प्रार्थना
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥
पूर्ववर्ती दो नामों में श्रीललिताम्बिका के मुखकमल को वाग्भव-कूट तथा कण्ठ से कटि तक के मध्यभाग को मध्य-कूट का स्वरूप कहा गया है। अब यह नाम उसी क्रम को पूर्ण करते हुए देवी के कटि से नीचे के भाग को शक्ति-कूट के साथ अभिन्न बताता है। यहाँ स्तोत्र का विषय केवल दिव्य सौन्दर्य का वर्णन नहीं है; वह श्रीललिता के दृश्य विग्रह और उनके मन्त्रस्वरूप के पारस्परिक अभेद को प्रकट कर रहा है।
पदच्छेद एवं प्रत्यक्ष अर्थ
शक्ति-कूट + एकता-आपन्न + कटि-अधोभाग + धारिणी
शक्ति-कूट श्रीविद्या के मूल मन्त्र का तृतीय विभाग है। एकता-आपन्न का अर्थ है, एकता को प्राप्त, अभिन्न हुआ अथवा भेदरहित रूप से तद्रूप हुआ। कट्यधोभाग का विग्रह है कटेः अधोभागः, अर्थात् कटि के नीचे का भाग। धारिणी का अर्थ है धारण करनेवाली।
सम्पूर्ण पद का व्याकरणिक आशय है: जो देवी शक्ति-कूट के साथ एकता को प्राप्त, उससे अभिन्न कटि-अधोभाग को धारण करती हैं। सरल शब्दों में, श्रीललिताम्बिका का कटि से नीचे का दिव्य शरीर शक्ति-कूटस्वरूप है। “एकता-आपन्न” पद इस अर्थ को विशेष दृढ़ता देता है। यहाँ केवल इतना नहीं कहा गया कि वह भाग शक्ति-कूट के समान है; उसे शक्ति-कूट के साथ अभिन्न बताया गया है।
इस नाम की रचना में “स्वरूपिणी” के स्थान पर “एकतापन्न” और “धारिणी” का प्रयोग भी ध्यान देने योग्य है। “एकतापन्न” उस अधोभाग की शक्ति-कूट के साथ प्राप्त अभिन्नता को बताता है, जबकि “धारिणी” सम्पूर्ण समास को देवी से जोड़ता है। अतः पद का केन्द्र केवल “शक्ति-कूट” शब्द नहीं, वह दिव्य अधोभाग है जो शक्ति-कूट से भिन्न नहीं रहा। यह व्याकरणिक सूक्ष्मता नाम के प्रत्यक्ष अर्थ को किसी सामान्य प्रतीक अथवा दूरस्थ समानता में बदलने से रोकती है।
भास्कररायीय अर्थ
सौभाग्यभास्कर में भास्करराय मखिन् इस नाम-समूह को देवी के सूक्ष्मरूप का निरूपण मानते हैं। स्थूल विग्रह और सूक्ष्म मन्त्ररूप को परस्पर पृथक् न रखकर वे सूक्ष्मरूप को स्थूलरूप से अभिन्न बताते हैं। इसी आधार पर मुख, मध्यभाग और कटि-अधोभाग को मन्त्र के तीन कूटों के रूप में समझाया गया है। वर्तमान नाम उस त्रिभागीय निरूपण के तृतीय अंश को व्यक्त करता है।
इस विशिष्ट नाम की व्याख्या करते हुए भास्करराय कहते हैं कि शक्ति नामक कूट चतुरक्षर-समुदाय है और “शक्ति” संज्ञा का सम्बन्ध उसके सर्जन-सामर्थ्य से है। देवी का कटि से नीचे का भाग उस शक्ति-कूट के साथ एकता, अर्थात् अभेद, को प्राप्त है। उनका विवेचन दो बातों को स्पष्ट करता है। प्रथम, शक्ति-कूट कोई बाहरी उपमा नहीं, देवी के सूक्ष्म मन्त्रस्वरूप का अंश है। द्वितीय, “शक्ति” यहाँ अस्पष्ट सामर्थ्य का सामान्य शब्द नहीं; वह सर्जन-शक्ति से युक्त, नियत मन्त्र-विभाग की शास्त्रीय संज्ञा है।
