सोमवार, 10 अगस्त 2026

88.मूल-मन्त्रात्मिका - मूलमन्त्रात्मिकायै नमः

मूल-मन्त्रात्मिका

प्रार्थना

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

शक्तिकूटैकतापन्नकट्यधोभागधारिणी ।
मूलमन्त्रात्मिका मूलकूटत्रयकलेवरा ॥३५॥

पूर्ववर्ती नामों में श्रीललिताम्बिका के मुख, कण्ठ से कटि तक के मध्यभाग तथा कटि से अधोभाग को श्रीविद्या-मन्त्र के तीन कूटों के स्वरूप में देखा गया है। अब मूल-मन्त्रात्मिका नाम उस वर्णन को अधिक व्यापक निष्कर्ष तक पहुँचाता है: देवी के अंग मन्त्र के अंशों से सम्बद्ध मात्र नहीं हैं, स्वयं सम्पूर्ण मूलमन्त्र उन्हीं का स्वरूप है। यहाँ उपास्य देवी और उनका मन्त्र दो पृथक् सत्ताएँ नहीं माने जाते।

पदच्छेद एवं प्रत्यक्ष अर्थ

पदच्छेद: मूल-मन्त्र-आत्मिका।

मूल का अर्थ है मूलभूत, प्रधान अथवा आधाररूप। मन्त्र यहाँ सामान्य प्रार्थना या किसी भी पवित्र उच्चारण का सूचक नहीं, बल्कि श्रीविद्या-परम्परा में प्रतिष्ठित उस प्रधान विद्यामन्त्र का संकेत है, जिसके तीन कूटों से पूर्ववर्ती नामों में देवी के स्वरूप का सम्बन्ध बताया गया है। आत्मिका का अर्थ है जिसकी आत्मा वही हो, जो उसी स्वरूपवाली हो, अथवा जिसमें वह वस्तु अभिन्न रूप से विद्यमान हो।

व्याकरण की दृष्टि से मूलमन्त्रात्मिका स्त्रीलिङ्ग विशेषण है। इसका अभिप्राय है: वे भगवती जिनका निजस्वरूप मूलमन्त्र है, अथवा जो मूलमन्त्र की आत्मा और उसकी वास्तविक अधिष्ठात्री सत्ता हैं। अतः नाम का प्रत्यक्ष अर्थ केवल इतना नहीं कि देवी मूलमन्त्र से प्रसन्न होती हैं या उसकी देवता हैं। नाम इससे अधिक निकट अभेद प्रकट करता है: मूलमन्त्र का चेतन तत्त्व स्वयं श्रीललिताम्बिका हैं।

भास्कररायीय अर्थ

भास्करराय मखिन् के विवेचन का मुख्य आधार यह है कि यहाँ मूलमन्त्र से श्रीविद्या का प्रधान विद्यामन्त्र अभिप्रेत है। पूर्व के तीन नामों में देवी के विग्रह को उसके तीन कूटों के अनुसार समझाया गया है। अब यह नाम बताता है कि उन तीनों का समष्टिरूप जो मूलमन्त्र है, उसकी आत्मा भी देवी ही हैं। मन्त्र उनके स्वरूप का बाहरी चिह्न या केवल उनका नाममात्र नहीं है; वह देवी की मन्त्ररूप अभिव्यक्ति है।

इस व्याख्या में आत्मिका पद विशेष महत्त्व रखता है। आत्मा किसी वस्तु का भीतर स्थित जीवक तत्त्व है, जिसके बिना उसका बाहरी रूप निष्प्राण समझा जाता है। इसी प्रकार मन्त्र के अक्षर श्रव्य ध्वनि के रूप में प्रकट होते हैं, किन्तु उनकी देवता, शक्ति, अर्थ और चैतन्य श्रीललिताम्बिका से अभिन्न हैं। शब्दरूप मन्त्र और उपास्यरूप देवी का यह सम्बन्ध सामान्य वाचक-वाच्य सम्बन्ध से अधिक गहरा है। साधना-परम्परा इसे मन्त्र तथा मन्त्रदेवता के अभेद के रूप में ग्रहण करती है।

