शुक्रवार, 29 मई 2026

15.अष्टमीचन्द्र-विभ्राज-दलिकस्थल-शोभिता - अष्टमीचन्द्रविभ्राजदलिकस्थलशोभितायै नमः

प्रार्थना

शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
      तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
      सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥

अष्टमीचन्द्र-विभ्राज-दलिकस्थल-शोभिता
मुखचन्द्र-कलङ्काभ-मृगनाभि-विशेषका॥५॥

श्री ललिता सहस्रनाम के चौदहवें नाम में भगवती के कुरुविन्द मणियों से जड़ित मुकुट का वर्णन करने के बाद, अब वाग्देवियाँ उनके मुखमंडल के ऊपरी भाग यानी ' अलिक-स्थल' (ललाट/माथे) की सुंदरता का वर्णन करती हैं। पंद्रहवाँ नाम है ' अष्टमी-चन्द्र-विभ्राज-दलिक-स्थल-शोभिता'।

यह नाम भगवती के माथे की तुलना शुक्ल पक्ष की अष्टमी के चंद्रमा से करता है: अष्टमी-चन्द्र (शुक्ल पक्ष की आठवीं तिथि का आधा चंद्रमा) + विभ्राज (विशेष रूप से चमकने वाला) + अलिक-स्थल (ललाट का स्थान या माथा) + शोभिता (सुशोभित या सुंदर)। पूर्ण अर्थ: "वह देवी, जिनका ललाट (माथा) अष्टमी के अर्ध-चंद्रमा की तरह अत्यंत देदीप्यमान और सुंदर है"।

सौन्दर्य लहरी (श्लोक 46)
आदि शंकराचार्य ने 'सौन्दर्य लहरी' में भगवती के इस 'अलिक-स्थल' का वर्णन एक अत्यंत सुंदर कल्पना के साथ किया है:

ललाटं लावण्य-द्युति-विमल-माभाति तव यत् द्वितीयं तन्मन्ये मुकुट-घटितं चन्द्र-शकलम्। 
विपर्यास-न्यासा-दुभयमपि सम्भूय च मिथः सुधालेप-स्यूतिः परिणमति राका-हिमकरः॥

भावार्थ: "हे माता! आपका लावण्यमयी और निर्मल ललाट मुझे मुकुट में जड़े हुए चंद्रमा का दूसरा आधा भाग प्रतीत होता है। ऐसा लगता है मानो इन दोनों आधे भागों को उलटकर जोड़ दिया गया है, जिससे वे पूर्णमासी के पूर्ण चंद्रमा (राका-हिमकर) के रूप में परिणत होकर अमृत की वर्षा कर रहे हैं"।

'देवी भागवत पुराण' के अनुसार, मणिद्वीप की साम्राज्ञी के माथे पर सुशोभित यह अर्धचन्द्र केवल आभूषण नहीं, बल्कि अमृत कला का प्रतीक है। अष्टमी का चंद्रमा आधा होता है, जो ' प्रकाश' (शिव) और ' विमर्श' (शक्ति) के पूर्ण संतुलन को दर्शाता है। पुराणों में वर्णन है कि उनके माथे पर कस्तूरी का तिलक है, जो इस चंद्रमा में स्थित 'मृग' (धब्बे) की तरह प्रतीत होता है, जो एकाग्रता का केंद्र है।

योग शास्त्र में 'माथा' ' आज्ञा चक्र' का स्थान है, जहाँ साधक की दृष्टि अंतर्मुखी होती है। अष्टमी का चंद्रमा न तो बहुत कम होता है (अमावस्या की तरह) और न ही पूर्ण (पूर्णिमा की तरह), यह मध्य मार्ग और संतुलन का प्रतीक है। मुकुट की मणियाँ जहाँ 'तेज' का प्रतीक हैं, वहीं ललाट का चंद्रमा 'शीतलता' और 'करुणा' का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि देवी जितनी शक्तिशाली साम्राज्ञी हैं, उतनी ही स्नेहमयी माता भी हैं। यह चंद्रमा ' सोम चक्र' से जुड़ा है, जिससे साधक के ध्यान की स्थिति में दिव्य अमृत का स्राव होता है।

'अष्टमी-चन्द्र-विभ्राज-दलिक-स्थल-शोभिता' नाम का ध्यान करने से मन में शांति और स्थिरता आती है। यह नाम साधक को यह सिखाता है कि जीवन में ज्ञान के तेज (मुकुट) के साथ-साथ करुणा की शीतलता (चंद्रमा) का होना भी अनिवार्य है। जब हम माँ के इस स्वरूप का चिंतन करते हैं, तो हमारे भीतर का अज्ञान रूपी अंधकार मिटने लगता है और हम आत्म-साक्षात्कार की ओर बढ़ते हैं।

122.शाम्भवी - शाम्भव्यै नमः

प्रार्थना शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान...