागत मर्यादा सहित होना चाहिए। मन्त्र को केवल ध्वनि, प्रदर्शन अथवा मनोवांछित फल प्राप्त करने का उपकरण मानना उसके देवतामय स्वरूप को संकुचित कर देता है। श्रद्धा का अर्थ है उसे भगवती की उपस्थिति के रूप में ग्रहण करना और उसके प्रति विनय रखना।
साधक के लिए संदेश
मूलकूटत्रय-कलेवरा नाम का स्मरण करते समय साधक पराम्बा से प्रार्थना कर सकता है कि उसकी वाणी शुद्ध हो, उसका अन्तःकरण एकाग्र हो और उसका आचरण आराधना के अनुकूल बने। भगवती की शब्दमयी और रूपमयी उपस्थिति के प्रति श्रद्धा जागे, परम्परा की गोपनीय मर्यादाओं का पालन हो और उपासना अहंकार के प्रदर्शन से सुरक्षित रहे।
देवी का कलेवर मूलविद्या से अभिन्न है, इसलिए उनके नाम का उच्चारण भी असावधानी का विषय नहीं है। शुद्धता का अर्थ केवल उच्चारण-कौशल नहीं, बल्कि विनम्र भाव, सत्यनिष्ठ जीवन और गुरु-परम्परा के प्रति आदर भी है। साधक जितना अपने को संयत करता है, उतना ही वह शब्द के भीतर स्थित मौन चैतन्य की ओर उन्मुख होता है।
इस नाम के समक्ष सर्वोत्तम भाव अधिकार का नहीं, शरणागति का है: “हे मातः, आपकी विद्यामयी देह का रहस्य मेरी बुद्धि की सीमा से परे है। मुझे इतना अनुग्रह दीजिए कि मैं आपके पवित्र नाम को श्रद्धापूर्वक ग्रहण करूँ, वाणी को कल्याणकारी बनाऊँ और जीवन को आपकी उपस्थिति के योग्य बनाने का प्रयत्न करता रहूँ।”
मूलकूटत्रय-कलेवरा वह श्रीललिताम्बिका हैं जिनका समग्र दिव्य कलेवर मूलविद्या के तीन कूटों का स्वरूप है। इस नाम में उनका ध्यानमय विग्रह और मन्त्रात्मक शब्ददेह एक ही चैतन्य की अभिव्यक्तियाँ माने गए हैं। साधक के लिए इसका सार है: पवित्र वाणी, परम्परा की मर्यादा, अन्तःकरण की एकाग्रता और भगवती के प्रति विनम्र शरणागति।