भास्कररायीय दृष्टि नाम को विग्रह-वर्णन की पूर्ववर्ती शृंखला से भी जोड़ती है। मुख को वाग्भवकूट, कण्ठ से कटि तक के भाग को मध्यकूट तथा कटि से अधोभाग को शक्तिकूट कहा गया। इससे देवी का सम्पूर्ण शरीर मन्त्र के तीन विभागों में देखा गया। मूलमन्त्रात्मिका उसी धारणा को भीतर की ओर ले जाता है: देवी का शरीर मन्त्र का दृश्य रूप है और मन्त्र देवी का शब्दरूप। अगले नाम में तीनों कूटों को उनके कलेवर के रूप में कहे जाने की भूमि भी यहीं तैयार होती है।

मन्त्र और मन्त्रदेवता का अभेद

सामान्य भाषा में किसी व्यक्ति का नाम उस व्यक्ति से पृथक् संकेत माना जाता है। नाम उच्चरित किया जा सकता है, जबकि व्यक्ति किसी अन्य स्थान पर हो सकता है। मन्त्र के विषय में शाक्त उपासना-दृष्टि इतनी बाहरी दूरी स्वीकार नहीं करती। मन्त्र का शुद्ध स्वरूप देवता की उपस्थिति का साधन भर नहीं, देवता की शब्दमयी अभिव्यक्ति माना जाता है। इसलिए मन्त्र का ग्रहण केवल अक्षरों को स्मरण कर लेने से पूर्ण नहीं होता। उसके अर्थ, देवता, शक्ति और उपासना-भाव का समन्वय आवश्यक माना गया है।

इस अभेद को समझते समय दो अतियों से बचना चाहिए। पहली यह कि मन्त्र को केवल ध्वनि-समूह मान लिया जाए, मानो उसका पवित्र अर्थ और देवतासम्बन्ध गौण हो। दूसरी यह कि उसके बाहरी उच्चारण को ही स्वतन्त्र, यान्त्रिक फलदाता समझ लिया जाए। मूल-मन्त्रात्मिका नाम दोनों धारणाओं का परिष्कार करता है। मन्त्र की गरिमा उसकी अधिष्ठात्री भगवती से है, और भगवती मन्त्र में अपने शब्दमय स्वरूप से उपासक के लिए सुलभ होती हैं।

श्रीविद्या की विशिष्ट मन्त्ररचना, बीजक्रम, न्यास तथा प्रयोग दीक्षा और गुरु-उपदेश से सम्बद्ध विषय हैं। इस नाम के सार्वजनिक विवेचन के लिए इतना जानना पर्याप्त है कि सहस्रनाम यहाँ किसी गुप्त प्रयोग का निर्देश नहीं देता; वह देवी और उनकी प्रधान विद्या के तात्त्विक अभेद की स्तुति करता है। अतः इस नाम का सम्मानपूर्ण अध्ययन श्रद्धा को पुष्ट कर सकता है, परन्तु वह परम्परागत अधिकार और गुरु-मार्गदर्शन का स्थान नहीं लेता।

‘मूल’ पद का अभिप्राय

यहाँ मूल शब्द प्रधानता और आधार, दोनों अर्थों की ओर संकेत करता है। प्रधान इसलिए कि यह श्रीविद्या-उपासना में सामान्य स्तोत्रात्मक नाम से भिन्न, परम्परागत विद्यारूप मन्त्र है। आधार इसलिए कि उससे सम्बद्ध तीन कूटों के माध्यम से देवी के सम्पूर्ण विग्रह का निरूपण किया गया है। जिस प्रकार वृक्ष का दृश्य विस्तार अदृश्य मूल पर आश्रित रहता है, उसी प्रकार अनेक नाम, रूप और उपासनाभाव उस एक पराशक्ति में प्रतिष्ठित हैं।