देवी-विग्रह और मन्त्रदेह का अभेद
सामान्य दृष्टि में शरीर दृश्य है और मन्त्र श्रव्य वर्णों का समुदाय। श्रीविद्या की इस नाम-त्रयी में दोनों के बीच की दूरी मिट जाती है। देवी का मुख एक कूट, कण्ठ से कटि तक का भाग दूसरा कूट और कटि से नीचे का भाग तीसरा कूट कहा गया है। इससे श्रीललिता का विग्रह मन्त्र का चित्रमय रूप और मन्त्र उनके विग्रह का ध्वनिमय रूप समझा जाता है। उपासना का आधार एक ही पराशक्ति है, जो रूप और शब्द दोनों में स्वयं को प्रकट करती हैं।
इस अभेद को समझते समय शारीरिक विभाजन को स्थूल नाप-जोख की तरह ग्रहण नहीं करना चाहिए। स्तोत्र देवी के अंगों को साधारण देह के अवयवों में सीमित नहीं करता; वह उनके दिव्य स्वरूप की मन्त्रात्मक व्यवस्था बताता है। अतः “कट्यधोभाग” का उल्लेख किसी लौकिक शरीर-वर्णन की उत्सुकता के लिए नहीं, मन्त्र के तृतीय कूट की देवता में प्रतिष्ठा दिखाने के लिए है। भगवती का सम्पूर्ण कलेवर पवित्र है और प्रत्येक विभाग उनके एक अखण्ड स्वरूप में ही अर्थवान है।
इस क्रम में “भाग” और “अखण्डता” विरोधी नहीं हैं। कूटों का त्रिविध विभाग शिक्षण और उपासना के लिए भेद प्रकट करता है, पर प्रत्येक कूट उसी एक पराम्बा का रूप है। जैसे एक ही दीप की ज्योति में प्रकाश के विभिन्न विस्तार देखे जा सकते हैं, वैसे ही देवी के मन्त्रदेह में विभाग हैं, किन्तु देवी स्वयं विभक्त नहीं होतीं। वर्तमान नाम तीसरे विभाग की विशिष्टता बताकर भी उसे पूर्ण श्रीललितास्वरूप से अलग नहीं करता।
शक्ति-कूट और सर्जन-सामर्थ्य
भास्करराय द्वारा उल्लिखित “सर्जन-शक्ति” इस नाम का महत्त्वपूर्ण संकेत है। सृष्टि का अर्थ यहाँ केवल किसी भौतिक वस्तु का निर्माण नहीं है। पराशक्ति से ही नाम, रूप, गति, क्रिया और अभिव्यक्ति की सम्भावना उदित होती है। शक्ति-कूट उस क्रियाशील सामर्थ्य का मन्त्रात्मक पक्ष है और देवी का अधोभाग उसी से अभिन्न कहा गया है। इसलिए यह नाम श्रीललिता को उस मूल सामर्थ्य के रूप में प्रतिष्ठित करता है जिसके बिना कोई अभिव्यक्ति आकार नहीं ले सकती।
फिर भी इस अर्थ को आधुनिक प्रतीकवाद में सीमित करना उचित नहीं होगा। प्रत्यक्ष नामार्थ पहले यही है कि भगवती का कटि-अधोभाग शक्ति-कूटस्वरूप है। सर्जन-सामर्थ्य उस शास्त्रीय पद की भास्कररायीय व्याख्या है, न कि मूल अर्थ के स्थान पर रखी गई कल्पना। इस भेद को बनाए रखने पर नाम का मन्त्रशास्त्रीय गौरव और उसका तात्त्विक संकेत दोनों सुरक्षित रहते हैं।
श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत
उपासना-दृष्टि से यह नाम स्मरण कराता है कि पराम्बा को केवल किसी एक दृश्य मूर्ति अथवा किसी एक उच्चरित शब्द में सीमित नहीं किया जा सकता। उनका रूप मन्त्र में है और मन्त्र उनके रूप में। दृश्य, श्रव्य और चिन्तित, ये तीनों उपासना के भिन्न द्वार हो सकते हैं, किन्तु आराध्या एक ही हैं। इसीलिए मन्त्रदेह की धारणा साधक को विग्रह के प्रति अधिक श्रद्धा और मन्त्र के प्रति अधिक सावधानी सिखाती है।
यह एक तात्त्विक संकेत के रूप में भी ग्रहण किया जा सकता है कि दिव्यता केवल ऊर्ध्व, सूक्ष्म या अमूर्त में ही नहीं है। देवी का कटि से नीचे का भाग भी उसी मन्त्रतत्त्व से अभिन्न है। इस प्रकार पवित्र और अपवित्र, ऊँचा और नीचा, आध्यात्मिक और भौतिक जैसे मन द्वारा बनाए गए कठोर भेद पराम्बा की अखण्ड सत्ता में शिथिल होते हैं। यह संकेत देह के प्रति आसक्ति नहीं बढ़ाता; वह देह को देवी की सत्ता से रहित जड़ वस्तु मानने की प्रवृत्ति को संयत करता है।
श्रीविद्या के मन्त्र-विन्यास और उसके आन्तरिक प्रयोग दीक्षा तथा गुरु-परम्परा के विषय हैं। इस नाम के सार्वजनिक अर्थ को समझने के लिए इतना जानना पर्याप्त है कि शक्ति-कूट मूल मन्त्र का तृतीय विभाग है और श्रीललिता का अधोभाग उससे अभिन्न कहा गया है। इससे आगे की साधना योग्य आचार्य के निर्देशन में ही ग्रहण की जाती है।
साधक के लिए संदेश
इस नाम का स्मरण साधक में समग्रता की भावना जगा सकता है। जीवन में ज्ञान, भावना और क्रिया अलग-अलग दिशाओं में बिखर जाएँ तो अन्तःकरण में असंगति उत्पन्न होती है। देवी का त्रिकूटात्मक मन्त्रदेह बताता है कि पूर्णता विभाजनों के निषेध से नहीं, उनके एक ही अधिष्ठान में समन्वय से आती है। विचार श्रद्धा से जुड़ें, श्रद्धा उचित कर्म में प्रकट हो और कर्म अहंकार के स्थान पर समर्पण से प्रेरित हो, यही इस नाम से ग्रहण की जा सकनेवाली संयत साधनात्मक प्रेरणा है।
साधक भगवती से प्रार्थना कर सकता है: “हे पराम्बे, मेरी क्रिया-शक्ति को अपने कल्याणमय संकल्प के अनुकूल कीजिए। मेरे कर्म बिखरे हुए आवेग से नहीं, शुद्ध विवेक और श्रद्धा से प्रवाहित हों। मैं अपने शरीर, वाणी और कर्म को आपका साधन समझूँ तथा प्रत्येक कार्य में आपकी पवित्र उपस्थिति का स्मरण रखूँ।” ऐसी प्रार्थना किसी गुप्त विधि का स्थान नहीं लेती; वह नाम के प्रत्यक्ष अर्थ से उत्पन्न विनय और उत्तरदायित्व को जीवन में प्रतिष्ठित करती है।
शक्ति-कूटैकतापन्न-कट्यधोभाग-धारिणी नाम श्रीललिताम्बिका के कटि से नीचे के दिव्य भाग को शक्ति-कूट के साथ अभिन्न बताता है। भास्करराय के अनुसार यह कूट सर्जन-शक्ति से सम्बद्ध चतुरक्षर मन्त्र-विभाग है। इस नाम में देवी का विग्रह और मन्त्र परस्पर एक हो जाते हैं: उनका रूप मन्त्रस्वरूप है और मन्त्र उनका सूक्ष्म देहस्वरूप। साधक के लिए इसका भाव है कि ज्ञान, श्रद्धा और क्रिया को पराम्बा के अखण्ड अधिष्ठान में समर्पित कर जीवन को पवित्र समन्वय की ओर ले जाया जाए।