फिर भी इस उपमा को शाब्दिक सीमा से आगे नहीं बढ़ाना चाहिए। देवी किसी बाहरी मन्त्र पर निर्भर नहीं हैं। इसके विपरीत मन्त्र उन्हीं के कारण चेतन, उपास्य और फलप्रद माना जाता है। वे मन्त्र की उत्पत्ति से पूर्व स्थित कोई पृथक् सत्ता और बाद में उसमें प्रवेश करनेवाली शक्ति नहीं हैं। नाम का आशय है कि मन्त्र का अन्तःसत्य आरम्भ से ही देवीस्वरूप है।

श्रीविद्या में तात्त्विक संकेत

उपासना-दृष्टि से शब्द और अर्थ की अभिन्नता यहाँ विशेष रूप से स्मरणीय है। मन्त्र श्रव्य अक्षरों में व्यक्त होता है, देवी चेतन अर्थ और अनुभूति के रूप में प्रतिष्ठित हैं। दोनों को पूर्णतः अलग करने पर शब्द जड़ ध्वनि बन जाता है और देवता केवल मानसिक कल्पना। मूल-मन्त्रात्मिका नाम बताता है कि पवित्र शब्द, उसका अर्थ और उसकी अधिष्ठात्री चेतना एक ही पराशक्ति की विभिन्न प्रकार से उपलब्ध अभिव्यक्तियाँ हैं।

यह एक तात्त्विक संकेत के रूप में भी ग्रहण किया जा सकता है कि पराम्बा केवल किसी प्रतिमा, लोक या ध्यानचित्र तक सीमित नहीं हैं। वे वाणी की अन्तःशक्ति, अर्थबोध की ज्योति और मन्त्र के चैतन्य में उपस्थित हैं। फिर भी यह संकेत प्रत्यक्ष नामार्थ का स्थान नहीं लेता। नाम का प्राथमिक आशय विशिष्ट श्रीविद्या-मूलमन्त्र से है; वाणी और चेतना सम्बन्धी व्यापक अर्थ उसी के आधार पर समझे जाने चाहिए।

साधक के लिए संदेश

साधक के लिए यह नाम पवित्र वाणी के प्रति सावधानी और विनय का स्मरण कराता है। मन्त्र को शीघ्र फल पाने की युक्ति, प्रदर्शन की वस्तु या केवल गिनती पूरी करने का साधन न समझकर भगवती का शब्दमय सान्निध्य मानना चाहिए। जहाँ यह भाव जागृत होता है, वहाँ जप में असावधानी घटती है और उच्चारण के साथ अर्थ-स्मरण, श्रद्धा तथा अन्तःकरण की उपस्थितता बढ़ती है।

जिन्हें परम्परागत दीक्षा प्राप्त है, उनके लिए यह नाम गुरु से प्राप्त विद्या के प्रति निष्ठा को पुष्ट करता है। जिन्हें ऐसी दीक्षा प्राप्त नहीं है, वे भी किसी गोपनीय विवरण में प्रवेश किए बिना भगवती से प्रार्थना कर सकते हैं: “हे मूलमन्त्रस्वरूपिणी पराम्बा, मेरी वाणी को सत्य, कल्याणकारी और संयमित बनाइए। मेरे स्मरण को बाहरी शब्दों से आपके जीवित सान्निध्य की ओर ले जाइए।”

भाव-सार

मूल-मन्त्रात्मिका नाम श्रीललिताम्बिका को श्रीविद्या के प्रधान मन्त्र की चेतन आत्मा और अभिन्न स्वरूप के रूप में प्रणाम करता है। मन्त्र उनका शब्दमय विग्रह है और देवी उस मन्त्र का जीवित अर्थ, शक्ति तथा अधिष्ठान हैं। इसलिए मन्त्र-स्मरण का सच्चा भाव अक्षरों से आगे बढ़कर श्रद्धा, अर्थबोध, गुरु-निष्ठा और भगवती के सान्निध्य में प्रतिष्ठित होता है।

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...